SC/ST एक्ट २०१८ बनाम रॉलेट एक्ट १९१९

ashwini rai
भारत सरकार का विध्वंसकारी निर्णय (SC/ST एक्ट)
१) सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार FIR से पहले DSP स्तर की जांच होगी जिसे संशोधन किया गया और संशोधन के बाद नया कानून बना, शिकायत मिलते ही FIR।
२) सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, गिरफ़्तारी के लिए पहले इजाज़त ज़रूरी मगर  संशोधन के पश्चात  बिना इजाज़त गिरफ़्तारी।
३) सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था, अग्रिम ज़मानत पर पूरी तरह से रोक नहीं होगी। संशोधन के बाद के कानून में  अग्रिम ज़मानत का कोई प्रावधान ही नहीं है।
 २० मार्च २०१८ को सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश…
१. कोई ऑटोमैटिक गिरफ्तारी नहीं होगी, गिरफ्तारी से पहले आरोपों की जांच जरूरी। FIR दर्ज करने से पहले DSP स्तर का पुलिस अधिकारी प्रारंभिक जांच करेगा।
२. इस मामले में अग्रिम जमानत पर भी कोई संपूर्ण रोक नहीं है। गिरफ्तारी से पहले जमानत दी जा सकती है। अगर न्यायिक छानबीन में पता चले कि पहली नजर में शिकायत झूठी है।
३. यदि कोई आरोपी व्यक्ति सार्वजनिक कर्मचारी है, तो नियुक्ति प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना और यदि व्यक्ति एक सार्वजनिक कर्मचारी नहीं है तो जिला के वरिष्ठ अधीक्षक की लिखित अनुमति के बिना गिरफ्तारी नहीं होगी। ऐसी अनुमतियों के लिए कारण दर्ज किए जाएंगे और गिरफ्तार व्यक्ति व संबंधित अदालत में पेश किया जाना चाहिए।
४. मजिस्ट्रेट को दर्ज कारणों पर अपने विवेक से काम करना होगा और आगे आरोपी को तभी कारागार में रखा जाना चाहिए जब गिरफ्तारी के कारण वाजिब हो। यदि इन निर्देशों का उल्लंघन किया गया तो ये अनुशासानात्मक कारवाई के साथ-साथ अवमानना कारवाई के तहत होगा।
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१. इस तरह के अपराध की शिकायत मिलते ही पुलिस FIR दर्ज करे।  केस दर्ज करने से पहले जांच जरूरी नहीं।
२. गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेना आवश्यक नहीं है।
३. केस दर्ज होने के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होगा।  भले ही इस संबंध में पहले का कोई अदालती आदेश हो।
अब आप सब यह भी देखें…
रॉलेटऐक्ट मार्च १९१९ ,
यह कानून सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश के आधार पर बनाया गया था। इसके अनुसार ब्रितानी सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए और बिना दंड दिए उसे जेल में बंद कर सकती थी। इस क़ानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था।
१. इस अधिनियम ने प्रभावी रूप से सरकार को ब्रिटिश राज में आतंकवाद (क्रांतिकारी गतिविधियों) से संबधित किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को दो साल तक मुकदमा किए बिना कैद करने के लिए अधिकृत किया।
२. सभी क्रांतिकारी गतिविधियों से निपटने के लिए अधिकारियों को शाही शक्तियां प्रदान की गयी,अर्थात जंगलराज !
३. प्रेस के लिए सख़्त नियंत्रण प्रदान किए गए।
बिना वारंट के गिरफ्तारी।
४. बिना परीक्षण के अनिश्चितकालीन निरोध और भ्रामक राजनीतिक कृत्यों के लिए कैमरा परीक्षण में कोर्ट की जूरी नहीं होगी ।
५. आरोपियों को आरोपी और मुकदमे में इस्तेमाल होने वाले सबूतों को जानने का अधिकार नहीं।
६. दोषी ठहराए गए लोगों को रिहाई पर प्रतिभूति जमा करने की आवश्यकता अर्थात बेवजह सरकारी उगाही।
७. दोषी ठहराए गए लोग किसी भी राजनीतिक, शैक्षणिक या धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने से निषिद्ध अर्थात सामाजिक बहिष्कार को लागू करना ।
८. किसी भी व्यक्ति को तलाश करने के लिए पुलिस को तानाशाही शक्तियां।
निष्कर्ष, १९१९ का क्या निकला यह किसी से नहीं छुपा या २०१८ का भविष्य क्या होगा यह भी आगे पता चल ही जाएगा।
जलियाँवाला हत्याकांड १९१९ का निष्कर्ष था…
१३ अप्रैल को लोग अमृतसर में वैसाखी दिवस समारोह के लिए इकट्ठा हुए, जिससे १९१९ का कुख्यात जलियाँवाला हत्याकांड सामने आया।
कहना मुश्किल नहीं कि कैसे देश को स्वतन्त्रता मिली,  इस तरह काले कानूनों से और दमनकारी नीतियों से और क्या महत्व है इस स्वतन्त्रता का। जहां एक तरफ भाईचारे के नारे लगाए जाते हों और दूसरी तरफ भाई को भाई से लडवाने के कानून बनाए जाते हों वहां देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा दोनों हाशिए पर आ खड़ी हुई है।
जय हिन्द या हाय – हाय

नाम- अश्विनी राय 

साहित्यिक उपनाम- अरुण 

जन्मतिथि- २८-०२-८२

वर्तमान पता- ग्राम – मांगोडेहरी, डाक – खीरी, जिला – बक्सर 

राज्य- बिहार 

शहर- बक्सर 

शिक्षा- वाणिज्य स्नातक 

कार्यक्षेत्र- कृषी सह लेखन 

विधा – गद्द 

प्रकाशन- पुस्तक (बिहार – एक आईने की नजर से)

सम्मान- द इंडियन आवाज २०१८,

ब्लॉग-shoot2pen

अन्य उपलब्धियाँ-अन्य 

लेखन का उद्देश्य-बेरोजगारी 

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