ये कैसा दर्द दिया,मेरी मौत को शर्मसार किया,
माना तुम नौजवान थे,जांबाज थे बहुत
ये क्या कर दिया नाजुक-सी ककड़ी को हाथों से
मसल दिया।
मैं गुड़िया नाजुक-सी,नन्हीं कली
दुलारी मां-बाप की,लाड़ली भाई की अपने।
जाती थी पाठशाला होकर बहुत खुश,
दिन उस भी कह मां को गई
आती हूँ मां जाकर स्कूल
रोज के रास्ते रोज की वो वादियों थी,
लोग वही और बाशिंदे वहीं के थे
न जाने मौत कहां से मुंह बाये सुरसा-सी खड़ी थी
तोड़ दिया फूल डाली से,
मसल दी कच्ची कली वहशीपन से
कुचला,मसला और निर्वस्त्र कर फेंक दिया बियाबान में
हाय रे मेरा अभागापन,न दिखा शव मेरा अस्ल किसी जानवर को,वो खा लेता तो देह का रह जाता सम्मान।
दया न आई तुम्हें,मौत को यूं शर्मसार कर दिया,
कितना तड़पती रही होगी,रोई भी होगी बहुत
जब तोड़ दिए होंगे हाथ-पाँव
गिड़गिड़ाई भी तो होगी भर नीर नयन में।
दरिंदगी की इन्तेहा हो गई,
ऐ-मानव के अंश,क्यूँ रहम न आया
जब घोंटा गला उस नन्हीं-सी कली का,
मौत तो सभी को आनी है इक दिन
बाद मौत के एक गुहार लगाती हूँ
‘हे मेरे परमात्मा,
मेरी देह को शर्मिंदा करने वालों
मौत पे तुम्हारी रोने वाला कोई न हो
जियो मगर अपना कहने वाला कोई न हो,
वादी का एक-एक जीव ओ कायनात संग
मेरे देगी बद्दुआ,जियो हजारों साल मगर
बिन अपनों के।
ऐ मेरा आंचल उतारने वाले तेरे भी एक बेटी हो,
और हो मेरी ही तरह शर्मिंदा हो।’
#कल्पना गागडा़
परिचय : कल्पना गागड़ा हिमाचल राज्य के शिमला में रहती हैं। पेशे से आप सरकारी शिक्षा संचालनालय में अधीक्षक(वर्ग २)हैं। लिखने की वजह शौक है।