sanjay
दूर दूर तक देखा मैंने l
ऐसा संत नही पाया l
निर्विकारी, निर्विकल्प l नीर सी दिखती है छाया l
दूर दूर तक देखा मैंने l
ऐसा संत नही पाया lI
जादूगर तो है नही l
पर जादू उनको है आता l
कहता कोई शब्द नही पर l
समझ हमे पूरा आता l १I
दूर दूर तक देखा मैंने l
ऐसा संत नही पाया lI
नाम लिखू नही कलम चलाऊ l
ऐसा तो में श्रेष्ठ नही हूँ  I
विद्या सागर के गुण गाऊ l
भगवन मेरी अंतिम बिनती I2I
दूर दूर तक देखा मैंने l
ऐसा संत नही पाया lI
बस शिष्य श्रेष्ठ का बन पाऊ l
यही ख्ब्यास है इस जीवन की /
विद्या गुरु का शिष्य कहाऊ l
सुधा गुरु का शिष्य कहाऊ l3I
दूर दूर तक देखा मैंने l
ऐसा संत नही पाया lI

 #संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/02/sanjay.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/02/sanjay-150x150.pngArpan JainUncategorizedकाव्यभाषाjain,sanjayदूर दूर तक देखा मैंने l ऐसा संत नही पाया l निर्विकारी, निर्विकल्प l नीर सी दिखती है छाया l दूर दूर तक देखा मैंने l ऐसा संत नही पाया lI जादूगर तो है नही l पर जादू उनको है आता l कहता कोई शब्द नही पर l समझ हमे पूरा आता l १I दूर दूर तक देखा...Vaicharik mahakumbh
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