कर्म फल 

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devendr soni

बचपन से सुनते आ रही थी राधा – भोगना ही पड़ता है सबको अपना कर्मफल। माँ से सुना , दादी से सुना , नानी से सुना और तो और पिता से भी अक्सर यही सुनती पर समझ कुछ न पाती।
अभावों में गुजर – बसर करते हुए खेलने कूदने की उम्र से ही घर के कामों में हाथ बंटाती । अपनी सहेलियों के संग स्कूल जाने के सपने देखना उसे भाता था लेकिन उसका यह सपना पूरा न हो सका ।
तंगहाली ने उसे भी अपनी अनपढ़ माँ की तरह ही आस पड़ोस के घरों में काम करने को मजबूर कर दिया । जहां वह काम करती वहां उसकी ही उम्र के बच्चों को लिखते पढ़ते देख मन मसोस कर रह जाती ।
भीगी पलकों को पोंछकर भगवान से पूछती – ये सबकी किस्मत अलग – अलग क्यों है ? आखिर उसने ऐसे कौन से कर्म किए हैं जो उससे मेहनत मजूरी करा रहे हैं ? शिक्षा से वंचित कर रहे हैं ? लेकिन कोई जवाब न पाकर फिर अपने काम में जुट जाती।
किशोरावस्था तक आते – आते पिता ने पास ही के गांव में ब्याह दिया उसे । लड़का तिकड़मी था । गुजर हो जाए इतना कमा लेता था पर था पियक्कड़ । कुछ दिन तो ठीक ठाक निकले फिर हालात जस के तस । वह समझ ही नही पा रही थी कि आखिर उसने कौन से ऐसे कर्म किए हैं जो उसे खुशहाल जिंदगी जीने नही दे रहे । रह रह कर वह अपनी किस्मत को दोष देती पर उसे संतोष नही मिलता ।
वह जानना चाहती थी – कर्मफल के इस रहस्य को । उसकी बुद्धि जितना चलती , उतना वह सोचती पर हल नही मिलता। इसी उहापोह में समय बीतता गया और एक दिन राधा ने घर में ही सुंदर सी बेटीे को जन्म दिया। बेटीे के आने से वह सब कुछ भूल गई ।  उसे अपनी जिंदगी के अभाव बेमानी लगने लगे । अब उसका लक्ष्य बेटीे का भविष्य था जिसे लेकर वह चिन्तित जरूर थी पर दुनियादारी ने उसे इतना तो समझा ही दिया था कि जीवन में पढ़ाई लिखाई बहुत जरूरी है भले ही इसके लिए माता पिता को अतिरिक्त मेहनत मजूरी करना पड़े । उसने मन ही मन संकल्प ले लिया अब से वह खुद भी पढ़ेगी और बेटी की पढ़ाई के लिए भी धन संचय करेगी। जब यही संकल्प उसने अपने पति के सामने दोहराया तो वह भी राधा से सहमत हुए बिना नही रह सका।
उसने वादा किया – अब ताड़ी नही पियेगा और पैसे जोड़ेगा ।
उसने कहा – हम ईमानदारी से अपना कर्म करेंगे जिसका फल होगा हमारी पढ़ी लिखी बेटी।
मुस्कुराते हुए राधा बोली – हां जी । अब यही है हमारा कर्म फल ।
          #देवेन्द्र सोनी , इटारसी

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।