कविता और केन्द्रीय  पंक्ति का प्रश्न

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shashank shukla
ऐसा क्यों हुआ कि कविता में पंक्तियों की पुनरावृत्ति का विधान प्रारम्भ हो गया ?आख़िर गद्य में पंक्तियों की पुनरावृत्ति का चलन नहीं रहा है,फिर पद्य में क्यों…?क्या गद्य में पंक्ति की पुनरावृत्ति के लिए अवकाश नहीं है ? गद्य का अनुशासन एक सीधी …रेखीय गति पर चला करता है,जबकि पद्य का अनुशासन चक्रीय गति…वर्तुलाकार ढंग से चला करता है …यानी संवृत्त ढंग से …। क्या यह अनायास है कि,मार्क्स जब चक्रीय और रेखीय गति के द्वंद् की बात करता है…और इसी क्रम में उसका प्रारंभिक वाक्य बनता है-`अब तक के दार्शनिकों ने संसार की केवल व्याख्या की है,जरुरत है उसे बदलने की…` तो मुझे लगता है कि मार्क्स के इस वक्तव्य में भाववाद और कर्मवाद भी समाविष्ट है और इस प्रसंग में इसे पद्य और गद्य के विभाजन में (हालाँकि यह सरलीकरण होगा,बावज़ूद…) शामिल किया जा सकता है।गद्य रेखीय गति से चला करता है तथा पद्य प्रमुखतः चक्रीय गति से। उसी प्रकार जैसे भाववाद या परंपरावाद में `यदा यदा हि धर्मस्य…` चला करता है। यानी प्रश्न गद्य और पद्य के साथ ही इस तथ्य का भी है कि विचार में उस प्रकार आवृत्ति नहीं करनी पड़ती,जिस प्रकार भाव में करनी पड़ती है। भाव एक ही संवेग को बार-बार रचित करता है। इस बार-बार रचित करने से ही वह पुष्ट होता है,प्रामाणिकता को प्राप्त होता है। मुझसे वर्षों पहले मेरे एक मित्र ने एक प्रेमी जोड़े को दिखाते हुए कहा था-`ये प्रेमी-प्रेमिका घंटों की बातचीत में मुश्किल से कुछ पंक्तियाँ ही बोलते हैं…वे बार-बार एक ही पंक्ति की पुनरावृत्ति करते हैं …। फिर-फिर एक ही बात…एक ही भाव…और इसी प्रक्रिया में उनका सम्बन्ध पुष्ट होता है।` मुझे लगा कि मित्र की बात का एक सिरा प्रेमी-प्रेमिका की बातचीत से जुड़ता है तो दूसरा सिरा कविता की पुनरावृत्त पंक्तियों से…। आख़िर कविता भी तो ‘भावयोग'(आचार्य शुक्ल) ही है। वस्तुतः कविता एक ही भाव को बार-बार रेचित करने की प्रक्रिया है। शायद इसीलिए कविता में एक केन्द्रीय पंक्ति हुआ करती है…और वह पंक्ति बीच-बीच में आकर कविता के केन्द्रीय भाव को और सघन बना जाया करती है। एक भाव को और गाढ़ा,सांद्र…। यूं तो गद्य में भी एक `केन्द्रीय भाव` हुआ करता है। सम्पूर्ण रचना उस केन्द्रीय भाव को पुष्ट करने के लिए परिवेश निर्मित करने का कार्य किया करते हैं …किंतु इस प्रक्रिया में उसे पंक्तियों के पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती। कारण यह कि गद्य में एकसाथ कई प्रकार के भाव एक-दूसरे को समकोण रुप में काटते चलते हैं…इस प्रकार गद्य की संरचना पद्य से भिन्न पद्धति पर विकसित होती है।

आधुनिक हिन्दी कविता में पंक्तियों की पुनरावृत्ति (टेक) का चलन अपेक्षाकृत कम हुआ है। मध्यकालीन कविता में जिस प्रकार एक ख़ास छंद,अनुशासन में आकर कवि किसी पंक्ति को आवृत्त करता था,वैसा आधुनिक कविता में नहीं देखने को मिलता। ऐसा नहीं है कि,आधुनिक कविता इससे अछूती है…या इसमें इस प्रकार के प्रयोग नहीं हो रहे हैं…हाँ,उनके स्वरुप में परिवर्तन अवश्य हो गया है। आजकल कविता की प्रथम पंक्ति को ही रचना की केन्द्रीय पंक्ति स्वीकार कर लिया जाता है…फिर कवि उस प्रथम पंक्ति की आगे रचना में विस्तार करता चलता है।इस व्याख्या-प्रयोग के क्रम में कविता `एक मूल भाव` की रचना करती है। एक चीज अवश्य समझने की है कि,प्रायः कविता के कथ्य का सम्बन्ध भी इस प्रकार की पुनरावृत्ति-प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। परम्परागत भावों (भक्ति,दैन्य,प्रपत्ति,समर्पण,प्रेम, वीरता…) में पंक्तियों की पुनरावृत्ति बार-बार होती है,लेकिन आज की वैचारिक कविता में इस प्रकार की आवृत्ति नहीं होती।जैसा कि मैंने संकेत किया कि,विचार में आवृत्ति बोझिलता प्रदान करता है,किन्तु भाव में आवृत्ति उसे गाढ़त्व प्रदान करती है,तो प्रश्न कथ्य का भी है। आज की प्रेम कविता लिखने वाले कवि एक पंक्ति की कई बार आवृत्ति करके कविता के मूलभाव को निखारने का प्रयत्न करते हैं।

कविता में पंक्ति की पुनरावृत्ति के प्रश्न पर विचार करते हुए प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी ने इसका सम्बन्ध कविता की आंतरिक संरचना यानी इसके पाठ्य रूप के साथ स्थिर किया है। उनके अनुसार-चूंकि कविता मूल रुप से लिखित विधा नहीं है। यह मूल रुप से पाठ्य विधा है…वाचिक विधा है। वाचिक विधा में भाव को उभारने के लिए एक ख़ास बिंदु पर बल प्रदान करना पड़ता है। इस क्रम में कविता में पंक्तियों को बार-बार आवृत्त करना पड़ता हैl यह तर्क अपने-आप में मज़बूत है और यह हमारे कथन को और स्पष्ट करता है। ठीक ही है कि,भाव की प्रगाढ़ता एक अनुशासन रूप में ही सम्भव हो पाती है। जैसे हमारे फ़िल्मी गीतों में कुछ केन्द्रीय पंक्ति होती हैं,जिन्हें ‘मुखड़ा’ कहा जाता है। मुखड़ा यानी प्रतिनिधि पंक्ति…केन्द्रीय पंक्ति। पूरा गीत उन्हीं केन्द्रीय पंक्तियों का विस्तार होता है…कई बार तो आवृत्ति मात्र…।

कविता की पंक्ति-आवृत्ति की तरह हमारा जीवन भी कुछ-एक घटनाओं की पुनरावृत्ति करता चलता है। मनुष्य `भावस्थ प्राणी` है …। अतः वह कुछ प्रमुख घटनाओं…कुछ प्रमुख बिंदुओं के आधार पर अपने जीवन का विस्तार करता है। हमारे जीवन में भी सभी घटनाएं महत्वपूर्ण नहीं होतीं..कुछ-एक घटनाएं ही महत्वपूर्ण होती हैं। इन घटनाओं के आधार पर हमारा भाव,दृष्टिकोण,अनुभूति,मूल्य….इत्यादि बनते हैं। यानी कविता हो या जीवन सभी `केन्द्रीयता के चुनाव` के नियम से चलते हैं।एक केन्द्रीय भाव…केन्द्रीय पंक्ति आवश्यक है…किन्तु कुछ लोग अपने कर्म…जीवन को केन्द्रित नहीं कर पाते। यह एक विडम्बना है। दरअसल केन्द्रीयता का स्थिरीकरण व्यक्ति को…कविता को घनत्व प्रदान करता है। कविता की केन्द्रीय पंक्ति और गद्य के केन्द्रीय भाव में संरचनागत पार्थक्य है,मूल का नहीं।

भावगत क्रियाएँ पुनरावृत्ति की मांग करती ही हैं। वैचारिक क्रियाएँ पुनरावृत्ति से नहीं,प्रायोगिकता से उन्मेष को प्राप्त करती हैं। कविता भावगत क्रिया ही है। स्मरण करें कि,भक्ति संबंधी पद,स्तुति,भजन-कीर्तन,पूजन-अर्चन में एक पंक्ति की पुनरावृत्ति इतनी आवश्यक क्यों बन जाती है? यानी सुर-लय ,ताल या संगीत में एक भाव (एक पंक्ति) का बार-बार केन्द्रण होता चलता है। संगीत,लय,नाद…की स्थिति में एक शब्द,वाक्य की आवृत्ति बार-बार होती है। कविता में पंक्ति की आवृत्ति मूल रूप से `आंतरिक लय योजना` का बार-बार विरेचन है।

                                                                                            #डॉ. शशांक शुक्ला

परिचय : डॉ. शशांक शुक्ला का जन्म१९७९ में  सोनभद्र(उत्तरप्रदेश)में  हुआ हैl  आपने उच्च शिक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से हासिल की हैl आप एक शोध पत्रिका के प्रधान संपादक हैंl अब तक १६ पाठ्य पुस्तकों का संपादन कर चुके हैंl साथ ही प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख प्रकाशित होते रहते हैंl मुख्य अभिरुचि हिन्दी आलोचना में हैl उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यलय के हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष का दायित्व निर्वहन कर रहे हैंl  

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।