amit sahu
अनन्तकाल से ही मानव की इच्छा रही है कि वह प्रसिद्ध हो,उसके पास धन-दौलत हो,उसे मान-सम्मान प्राप्त हो,लोग उसे जाने पहचानें।
तब से ही मानव इन सबको प्राप्त करने के प्रयास में रहा है और इसके लिए न जाने क्या-क्या करता रहा है ?,और आज भी कर रहा है।
आजकल प्रसिद्ध होने का एक नया विचार बाजार में आ गया है तथा मीडिया और समाज में छाए रहने का तो बिल्कुल ताजा है। जिस किसी को लगता है कि, उसे भी अब लोकप्रिय या प्रसिद्ध होना चाहिए,वह इस विचार को शुरू कर सकता है। सोशल मीडिया ने तो इस क्षेत्र में धूम मचा रखी है, एक नई क्रांति ला दी है। अब जिसे देखो वही,बिना सोचे-समझे क्या सही,क्या गलत,इससे कहीं का या हमारा अपना ही नुकसान न हो जाए-कलंकित न हो जाए की बिना परवाह किए ही लगा हुआ है प्रसिद्ध होने के चक्कर में।
विवेक से तो कोई काम लेना ही नहीं चाहता,बस उसे तो प्रसिद्ध होने की धुन सवार है और कहते हैं -‘यह हमारा अधिकार है,अभिव्यक्ति की आजादी है,तो भला कौन रोक सकता है हमें ?’
ऐसा भी नहीं है कि,ये सब अंगूठा टेक,अशिक्षित, अनपढ़,जाहिल,गंवार लोग हैं, बल्कि यह तो बड़ा पढ़ा-लिखा सुशिक्षित और शहरों आदि में रहने वाला वर्ग है। कुछ तो बहुत ही उच्चवर्गीय लोग हैं जो खुद को सभ्य-संस्कारी-समझदार समझते हैं,हम गांव वालों से।
यह एक ऐसा विचार या तरीका है जो हमारे ही देश तक सीमित नहीं है,बल्कि विदेशों में भी यह अच्छा फल-फूल रहा है,काफी लोग पसंद कर रहे हैं। सबकी चाह यही है कि,कम समय में कैसे भी करके प्रसिद्ध होना है ? इसके लिए कोई खतरनाक स्टंट करके,कोई ऐसी जगह से ‘सेल्फी’ लेकर-जिसे देखकर दांतों-तले अंगुली दबा ले,तो कुछ अजब-गजब कारनामे करते हैं। कोई अजगर के साथ सोता है,तो कोई बिल्ली-कुत्ते के साथ,तो कोई शेर के साथ खेलता है। यहाँ तक कि कुछ तो ऐसे लोग भी हैं,जिन्होंने अपनी इज्जत को ही सोशल मीडिया के माध्यम से नीलाम किया और आनलाइन बोली लगवाई।
अगर अपने देश भारत की बात की जाए तो क्या कहने ? अपने यहाँ तो हम इन्हें कुछ समूहों में भी बांट सकते हैं जैसे राजनेता,सितारे (फिल्म और खेल आदि क्षेत्र से),जनसाधारण (आम जनता)और छात्र आदि।
जब किसी राजनेता को लगता है कि,वह मीडिया में काफी समय से चर्चित नहीं है तो बड़ा ही सामान्य तरीका है-जात-पात-मजहब पर या विवादित बयान बाजी कर दो, फिर क्या आप महीने-दो महीने तो पक्का मीडिया में चर्चा का विषय बने रहेंगे।
सितारों की बात की जाए तो,ये भी कुछ कम नहीं। ज्वलंत मुद्दे मिलते ही धड़ाम से कूद पड़ते हैं और अपनी राय दे मारते हैं। फिल्म उद्योग में भी कपड़ों आदि को लेकर जंग छिड जाती है और ये सिर्फ प्रसिद्ध होने के लिए मीडिया में बने रहने के लिए ही है। अब तो यह अपनी फिल्मों को सफल कराने का जरिया-सा बन चुका है ।
फिल्मों का विवाद कराने के लिए तो कुछ दल- संस्थाएं हैं जो रुपए लेकर फिल्मों का दुष्प्रचार करते हैं जिससे विवाद उत्पन्न हो और फिल्म का अच्छा प्रचार हो जाता है। इससे लोगों में उसे देखने की ललक और इस तरह फिल्म की शुरुआत बहुत अच्छी होती है। अब बचे दो जनसाधारण और छात्र ,तो इनके भी अपने अपने तरीके हैं और इसमें में भी समय-समय पर बदलाव करते रहते हैं,जिससे समाज में कुछ अलग दिखे और प्रभावी भी हो। यह कई दिनों तक चर्चा का विषय बनें और इनकी लोकप्रियता में चार चांद लग सके।
जैसे कुछ समय पहले मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों आदि पर जूते-चप्पल फेंकना। हालांकि,यह तरीका पुराना हो गया है लेकिन बहुत कारगर है। कभी-कभी यह घटना देखने को मिल ही जाती है,जैसे हाल ही में मध्यप्रदेश में।
अपहरण का नाटक,किसी को धमकी देना आदि यह भी एक तरीका है प्रसिद्ध होने का। उदाहरण-जैसे एक भाई साहब ने बॉलीवुड की नामचीन हस्ती एक प्रड्यूसर और एक बहुत ही खूबसूरत अभिनेत्री को जान से मारने की धमकी दी और पचास लाख फिरौती भी मांगी। फिर क्या भाई साहब पकड़े गए,लेकिन आज पूरा भारत उन भाई साहब को जान गया और वो प्रसिद्ध हो गए।
प्रसिध्द होने के लिए छात्र नए-नए तरीके भी खोजते रहते हैं,जैसे जुलूस निकालना,धरना-प्रदर्शन करना चक्काजाम…ये तो सब फैशन-सा हो गया है। कुछ भी घटना हो,अगले दिन लोग और छात्र संगठन सड़क पर बड़ी-बड़ी मोमबत्ती-बैनर आदि लिए नजर आते हैं।
भई और कुछ नहीं तो कम-से-कम टीवी में दिखने के साथ ही समाचार पत्रों में तस्वीर तो छपेगी,और इसकी उत्सुकता ही कुछ अलग होती है।
एक बार चुनाव के समय मतदान के लिए खड़ा था, तभी टीवी चैनल वाले आ गए और प्रश्न करने लगे-कौन जीतेगा ? आप किस आधार पर किस पार्टी को वोट देंगे,किसके पक्ष में हैं ?,आदि-आदि…।
मैं बहुत खुश हो रहा था,इसलिए नहीं कि,मुझसे प्रश्न पूछे जा रहे थे,बल्कि इसलिए कि टीवी पर आज पहली बार दिखूँगा और फिर मुझे कितनी जल्दी थी कि, घर पहुँचकर खुद को टीवी पर देख सकूं।चर्चित होने के लिए एक और नया तरीका खोज निकाला गया है-राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रद्रोही,देशद्रोही…।और ये एक विदेशी लोग हैं जो कहते रहते हैं कि, भारत में खोजें ही नहीं होती।चाहे विज्ञान,धर्म,साहित्य,प्रेम हो या अन्य,हर क्षेत्र में भारत ने खोजें की हैं। भले ही चाहे वह किताबों-कहानियों- कथाओं के रूप में ही क्यों न हो ? खोज,खोज होती है।
विचारों से ही कुछ करने का विचार उत्पन्न होता है और दुनिया को कुछ खोज करने की सबसे बड़ी चाबी तो हमने ही दी है।
खैरअगर बात प्रसिद्धि की हो रही है तो इसमें मीडिया पत्रकार भी पीछे नहीं हैं। वो भी ज्वलंत मुद्दों पर बढ़िया फेशियल-मेकअप कर अपनी टीआरपी और अपनी बिक्री बढ़ाने में लग जाते हैं। जिसे चाहते हैं उसे नायक, और जिसे चाहते हैं उसे खलनायक भी बना देते हैं।
जहाँ कुछ लोग प्रसिद्ध हो रहे हैं,तो वहीं कुछ कमाई भी कर रहै हैं,इतना ही नहीं कुछ को राजनीति में आने का अवसर भी मिल रहा है। इस प्रकार से प्रसिद्धि और रोजगार दोनों का प्रबंध हुआ जा रहा है।
इस वक्त पूरे देश में एक ही विषय चर्चा का मुद्दा बना हुआ है-देशभक्ति और देशद्रोह।
पिछले वर्ष देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्र,युवा पीएच-डी. वगैरह कर रहे छात्र विश्वविद्यालय में नारे लगाते हैं-अफजल हम शर्मिंदा हैं,तेरे कातिल जिंदा हैं। एक कसाब मारोगे-हजार निकलेंगे।’ इसी तरह दिल्ली में ही एक और विवि की छात्रा ने भी सोशल मीडिया पर ‘मेरे पिता जी को पाकिस्तान ने नहीं,अपितु युद्ध ने मारा’, कहा। इस पर भी खूब बवाल हुआ। ऐसे छात्रों को क्या कहा जाए ये भविष्य हैं देश का। मारने वाले कहाँ के थे। इन्हें भारत का इतिहास नहीं दिखा कि, भारत ने कभी किसी लड़ाई की शुरुआत नहीं की, वह तो हमेशा से शांति चाहता है।
इस तरह से जिन्हें देश में कोई नहीं जानता था,उन्हें आज पूरा देश जानने लगा और जब अब वह प्रसिद्ध हो गई तो कहा,-मैं अपनी बात वापस लेती हूँ।’
इनका काम तो हो गया प्रसिद्ध होने का,पर देश में कुछ लोग अब इसमें राजनीति की रोटियां सेंकने लगे हैं।
अब युवा नेता और भावी प्रधानमंत्री का ख्वाब देखने वाले की सोच और समझ को क्या कहा जाए। इनकी पार्टी में रही एक मंत्री ने सही कहा,-‘युवा नेता अभी पचास वर्ष की उम्र पार कर जाने के बाद भी अपरिपक्व हैं।’ इन्हें तो बस सत्ता चाहिए,कैसे भी।
केंद्र पर हमले करो,कोई भी मामला हो-केंद्र से जोड़ दो, मुद्दा बन जाएगा।
ऐसे ही देशभक्ति बनाम देशद्रोह से उपजे विवाद पर जिन्हें लगता है उनके पास भी मौका है प्रसिद्ध होने का,तो वह भी इसमें कूदा जा रहा है। कुछ समर्थन में तो कुछ विरोध में,कुछ देश हित में तो कुछ अपने फायदे में। सभी अपनी अपनी बात रख रहे हैं और प्रचारित हो रहे हैं। और कहा जा रहा है-‘अभिव्यक्ति की आजादी है’, पर ये कैसी आजादी है..पता नहीं।
तो ऐसे में भला मैं मौका क्यों छोड़ दूँ प्रसिद्ध होने का… । तो बोलिए जय हिंद।

#अमित साहू

परिचय : अमित साहू की जन्मतिथि-१० जून १९९४ और जन्म स्थान-सैनी हैl आपका निवास फिलहाल सैनी(कौशाम्बी)  स्थित जी.टी.रोड पर हैl सबसे बड़े राज्य-उत्तर प्रदेश के शहर-कौशाम्बी(इलाहाबाद) से ताल्लुक रखने वाले अमित साहू ने स्नातक की शिक्षा हासिल की है और कार्यक्षेत्र-निजी शाला में अध्यापक हैंl ब्लॉग पर भी लिखते रहते हैंl आपके लेखन का उद्देश्य-हिंदी का उत्थान और पहचान हैl 

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