*उच्च शिक्षाः सुधार का अर्थ ?*

0 0
Read Time3 Minute, 59 Second
vaidik
मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को मैं बधाई दिए बिना नहीं रह सकता। अब वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का नाम बदलकर उच्च शिक्षा आयोग कर रहे हैं। इसका नाम ही नहीं बदलेगा, अब इसका काम भी बदलेगा। जहां तक नाम बदलने का सवाल है, मानव संसाधन मंत्रालय का नाम सबसे पहले बदलना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय का यह नाम किसी अफसर ने राजीव गांधी को सुझाया और उन्होंने प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद श्री पी.वी. नरसिंहराव को मानव संसाधन मंत्री बना दिया। मैंने राव साहब को उसी वक्त राष्ट्रपति भवन में कहा कि यह कैसा बेढंगा नाम है ?  राजीव तो अभी नौसिखिया हैं लेकिन आप तो विद्वान हैं, अनुभवी हैं। आप अब मनुष्यों को साधन बनवाएंगे क्या ? वह तो साध्य होना चाहिए। राव साहब क्या करते ? उनके बाद अर्जुनसिंह और डाॅ. मु.म. जोशी जैसे लोग भी इस बेढंगें नाम को अपने कंधे पर ढोते रहे। अब शायद मोदी और जावड़ेकर इस गल्ती को सुधार लें।
अब जो उच्च शिक्षा आयोग बन रहा है, इसका एक ही मुख्य लक्ष्य है कि देश की उच्च शिक्षा में सुधार करना। दान और अनुदान आदि देने का काम अब मंत्रालय करेगा लेकिन यह आयोग देश के सार्वजनिक और निजी विश्वविद्यालयों, कालेजों, शोध-केंद्रों, प्रशिक्षण केंद्रों आदि पर कड़ी निगरानी रखेगा और जो भी संस्था निर्धारित स्तरों का उल्लंघन करेगी, उन्हें बंद करने, उन पर जुर्माना करने और उनके संचालकों को तीन साल तक की सजा देने का काम करेगी। अभी तो उसे सिर्फ उनकी मान्यता समाप्त करने भर का अधिकार है। आशा है, यह प्रावधान उच्च शिक्षा में चल रही अराजकता पर रोक लगाएगा। विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था अब सरकार के हाथ में होगी। कहीं ऐसा न हो कि उनकी स्वायत्ता का गला घुट जाए ?
लेकिन असली सवाल यह है कि हमारी सरकार के पास उच्च शिक्षा का कोई अपना नक्शा भी है या नहीं ? हमारे विश्वविद्यालयों की विश्व में कोई गिनती नहीं है। हमारे जिलों के बराबर जो देश हैं, उनके विश्वविद्यालयों के आगे हमारे सैकड़ों विवि पानी भरते नजर आते हैं। वे विवि नकलचियों के अड्डे नहीं हैं। वे मौलिक अनुसंधान करते हैं। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में वे अपने देश को नई दिशा देते हैं। वे अपनी भाषाओं में उच्च शिक्षा और उच्च शोध करते हैं। उनका काम मौलिक होता है, हमारा काम नकल होता है। यदि राष्ट्रवादियों की यह सरकार नकल को असल में बदल सके तो क्या कहने ? मोदी सरकार ने पिछले चार साल तो फिजूल की नौटंकियों में बर्बाद कर दिए लेकिन अब इस शेष एक साल में वह शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ क्रांतिकारी काम कर दिखाए तो उसके हट जाने के बावजूद लोग उसे याद रखेंगे और उसका आभार मानेंगे।
                                                           #डॉ. वेदप्रताप वैदिक

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

बेटियों !

Fri Jun 29 , 2018
बेटियों को समर्पित एक रचना(एक प्रयास) एक पिता अपनी बेटी का मार्गदर्शन करता है— कूद पड़ दुनिया की दरिया में तू , मत सोच क्या-क्या करना होगा । निकलेगी तू खुद को तरास कर , लहरों की थपेड़ों को भी तुझे सहना होगा ।। 1 ।। फत्तियाँ कसने दे कुछ […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।