कई बार एक साथ कई सारी चीजे करने का मन करता है ।जब स्कुल में थी तो पिता अक्सर कहते थे की खुदी को कर बुलंद इतना की तक़दीर से पहले खुद बन्दे से ये पूछे बता तेरी रजा क्या है …तमाम मिट चुकी स्मृतियों के बीच बस यही याद बाकि है कि कितना बुलंद किया है खुद को … आज भी अस्तित्व की जद्दोजहद जारी है अजीब विरोधाभासी व्यक्तिव जुड़ते बिछड़ते रहे कई बार अनुकरर्णीय भी जिन्होंने दिशा देने में मदद की कई बार वक़्त आजमाता रहा कभी वक्त पर लोगो को भी आजमाया मैंने चहरो से लिपटा अपनत्व का मुख़ौटा भी उतरा कई बार अपनों का भी और परायो का भी …
तब दिल में आया की
आज फिर से आजम ले ऐ वक़्त तू मुझे
कर ले सितम जो तेरी हद में हो ..
लेकिन पिता की कही ये दो लाइने की खुदी को कर बुलंद …
आज भी मेरे कानो में मेरे दिल में बसी है जो जीने की ललक को न हारने की जिद को मुझमे जिन्दा रखे है ।

 लेखिका परिचय : कीर्ति कापसे जी एम ए (हिस्ट्री), मास्टर आफ जर्नलिज़्म |
लेखन में रूचि तो लंबे समय से है ,ब्लॉग ,कविताएं , संस्मरण, कहानियां लेखन में रूचि साथ ही राजनितिक टिप्पणियाँ लिखना भी आपकी पसंद में शुमार है । गत 18 वर्षो से कार्यरत हूँ जिनमे 7 वर्ष शैक्षणिक सेवाएं दी ।10 वर्ष दैनिक भास्कर में मार्केटिंग में विभिन्न विधा में काम किया व गत एक वर्ष से नई दुनिया में सीनियर मेनेजर के पद पर कार्यरत है |

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