सियासत की साज़िश

sunil patel
सियासत शर्मिंदा भी नहीं, इंसान फरिश्ता भी नहीं,
मौका मिलने पर दोनों गुस्ताखियां कर ही जाते है। 

ऊपर लिखी लाइन अगर पढ़कर नीचे पढ़ने का विचार बना चुके है तो आपके वक़्त को किसी चुनावी सभा कि तरह भेंट नहीं चढ़ाऊंगा। सोशल मीडिया को हम आप मनोरंजन का जरिया समझ बैठे हैं तो विचार और विश्लेषण की गंगा यहां अगर बहती भी है तो हम दूर से ही हाथ जोड़कर निकल जाते हैं क्युकी हमें तो किसी स्वीटी, शोना या एंजल प्रिया की प्रोफाइल देखनी है ना। अगर वो मानसिकता नहीं भी तो हम थोड़ी ही ना किसी रजिस्टर न्यूज वेबसाइट या अखबार के पेज पर जाएंगे क्युकी हमे तो हिन्दू/मुसलमान खतरे में हैं या फिर 70 साल का हिसाब लेना है ना चार सालों से हम चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई ही जो इसीलिए कर रहे हैं।

जिन्होंने आजादी के बाद से ही देश को अपनी बपौती समझा और भारत माता को जंजीरों के जकड़नें का असफल प्रयास किया वे लोकतंत्र की दुहाई दे रहें और जो बरसों से मलाई खाने वालों के मुंह ताकते हुए झुठन गिरने का इंतजार इसीलिए कर रहे थे कि निवाला गिरे और हम झपट लें आज वे इतिहास में अपने आप को लोकतन्त्र के सिपाही साबित करने में जुटे हैं। जिन्होंने आजादी की लड़ाई को सिर्फ ठंड में अलाव जलाकर ताप रहे विचारहीन,  ‘राष्ट्रवाद से निर्धन’ व्यक्ति की तरह दूर से देखा वे आज स्वतंत्रता सेनानियों की देश की आजादी में भूमिका को निर्धारित कर रहे हैं।

अब अगर आप सोच रहें हैं कि इन लाइनों से आपके अंतर्मन को वाकई जागने में मदद मिली है तो किसी विचारधारा या दल विशेष के स्वयंघोषित शुभचिंतक, समर्पित सहायक वाली मानसिकता को कुछ देर के लिए टेबल पर रखकर अपने अंदर के इंसान को जगाइए और सोचिए कि क्या राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार होने के लिए आपने जन्म (84 योनियों के बाद – सनातन धर्म के अनुसार)  लिया है? अगर आपका उत्तर हां है तो ये कोरा ज्ञान आपके लिए यही तक था…जय श्री राम, खुदा हाफ़िज़, गुड बाय, सासरियाकाल 🙏

अब चुकी आप नीचे की लाइन फिर पढ़ने आए हैं यानी कि आपके जीवन का उद्देश्य कुछ और है जिसे हासिल करने का कोई टोटका मेरे पास नहीं है। बस इतना कह सकता हूं आए दिन सत्ता और विपक्ष के कुचक्र में कहीं आप फंस तो नहीं रहे? दरअसल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव है जिनको जीतने के लिए पार्टियां एडी चोटी का जोर लगा रहे है। एक तरफ ‘सरकार’ जनता से पेट्रोल, डीजल, गैस, जीएसटी, नोट बंदी, रेत उत्खनन, अलग अलग तरह के दूसरे टैक्स के नाम पर जो भंडार भरा है इसको धड़ल्ले से टीवी, अखबार, मैगज़ीन, रेडियो, पोस्टर, बैनर, डीजे या फिर सियासी रिझाने के अंदरूनी माध्यम शराब, साड़ी, कबाब, गाड़ी, गोली या फिर लगा के बोली लूटा रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष का चोला ओढ़े बरसों से मलाई चाट रहे सफेदपोश नेता पुराने खजाने को खर्चने में लगे है जिसके लिए ‘सरकार’ से ‘महाराज’ कम नहीं पढ़ रहे। हर वो रास्ता सियासत के सिकंदर ने अख्तियार कर लिए है जिनके बारे में अवाम थोड़ा भी जानती है। कभी जाती , धर्म, संप्रदाय, अगडा , पिछड़ा, दलित, आदिवासी, ब्राम्हण, वैश्य और ना जाने क्या क्या…खासकर इस्लाम के नाम पर तो कभी मंदिर के नाम पर अवाम के आंसुओ से वोटों का आटा गूंथने वाले नेता सिर्फ सत्ता की रोटियां सेंकते है, इन्हे आपके दुख दर्द से सिर्फ उतना ही मतलब है जितना पानी से भरी बॉटल का जो ख़ाली (मतदान होने के बाद) होने पर कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है।

अब सियासत की स्याह रात में चलने वाले इस लोकतांत्रिक उजाले के खेल में बस इतनी ही रोशनी बची है जितनी 60 के दशक में चलने वाले लालटेन से होती थी, जो अपने पास  के अंधेरे को खत्म करने में ही अपना पूरा ईंधन(जो 5 साल में लोकतंत्र की दुहाई देकर जनता की आंखों से टपकने पर इकठ्ठा किया हो) जला देता है। इक्का दुक्का कहीं हाथ पांव मारने की कोशिश कोई पढ़ा लिखा आईएएस आईपीएस अफसर करता भी है तो कथित डिग्री धारी राजनेता के गुस्से की भेंट चढ़ जाता है, व्यापम को ही देख लीजिए ना करीब 50 ही तो मरे हैं ना क्या फर्क पड़ता है सवा करोड़ देशवासी जो है।
अब भी वक़्त है संभाल जाइए वरना मिसकॉल देकर नेता बनने वालों डेमोक्रेसी के ढर्रे पर अंधगती से बाखौफ दौड़ रही सियासी रेलगाड़ी एक ना एक दिन किनारे बसे तुम्हारे घरों को भी चकनाचूर कर देगी और आपको कफ़न के लिए उसी (पार्टी मेरी मां है) का झंडा भी नसीब नहीं होगा।

#सुनील रमेशचंद्र पटेल
परिचय : सुनील रमेशचंद्र पटेल  इंदौर(मध्यप्रदेश ) में बंगाली कॉलोनी में रहते हैंl आपको  काव्य विधा से बहुत लगाव हैl उम्र 23 वर्ष है और वर्तमान में पत्रकारिता पढ़ रहे हैंl 

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