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कुछ बोलो हम सुन लेगे
जुबान दबा कर बैठे हैं ।
उनको मिली जीत मुबारक
हमको हार मुबारक है ।

दर्द दिया जो घाव हरे हैं
तो दवा लगाकर बैठे हैं
जिनमें सहनशीलता कम है
वो तो ऐठे बैठे हैं ।

लिखी लकीरे हाथ में मेरे
जो बिधि ने रची बनाई ।
मेहनत से मैंने बहुत कुछ
उससे अधिक ही पाई है ।

वो तो खुश रहते अपने मे
हरदम रहते सपने में
वो पान दबाकर बैठे हैं
हम अपमान दबाकर बैठे हैं ।

कोई अपनाया सच्चाई
किसी की झूठ कमाई है
अच्छाई को पाने में मैंने
खर्ची पाई पाई है ।

सचमुच ही हम बहुत सुखी है
संतोष मेरी कमाई है ।
वो तो झूठ फरेब लिए है
पाप कमाकर बैठे हैं ।

अच्छा खाने वाला पाता
अच्छी सोच भलाई है ।
पर जाना माना मैंने
आदत की कहाँ दवाई है ।

कुछ बोलो हम सुन लेगे
जुबान दबकर बैठे हैं ।
घाव दिया था दिल को तुमने
हम दवा लगाकर  कर बैठे हैं ।

                 #विन्ध्य प्रकाश मिश्र “विप्र “

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