शिक्षा का बदलता स्वरूप

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आज के इस डिजिटल युग में जहां हर काम डिजिटल होता जा रहा है ,
तो शिक्षा का क्षेत्र इससे कैसे अछूता रहता । वैसे भी हमारी शिक्षा
व्यवस्था में हाल के वर्षों में काफी बदलाव हुआ है । एक समय था
जब हम ऑफलाइन शिक्षा पर आश्रित थे । फिर धीरे -ंउचय धीरे ऑनलाइन
शिक्षा का पादुर्भाव हुआ , जो केवल बड़े -ंउचय बड़े शहरों तक सीमित
था । लेकिन कोरोना काल में इस शिक्षा से छात्र जुड़ते चले गये ।
लॉकडाउन में जब सारे शिक्षण संस्थान बंद थे और छात्रों की
प-सजय़ाई बाधित होने के कगार पर थी । तब ऐसे समय में विकल्प के रूप में
ऑनलाइन शिक्षा ने उनकी शिक्षा को बाधित होने नहीं दिया । इस
प्रकार हमारी शिक्षा पद्धति भी डिजिटल हो गयी । ऑनलाइन शिक्षा पद्धति ने
घर बैठे बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कोई व्यवधान उत्पन्न
नहीं होने दिया । घर बैठे बच्चे शिक्षा सहित तकनीक से भी रूबरू होते
रहे ।
ब-सजय़ते तकनीक के प्रयोग ने हमारे बच्चों को भी इस क्षेत्र में सबल
बना दिया । इंटरनेट के इस्तेमाल से बच्चों ने नई -ंउचय नई जानकारियां
प्राप्त कीं , तो वही शिक्षकों ने लॉक डाउन में प-सजय़ाने का नया
तरीका -सजयूं-सजय़ लिया ।
ऑनलाइन शिक्षा से ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे जरूर वंचित हो गये । वैसे
ग्रामीण क्षेत्र जहां बेहतर इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं है । वे
आज भी ऑफलाइन शिक्षा प्राप्त कर रहंे हैं या उसकी आस में बैठे
हैं । वैसे भी ऑनलाइन शिक्षा सबके बूते की बात नहीं है ।

ऑनलाइन शिक्षा पद्धति और ऑफलाइन शिक्षा पद्धति में काफी अंतर है ।
ऑफलाइन शिक्षा पद्धति जहां बच्चों को नैतिकता और व्यवहारिकता ज्ञान
कराता है , वही ऑनलाइन शिक्षा पद्धति में इसका अभाव साफ -हजयलकता है ।
ऑनलाइन शिक्षा पद्धति में अनुशासन का भी पूर्ण अभाव है , तो इस
शिक्षा पद्धति से बच्चे पूर्णत: संतुष्ट भी नहीं हो पाते । शिक्षक -ंउचय
छात्र में जो सामंजस्य होना चाहिए , वो ऑनलाइन शिक्षा पद्धति में
नहीं है । यही कारण है कि बच्चे आसानी से शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते
। क्योंकि उन्हें सम-हजयने के लिए कम समय जो मिलता है ?
छात्र जब समूह में प-सजय़ता है , तो उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना जागती
है । ऑनलाइन शिक्षा में प्रतिस्पर्धा की भावना तो कहीं दिखती ही
नहीं । ऑनलाइन शिक्षा उन बच्चों के लिए ही बेहतर है , जो
बुद्धिमान और परिपक्व हैं । बाकी बच्चे तो कुछ सम-हजय ही नहीं पाते ।
यह सही है कि आज हर क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का धड़ल्ले से प्रयोग
हो रहा है । वैसे में हमारे बच्चे भी इस क्षेत्र में अब पीछे नहीं
रहे । वे भी इस तकनीक का प्रयोग कर संचार माध्यम से अपनी समस्याओं का
समाधान स्वयं कर रहे हैं ।
लेकिन मोबाइल , लैपटॉप और कंप्यूटर के अधिक प्रयोग से बच्चों के
स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । वे बच्चे इनके आदि होते जा
रहे हैं और वे इस सुविधा का दुरूपयोग भी करते हैं ।
शिक्षा का सही माध्यम तो ऑफलाइन शिक्षा ही है । भले ही आज के
बदलते परिवेश में ऑनलाइन शिक्षा पद्धति का विस्तार तीव्रगति से हो रहा
है , लेकिन यह शिक्षा का उचित माध्यम नहीं हो सकता । इस कोरोना काल
में ऑनलाइन शिक्षा पद्धति बेहतर विकल्प के रूप में जरूर उभरा , पर प्रत्येक
बच्चे इस शिक्षा का लाभ न ले सके । काफी सारे बच्चे तो इस शिक्षा से
वंचित रह गये । ऑनलाइन शिक्षा न तो सार्थक है और न निरर्थक ,
लेकिन इस कोरोना काल में शिक्षा का बेहतर माध्यम जरूर बना ।
# पुष्पेश कुमार पुष्प

( बिहार )

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।