हुई लकदक लताएं 

Read Time0Seconds
satish
उत्तरायण हो गए हैं सूर्य जब से,शीत कम करने लगीं अपनी हवाएं।
छँट रही है धुंध सब वातावरण से,फूल कलियों से हुई लकदक लताएं॥
तेज होती धूप की बढ़ती तपन से,बर्फ की चादर पिघलती जा रही है।
शीत से होती शिथिल इस ज़िन्दगी में, अब नई उर्जा नवल गति आ रही है॥
एक मुद्दत बाद कुछ कलियाँ खिलीं है, एक मुद्दत बाद महकी फ़जाएं…।
छँट रही है धुंध सब वातावरण से,फूल कलियों से हुई लकदक लताएं…॥
छोड़कर नीरस सफ़ेदी पर्वतों ने,कर लिया है केसरी परिधान धारण।
केसरी होती दिखी हमको नदी भी,पर्वतों के केसरी प्रतिबिम्ब कारण॥
निर्झरों ने साज से संदेश भेजा,पंछियों को गीत कोई गुनगुनाएं…।
छँट रही है धुंध सब वातावरण से,फूल कलियों से हुई लकदक लताएं…॥
आगमन ऋतुराज का जब हो रहा है,क्यूँ नहीं श्रृंगार हो सारी धरा का।
देखना उत्सव बड़ा ही भव्य होगा,भव्य होगा रूप उस प्यारी धरा का॥
आइए स्वागत करें मिलकर सभी हम, प्रेम के उल्लास के नगमें सुनाएं…।
छँट रही है धुंध सब वातावरण से,फूल कलियों से हुई लकदक लताएं…॥
चाहता हूँ मैं बनूँ ऋतुराज अब के,तुम धरा बन प्रेम की श्रृंगार करना।
मैं करूँ प्रस्ताव अपनी प्रीत का जब,तुम लजाना और फिर स्वीकार करना॥
ज़िन्दगी भर के सफ़र में साथ की हम, ऋतु वसंती की चलो कसमें उठाएं…।
छँट रही है धुंध सब वातावरण से,फूल कलियों से हुई लकदक लताएं…॥
        #सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।
0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

प्यारा बसंत

Mon Jan 22 , 2018
  गीतों का मल्हार लिए, फूलों का श्रंगार लिए। खिल गए फूल अनन्त, आ गया देखो प्यारा बसंत॥ फूलों से खेत हो रहे हरे-भरे, पक्षी गीत गा रहे भावना भरे। नर-नारी और झूमे साधू सन्त, आ गया देखो प्यारा बसंत॥ नदियाँ फूलों से श्रृंगार करे, धरा भी किरणों से मांग […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।