kirti jayaswal
मटका भरा-भरा जो रहता
टूटा- बिखरा पड़ा हुआ है।
घर जो मेरा शोर मचाता
विवश आज वह खड़ा हुआ है।
गाँव के बच्चे शोर मचाते
हठ पर अपने अश्रु बहाते।
बूढ़ी दादी खाट पर बैठे
हम बच्चों को गीत सुनाती।
हरा- भरा जो गाँव मेरा था
टूटा बिखरा आज है।
विटप-पत्र यह शुष्क पड़े।
और घर मेरा कंगाल है।
गाँव जो मेरा शोर मचाता
वही गाँव सुनसान है।
गाँव यह जीवित नजर न आता;
यह कोई श्मशान है?
घर- घर में जब दीपक टिम-टिम
तारकगण पलकें झपकातें;
दिया वो टुकड़ों-टुकड़ों में है;
तम का साम्राज्य है।
क्या यही!
क्या यही मेरा गाँव है?
                                   #कीर्ति जायसवाल
(एक युवक जो अपने गाँव से बाहर रहकर जॉब कर रहा था और कुछ दिनों की छुट्टी ले अपने गाँव आया था और गाँव की जो हालत देखा वह देख स्तंभ हो गया। शायद कोई भयंकर प्राकृतिक आपदा आई थी जिससे सब टूट और बिखर गया था। शायद बाढ़ या आंधी; इसी भाव को प्रस्तुत करती हुई मेरी कविता है- ‘मेरा गांव रघुवंशपुर’)

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