जनसंख्या- नियंत्रण या जनसंख्या -प्रबंधन

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कोरोना काल में कोरोना के पहली और दूसरी घातक लहर में लाखों अपनों को खोने के बाद अभी आम जनता के आंसू सूख ही रहे थे कि ऐसे में सरकार ने महंगाई को दोगुना कर दिया ।जनता को महामारी के बाद पौष्टिक खानपान की आवश्यकता होती है यहां भी सरकार ने पांच दस किलो राशन भीख में देकर उनसे पौष्टिक खाना छीन लिया है। महिषासुर महंगाई को बढ़ाकर अब पौष्टिक तो बहुत दूर की बात है दो वक्त की रोटी भी नसीब हो जाए पेट भर कर के यह हालात पैदा कर दिए गए हैं। ऐसे में आम जनता कराहते हुए अभी जीवन यापन करना सीख ही रही थी इस बेरोजगारी के दौर में कि 5-6 राज्यों के विधानसभा चुनाव का शोर चारों ओर से भोंपू मीडिया के द्वारा चालू कर दिया गया फिर से चुनावी गठजोड़ और चुनावी शतरंज के मोहरों की खरीद-फरोख्त का दौर चालू हो गया है। आम जनता के घावों पर मरहम लगाना तो दूर उनको देखना भी अब तक हमारी पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकार की सूची में शामिल नहीं हो सका है ।जनता को उसके ही हाल पर छोड़ दिया गया है मरने खपने के लिए। सारा का सारा पूंजीपति एवं प्रशासनिक एवं नेता नगरी समाज इस आपदा में अपने-अपने अवसर तलाश रहा था या तलाश रहा है और सरकार मौन बनकर बस उंगलियों की टिप्स से ट्विटर- ट्विटर का खेल खेलकर आम जनता को गुमराह पर गुमराह किए जा रही है। अब जब सरकारों ने अपने कार्यकाल में कोई भी योजना को आम जनता के लिए सुचारू रूप से संचालित नहीं किया है सिर्फ चुनावी झुंझुना के अलावा। ऐसे में अच्छे दिनों के लंबे दिवास्वप्न से अब आम जनता की आंखें कोरोना काल की भयावहता से और बढ़ती महंगाई से खुलने लगी है तो वह अपना अधिकार मांगने लगी हैं। चाहे वह किसान आंदोलन के रूप में हो, बेरोजगारों के आंदोलन के रूप में, निजीकरण के विरोध में, महिला असुरक्षा के रूप में, प्राकृतिक संसाधनों की खुली अवैध लूट के रूप में, उनके जल ,जंगल, जमीन और उत्खनन के रूप में आदिवासी आंदोलन, बढ़ते पेट्रोल- डीजल के मूल्य के विरोध में, पुलिस -प्रशासन की बर्बर कार्यवाही के विरोध में ।आज जनता सड़कों पर आ रही है या डट कर खड़ी हुई है।
ऐसे में सरकार को देश की बढ़ती हुई जनसंख्या और उससे उपजी हुई समस्या देखने लगी है। इसी आम जनता का प्रयोग जब चुनाव में अधिक से अधिक मतदान को प्राप्त करने में सरकारों के द्वारा किया जाता है और कार्यकर्ताओं की अत्याधिक जनसंख्या के कारण पार्टी को मजबूती बताते हुए छाती गर्व से फूल जाती है तब जनसंख्या वृद्धि एक समस्या नहीं बल्कि वरदान नजर आता है । जबकि यह सभी जानते हैं कि देश की तीन चौथाई संपदा पर बड़े-बड़े उद्योगपतियों और अमीरों का हाथ है गरीब जनता मात्र एक चौथाई में अपना जीवन यापन कर रही है।
वर्तमान में हर स्तर पर नाकाम हो चुकने के बाद और भरपूर काली कमाई अपने और अपनों की कर लेने के बाद वही जनसंख्या अब अभिशाप सी लगने लगी हैं।
ऐसी दोहरी सोच क्यों? कोरोना काल के बाद या पहले से जहां कई देश अपने अपने देशों की जनसंख्या वृद्धि के लिए आम जनता को प्रोत्साहित कर रहे हैं और कई सुविधाएं दे रहे हैं ।ऐसे में हमारे देश के जनसेवक जनसंख्या नियंत्रण की बातें करते हैं जबकि कोरोना काल में लाखों लोग अपनी जान हमारे देश में गंवा चुके है। यह दोहरा बर्ताव क्यों किया जा रहा है?
लगता है कि इंदिरा गांधी सरकार की तरह जोकि जब हर मौके पर असफल हो गई थी तब उन्होंने नसबंदी कार्यक्रम चालू करवा कर लाखों लोगों की प्रजनन क्षमता को कम किया गया था ।अब उसी कदम पर यह सरकार भी आ गई है क्योंकि यह उनके ही नक्शे कदम पर चल रही है और देश वर्तमान में अघोषित आपातकाल का सामना कर रहा है। आम जनता को सिर्फ और सिर्फ जीने का अधिकार ही बचा हुआ है और कुछ भी करने का नहीं।
वास्तव में देश को जनसंख्या नियंत्रण नहीं बल्कि प्रबंधन की आवश्यकता है क्योंकि जब हमारा देश प्राकृतिक संसाधनों से, सस्ते मेन पावर से ,पीढ़ियों से प्राप्त ज्ञान से, कुशल कामगारों की योग्यता रखता है, पर्याप्त जल ,जंगल, जमीन है। अपनी प्राकृतिक संसाधनों को देश में खपत के बाद विदेशों को भी निर्यात करता है। ऐसे में मात्र उचित प्रबंधन के द्वारा लघु, कुटीर और वृहद उद्योग को संचालित करने के लिए लोगों को उचित सुविधाएं जैसे धन मुहैया कराना, जमीन, मशीन और अन्य आवश्यक वस्तुओं को प्रदान करके हम चीन की तरह आम जनता को आत्मनिर्भर बना सकते हैं साथ ही देश को भी आतम निर्भर बनाया जा सकता है ।सिर्फ आतम निर्भर कहने से या चुनावी जुमला में उपयोग करने से आत्मनिर्भरता प्राप्त नहीं की जा सकती है। चीन जो कि विश्व जनसंख्या में सर्वाधिक है उसमें आम जनता को कितना अधिक आत्मनिर्भर बना दिया है ।यह हम सभी जानते हैं और कभी एक परिवार ,एक बच्चे का नियम रखने वाला आज दो से तीन बच्चों की डिमांड कर रहा है क्योंकि वह जानता है कि किसी भी देश के लिए बढ़ती हुई जनसंख्या बोझ नहीं होती बल्कि उचित प्रबंधन की आवश्यकता होती हैं देश को आगे बढ़ाने के लिए।
लेकिन इसके लिए सरकार की कथनी और करनी में समानता चाहिए। वर्तमान में सरकारी भाषणों में आम जनता की भलाई की बातें करती है और फायदा चंद प्रिय उद्योगपतियों को पहुंचाती हैं ।जब चुनी हुई सरकार ही इस तरह से आवाम को गुमराह करेगी तो क्या कोई भी देश आत्मनिर्भर हो पाएगा और जनता कभी पूरी आजादी से अपना जीवन यापन कर पाएगी शायद कभी भी नहीं ?

#स्मिता जैन

matruadmin

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।