क्या वो किसान थे..!

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sushil
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
जीवन को सुलगाने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
खेतों में जो श्रम का पानी देता है।
फसलों को जो खून की सानी देता है।
फसलों को आग लगाने वाले,
ये किसान नहीं हो सकते।
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
खुद भूखा रहकर जो औरों को
भोजन देता है।
खुद को कष्ट में डाल दूसरों को
जीवन देता है।
सड़कों पर दूध बहाने वाले,
ये किसान नहीं हो सकते।
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
कर्ज में डूबे उस किसान की
क्या हिम्मत है।
घुट-घुटकर मर जाना
उसकी किस्मत है।
बच्चों पर पत्थर बरसाने
वाले ये किसान नहीं हो सकते।
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
राजनीति की चौपालों पर लाशें हैं।
इक्का बेगम और गुलाम की ताशें हैं।
लाशों के सौदागर दिखते
ये किसान नहीं हो सकते।
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।
सीने पर जिसने गोली खाई
निर्दोष था वो।
षडयंत्रों का शिकार जन आक्रोश
था वो।
राजनीति के काले चेहरे,
ये किसान नहीं हो सकते।
हिंसा को भड़काने वाले
ये किसान नहीं हो सकते।

                                                                     #सुशील शर्मा

परिचय : सुशील कुमार शर्मा की संप्रति शासकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय(गाडरवारा,मध्यप्रदेश)में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) की है।जिला नरसिंहपुर के गाडरवारा में बसे हुए श्री शर्मा ने एम.टेक.और एम.ए. की पढ़ाई की है। साहित्य से आपका इतना नाता है कि,५ पुस्तकें प्रकाशित(गीत विप्लव,विज्ञान के आलेख,दरकती संवेदनाएं,सामाजिक सरोकार और कोरे पन्ने होने वाली हैं। आपकी साहित्यिक यात्रा के तहत देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में करीब ८०० रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। इंटरनेशनल रिसर्च जनरल में भी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
पुरस्कार व सम्मान के रुप में विपिन जोशी राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान ‘द्रोणाचार्य सम्मान-२०१२’, सद्भावना सम्मान २००७,रचना रजत प्रतिभा

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matruadmin

One thought on “क्या वो किसान थे..!

  1. वाह | सच है ऐसे किसान नहीं हो सकते है | बेहद सुंदर रचना हुई है |

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।