मैं हूॅ तेरे साथ

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बस के रवाना होते ही विनोद ने गहरी सांस छोड़ी थी । वैसे तो ऐसी गहरी सांस बस में बैठे सभी लोगों ने ली होगी । लें भी क्यों न जिस दारूण परिस्थितियों से होकर वे निले थे उसकी कल्पना ही रोंगटे खड़ा कर देने के लिए प्र्याप्त है । पन्द्रह दिन में ही जैसे सब कुछ बदल गया । वे लोग तो अच्छे भले अपनी रोजी रोटी कमा रहे थे । दिन भर काम करते और और रात को खर्राटा भरते हुए सो जाते । उनके लिये हर कए दिन एक जैसा ही था । काम करना और केवल काम करना ताकि पैसे इकट्ठे हो जायें । वे सेठ से बीच में आवश्यकता होने पर पैसे लेते रहते पर हिसाब तो महिने के अंत में करते जितना भी पैसा आ जाता सारा पैसा घर भेज देते । घर में सारे लोग हैं, पत्नी है दो बेटी हैं और पिताजी हैं । उनको पैसे की ज्यादा जरूरत होती है वो तो यहां अकेला ही है उसे क्या जरूरत । वह तो पैसे बचाने के चक्कर में कई-कई दिनों तक केवल ब्रेड ही खाकर दिन काट लेते । कई बार वो पास के लंगर में चला जाता और वहां खाना खाकर आ जाता । अब अकेले के लिये क्या बनाना और बनाना भी पड़ता तो चार मोटी-मोटी रोटी स्टोव में सेंक लेता । उसके पास तो केवल मिट्टी के तेल का स्टोव ही था जिसे वह गांव से ही लेकर आया था । एक दरी, एक चादर, एक बाल्टी और मग्गा, दो जोड़ी कपड़े बस इतनी ही उसकी गृहस्थी थी । गांव से वह अकेला नहीं आया था उसका भाई भी आया था, गांव के कुछ लोग और भी थे जो पास में ही रहते थे । भाई कुछ दिनों तक दोनों साथ रहा पर फिर भाई ने अपना काम बदल लिया और दूसरी जगह रहने चला गया अब वह अकेला ही एक कमरे के किराये के मकान में रह रहा था । उसके पास ही मल्लू भी रह रहा था और कुछ दूरी पर सोहन रह रहा था । वे सभी एक ही जगह काम करते थे इसलिये सुबह साथ ही काम पर निकल जाते । सोहन के साथ तो उसकी पत्नी भी थी और एक बच्चा भी । उन्हें रहते करीब तीन साल गुजर गये थे । तीन सालों में वह केवल एक बार ही अपने गांव गया था ‘‘अरे बेकार में आने-जाने में पैसे खर्च होते हैं और जब घर से लौटने लगो तो बहुत दुख होता है’’ कहकर वह अपने आपको रोक लेता ‘‘देखो भैया अब तो यहां से फुरसत होकर ही जायेगें वो क्या कहते हैं रिटायर्ड होकर’’ वह फीकी हंसी हंसता । इस हंसी में भी उसकी आंखों के कोर से दो बूंदे अमृत जल की बह निकलतीं । जब वह पिछली बार गया था तो उसकी बिटिया राधा तो उसे आने ही नहीं दे रही थी ‘‘नहीं बब्बा अब आप नहीं जाओ, हम लोगों को यहां बहुत बुरा लगता है......’’ । वह रोने लगी थी । पत्नी ने भी बोला था ‘‘देखो अब आप यहीं कहीं पास में ही काम ढूंढ़लो......वैसे भी वहां शहर में कोई अफसरी तो कर नहीं रहे हो.....कुछ दिन मेरे साथ भी रह लो.......’’ बोलते समय उसकी कांपती आवाज ने उसे दहला दिया था । पिताजी ने लाठी मारने के अंदाज में उठा ली थी ‘‘सुन अब तू कहीं नहीं जायेगा.....देख कितना दुबला हो गया है......यहीं रह मेरे पास कल को मुझे कुछ हो गया तो .....यहां बहु के पास कौन रहेगा.......’’ ।

‘‘बस ये मान लो पिताजी के अबकी बार जब आऊंगा न तब पूरा डेरा लेकर आऊंगा…..फिर यहीं रहूंगा और यहीं काम करूंगा……अब राधा भी बड़ी हो रही है उसका ब्याह भी तो करना है न…..बस कुछ दिन और….’’ । कहते हुए उसकी आंखें भी भींग गई थीं । उसका मन हो रहा था कि वह अपने पिताजी से लिपट कर रो ले…..। लौटते समय भी वह बस में जाने कितनी देर तक रोता ही रहा था । पर उसे तो शहर आना ही था, वह जानता है कि वहां काम नहीं मिलेगा….। उसके सामने अब जवान होती बेटी की चिन्ता भी आ खड़ी हुई थी ।

गांव से लौटने के बाद विनोद ने अपने खर्चे में और कटौती कर ली थी । घर तो वह उतने ही पैसे भेजता था जितने पहले भेज रहा था पर अपनी कटौती से बचे पैसों को वह अपने पास ही जोड़ने लगा था । रह रह कर उसके सामने राधा का चेहरा उभर आता ‘‘कितनी बड़ी हो गई है राधा…..बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं…..अब तो उसका ब्याह करना ही होगा…बहुत धूम-धाम से’’ वह राधा के ब्याह के सपने बुनता रहता । फोन पर अपनी पत्नी से बात करता और उसे भी हिदायत दे देता ‘‘कुछ कम खर्च किया करो कुछ पैसे बचा कर रखो राधा का ब्याह करना है’’ । पत्नी केवल सुनती रहती । वह यह भी तो नहीं कह सकती थी कि ‘‘वो जितने पैसे भेजता है उतने में तो घर का खर्चा ही पूरा नहीं होता…..’’ पर मौन रहती । वैसे तो वह भी राधा के ब्याह के लिये पैसे जोउ़ रही थी । वह खुद भी एक दो घरों में जाकर बरतन मांजती और झाड़ा-पौछी करती इससे तो पैसा मिलता वो पैसे वह अलग संदूक में रख लेती । इसकी भनक विनोद को तो छोड़़ो राधा तक को नहीं थी ‘‘माॅ अबकी बार पिताजी पैसे भेजेगें न तो तुम अपने लिए साड़ी ले लेना….यह फटी साड़ी पहने घूमती रहती हो……’’ । वह ‘‘हाॅ’’ में केवल सिर हिला देती और काम पर लग जाती । वह भी दिन भर काम में जुटी रहती । घर का काम फिर बाहर का काम पर उसके चेहरे पर शिकन भी नहीं आती ।

           विनोद ने तय कर लिया लिया था कि अब वह जब भी गांव जायेगा तो फिर यहां नहीं लौटेगा । वह फोन पर घर की खोज खबर लेता रहता । एक दिन उसकी पत्नी ने ही फोन कर बताया था कि ‘ः‘कोई कोरोना बीमारी है जो बहुत फैल रही है...सावधानी से रहना’’ । वह हंसा ‘‘अब मैं यहां रह रहा हूॅ मुझे पता नहीं हैं तुम्हें गांव में पता भी चल गया...पगली कहीं की....किसी ने ऐसे ही बोल दिया होगा’’ । उसकी पत्नी ने कुछ नहीं बोला । बात आई गई हो गई । उसे तो वैसे भी बीमारी की बात झूठ लग रही थी इसलिये भी उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया । एक दिन रात को सेठ का फोन आया था ‘‘सुनो विनोद....लाॅकडाउन....लग गया है इसलिये तुम लोग कल से काम पर नहीं आना....काम बंद ही रहेगा.....’’ । वह और कुछ पूछता इसके पहिले ही फोन कट गया था । वह भागता-भागता सोहन के घर पहुंचा और सार बात बताई । वह भी कुछ नहीं समझ पाया । सारे लोग इकट्ठे हो गए बहुत देर तक सभी चर्चा करते रहे पर सच तो यह है कि लाॅकडाउन के बारे में कोई कुछ समझ भी नहीं पा रहा था । सभी की रात आंखों में चिन्ता के भाव लिए ही गुजरी । सुबह का सूरज भी उनके लिये कोई खुशी का पैगाम लेकर नहीं आया । चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था । मोहल्ले की कोई भी दुकान नहीं खुली थी । पुलिस की गाड़ियां घूम रहीं थी । पुलिस के खौफ से सभी लोग अपने-अपने घरों में सिमटे थे । जो बाहर घूमता दिखाई दे जाता उसे पुलिस मार रही थी । विनोद ने दूर से सारा कुछ देखा और डर के मारे अपने कमरे में आकर लेट गया । उसके कमरे में ही सोहन भी आ गया था और मल्लू भी । सभी लोग इस आपदा को लेकर चर्चा करते रहे । किसी को नहीं पता था कि ऐसी स्थिति कब तक रहेगी । विनोद ने अपने भाई को भी फोन लगाया था फिर उसने अपनी पत्नी को फोन लगाकर साारी बात बताई । पत्नी ने साफ कह दिया ‘‘आप तो गांव लौट आओ.......वहां नहीं रहना...’’ ।

‘‘अरे….ऐसे कैसे गांव लौट आऊं……अभी कुछ दिन देख लेते हैं…….हो सकता है दो तीन दिनों में लांकडाउन खुल जाए…….’’ । वह कह तो अवश्य रहा था पर था असमंजस में ।

‘‘नहीं…….वो तो आप आ ही जाओ…….’’ । उसकी पत्नी ज्यादा घबरा गई थी ।

‘‘हां…..हां देखता हूॅ….सेठ से पैसे लेने हैं मैं उनसे बात लूं…….फिर आने का सोचता हूॅ…’’

विनोद छिपते-छिपाते वहां तक तो पहुंच ही गया था जहां भोजन के पैकेट बांटे जा रहे थे हांलाकि वह अभी भी कांप रहा था । उसने सड़कों पर पुलिस से लोगों को पिटते देख लिया था । बेदर्दी से पुलिस के लोग आने-जाने वालों को डंडों से मार रहे थे । उसके हाथ-पांव कांप गए । उसे सोहन ने बताया था कि इस जगह पर खाना के पैकेट बंट रहे हैं वह खुद के लिये और अपने परिवार के लिये पैकेट लेकर लौट चुका था । मल्लू भी ले जा चुका था । उसे भी भूख लग रही थी । दो दिनों से उसने केवल दो ही रोटी खाई थीं । उसके पास तो वैसे भी खाने के लिये ज्यादा कुछ रहता नहीं था । वह दन रोटियों को ही पानी के साथ चबा-चबा कर अपनी भूख मारता रहा । इसलिये जैसे ही उसे खाना के पैकेट बंटने की जानकरी मिली वह भी डरते कांपते कमरे से निकल पड़ा । गलियों से होकर वह उस स्थान में पहुंच भी गया जहां खाना बंट रहा था । पुलिस के लोग तो वहां भी खड़े थे……वह कांप गया…..उसका मन हुआ कि वह लौट जाए पर लगा कि जब इतनी दूर आ ही गया है तो पैकेट ले ही ले । पुलिस वाले ही खाना का पैकेट बांट रहे थे । उसने कांपते हाथों से पैकेट लिया ‘‘सर जी एक पैकेट और….मिल….जाता….’’ । वह बहुत भयभीत था । उसने सोचा था कि एक पैकेट और मिल जायेगा तो शाम का खाना भी निपट जायेगा । जो पैकेट बांट रहा था उसने उसके हाथों में एक पैकेट और रख दिया । विनोद में एक पैकेट अपने पेंट की जेब में रख लिया और एक पैकेट हाथ में लिये लौट पड़ा ।

           विनोद की पीठ पर जोर से डंडा पड़ा था वह पेट के बल गिर गया । उसके गिरते ही बहुत सारे डंडे उसकी पीठ पर पड़़ते रहे वह केवल जोर-जोर से ‘‘बचाओ-बचाओ’’ चिल्ला रहा था । उसे इसी हालत में छोड़कर पुलिस वाले जा चुके थे । विनोद बहुत देर तक कराहता रहा । उसकी हिम्मत उठने की भी नहीं हो रही थी । किसी ने उसके सिर पर हाथ रखा

‘‘अरे तुम……’’ । यह वह ही पुलिस वाला था जिसने उसे दो पैकेट भोजन के दिए थे ।

‘‘अच्छा……मेरे साथियों ने मारा होगा…….’’ उसके चेहरे पर अपने ही साथियों के प्रति घृणा के भाव उभर आए थे । उसने विनोद को उठाया और सहारा देकर एक ओर बिठा दिया । उसे पानी की बाटल भी दी । विनोद ने एक ही सांस में सारा पानी अपने हलक के नीचे उतार लिया । पानी पी लेने के बाद उसे कुछ बेहतर लगा । उसने धन्यवाद के भाव से उस पुलिस वाले की ओर देखा जो उसे ही देख रहा था । ‘‘देखो भाई…….तुम यहां से चले जाओ…..मेरे साथियों का कोई भरोसा नहीं…वे तो कुछ समझने की कोशिश भी नहीं करते और डंडे चलाने लगते हैं…….’’ ।

विनोद कुछ नहीं बोला । उसने उठने की कोशिश की पर उसका सारा वदन कराह उठा ।

‘‘अच्छा चलो…..मेरा हाथ पकड़ लो…..मैं तुम्हें छोड़ देता हूॅ….कहां रहते हो……’’ उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया ।

               दूसरे दिन भी वो ही पुलिस वाला उसके लिए खाना का पैकेट लेकर आया था ‘‘अब कैसे हो तुम...’’ । उसने पैकेट विनोद के हाथ में रखते हुए पूछा । विनोद की आंखें भर आईं । कल से वह आज तक कई बार अपनी आंखों को नम कर चुका था । उसे अब यहां रहने का बिल्कुल मन हो रहा था । उसने जानबूझकर घर पर फोन नहीं लगाया था । वह जानता था कि यदि उसने फोन लगाया तो वह बात करते हुए रो न पड़े । उसके रोने से घर के सारे लोग चिंतित हो जायेंगें । उसे बहुत दर्द हो रहा था इसलिये वह उठा भी नहीं । आज जब वही पुलिस वाला उसके लिये खाने का पैकेट लेकर आया तो उसकी आंखों अपने आप नम होती चलीं गई । कल से उसके पास में रहने वाले उसके गांव के लोग भी उसकी खोजखबर लेने नहीं आये थे ।

‘‘कहां के रहने वाले हो…….’’

‘‘जी सांवरी का…..वो मध्यप्रदेश में है….’’

‘‘ओहो….अकेले रहते हो………घर चले जाओ……ये लांकडाउन तो लम्बा चलेगा……ऐसे यहां कैसे रहोगे’’ । वह मौन रहा ।

‘‘वैसे तो ट्रेन तो बंद हो चुकी है…….?’’

विनोद को इसके बारे में कुछ नहीं मालूम था ।

‘‘अरे………’’ । वह आवाक था ।

‘‘हां……कैसे जा पाओगे………’’ पुलिस वाले के स्वर में चिन्ता झलक रही थी ।

विनोद को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले ।

‘‘अच्छा ठीक है तुम देख लो…..मैं चलता हूॅ……यदि मुझे कुछ जानकारी लगती है तो बताउंगा’’

पुलिस वाला तो चला गया पर विनोद यूं ही बैठा रहा खामोश । उसके दिमाग में एक ही प्रश्न था कि अब वह अपने घर कैसे लौटेगा ।

          सप्ताह भर का समय इसी उहापोह में निकल गया । सभी के चेहरों पर एक ही प्रश्न अनकहे दिखाई दे रहा था कि ‘‘अब क्या करें...’’ । ट्रेन नहीं चल रहीं थीं, बसें भी बंद थीं बहुत सारे लोग पैदल ही अपने गांवों की ओर निकल चुके थे पर वे पैदल भी नहीं जा सकते थे उनका गांव तो बहुत दूर था । संठ से संपर्क नहीं हो पा रहा था । बाहर पुलिस की मुश्तैदी बढ़ गई थी । मुश्तैदी बढ़ने का मतलब विनोद समझ चुका था । वह अपने ही कमरे में घुटन भरा जीवन जी रहा था । भाई का भी फोन आया था उसने भी गांव चलने की बात की थी पर किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि गांव जायें तो जायें कैसे ।

          बहुत सारे लोगों ने मिलकर एक बस को किराये पर ले लिया था । इसकी सलाह उस पुलिस वाले ने ही दी थी और उसी ने बस उपलब्ध भी करा दी थी । साठ लोगों के हिसाब से किराया आपस में बांट लिया था । बस में उसका भाई भी था और गांव के सभी लोगों के अलावा भी कुछ लोग और थे । ये सभी लोग भी लांकडाउन में फंस गए थे । कुछ लोगों के पास तो इतने पैसे भी नहीं थे कि वे बस का किराया दे सकें उन्होनें गांव पहुंचने के बाद पैसे देने का वायदा कर दिया था । वैसे तो हजारों लोग अपने घर लौटने के लिये ऐसे ही मारे-मारे परेशान हो रहे थे यदि उसे उस पुलिस वाले ने सहयोग न दिया होता तो वे भी वहीं पड़े परेशान हो रहे होते । हामीद भी ऐसे ही परेशान व्यक्तियों में शामिल था । बस में हामीद उसके बाजू में ही बैठा था । तभी उसकी जान पहचान हामीद से हुई । हामीद भी काम के ही सिलसिले में इस शहर में रहने आया था । वह एक आटो गैरिज में काम करता था । विनोद को हामीद के साथ बैठना अच्छा नहीं लग रहा था । उसने इस बात का विरोध भी किया था पर अंत में उसे हामीद को अपने साथ सीट पर बैठाना ही पड़ा ‘‘अरे भाई जान मुझे पास में बिठा लेने में आपको क्या आपत्ती है....आप बेफिक्र रहें हम को छुयेंगें भी नहीं....’’ । हामीद को विनोद के विरोध का बुरा नहीं लगा था । उसके चेहरे पर मीठी मुसकान थी । विनोद पहली बार उस पर निगाह डाली । लम्बा कुरता और छोटा पायजाता, चेहरे पर सफेद दाढ़ी, सिर के बाल मेंहदी से लाल किये गये थे । उसे कुछ नया नहीं लगा आमतौर पर सभी ऐसे ही रहते हैं । विनोद ने खिड़की के पास वाली जगह अपने लिये ले ली और बिल्कुल उससे चिपक कर बैठ गया । हामीद ने भी अपने वायदे के अनुसार उससे कुछ दूरी पर अपने आपको सिकोड़ कर बिठा लिया था । बस चलने तक दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे ।

विनोद ने बस में बैठने के बाद अपनी पत्नी को फोन लगाकर बता दिया था कि वह बस में बैठ चुका है और कल तक गांव पहुंच जायेगा । उसका गांव दूर था बस को वहां पहुंचने में समय तो लगेगा ही । सभी के चेहरों पर अपने घर लौटने कर उत्सुकता और दारूण परिस्थिति से बाहर निकल आने का संतोष झलक रहा था । विनोद खिड़की से बाहर झांक कर प्रकृति से साक्षत्कार करता दिखाई दे रहा था शायद उसने पहली बार प्रकृति का इतना मनोरम रूप देखा था । जीवन की आपाधापी में उसने पेड़ों को तो देखा है पर पेड़ों की सुन्दरता को कभी नहीं देखा था, गांव में उसने कितने खेतों में काम किया, चारा काटा, पर खेत की हरियाली को पहलीबार महसूस किया है, कभी कभी दिखाई दे जाने वाले फूलों के पोैधों को भी वह उत्सुक निगाहों देखता । देखते देखते उसे छपकी आ गई । उसका सिर अंजाने में ही हामीद के कांधे से जा लगा । हामीद ने उसे सहारा दिया । विनोद के सपने अब डरावने नहीं थे ।

          गांव तो बहुत दूर था । बस निरंतर अपने मंजिल की ओर पहंुचती जा रही थी । विनोद कुछ देर से हरारत सी महसूस कर रहा था । वह जबरन अपने आपको सम्भले हुए थे । उसने अपना सिर खिड़की से टिका लिया पर जैसे ही बस का पहिया गड्ढे में आता उसका सिर चोट खा जाता । हामीद उसकी बैचेनी को समझने का प्रयास कर रहा था । वह चाहता था कि विनोद उसके कांधे से सिर लगा ले पर वह ऐसा कह नहीं पा रहा था । वो तो नींद के छौंके में विनोद उसके कांधे पर सिर रख दिया था और जब उसकी नींद खुली थी तो उसने शर्मिंदगी भरे भावों से हमाीद की ओर देखा था उसने फिर से हामीद से दूरी बना ली थी । हामीद तब भी उससे बोला था ‘‘भाईजान....आप मेरे कांधे पर सिर रख लें आपको नींद आ रही है ’’ पर विनोद ने कोई जबाब नहीं दिया और खिसक कर बैठ गया । विनोद की बैचेनी बढ़ती जा रही थी । उसने अपने भाई की ओर देखा जो दूसरी सीट पर बैठा था ‘‘भाई......’’ पर उसने नहीं सुना । हामीद ने जरूर सुन लिया ‘‘क्या हुआ भाईजान.....कोई परेशानी है......’’ । विनोद कुछ नहीं बोला उसने अपना सिर फिर खिड़की से टिका लिया । उसकी बैचेनी बढ़ती जा रही थी । उसे लग रहा था कि उसका सारा शरीर गर्म तवे की भांति होता जा रहा है । उसे संास लेने में दिक्कत महसूस हो रही थी । उसने एक बार फिर अपने भाई को आवाज देने का प्रयास किया पर उसकी आवाज भाई तक नहीं पहुंच पा रही थी । उसने लाचार निगहों से हामीद की ओर देखा । हामीद उसे ही देख रहा था ‘‘क्या भाईजान.....आपके भाई को मैं बुला दूं.....’’ । कहते हुए उसने भाई को बहुत जोर से आवाज दी । बसे में बैठे सभी की नजरें हामीद की ओर उठ चुकी थीं ।

‘‘क्या हुआ……’’ लगभग सभी के प्रश्न एक से थे ।

‘‘ये भाईजान की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है……अपने भाई को पुकार रहे हैं…..’’ । हामीद विनोद के भाई को पहचानता नहीं था ।

‘‘क्या हुआ भाई…….’’ कहता हुआ एक व्यक्ति आगे बढ़ा ।

बस को रोक दिया गया था । विनोद की तबियत और बिगड़ती जा रही थी । किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें ।

‘‘देखिये भाईजान……इन जनाब की तबियत कुछ ज्यादा खराब है…..हमें इन्हें डाक्टर को दिखा लेना चाहिये तब ही हम आगे बढ़ें ’’ । हामीद की आवाज में चिन्ता साफ झलक रही थी ।

कोई कुछ नहीं बोला । पर सभी के चेहरों पर झुंझलाहट के भाव अवश्य आ गये थे ।

‘‘देखिये…..हमको इन्हें डाक्टर को दिखाना ही होगा…….’’ कड़क स्वर थे हामीद के ।

डाक्टर ने निगाह भर कर विनोद को देखकर दूर से ही बता दिया था कि ‘‘मरीज कोरोना पाजिटिव है….इसे फौरन कोविड हास्पिटल लेकर जाओ…..’’ ।

सारे लोग हक्का-बक्का रह गये ।

‘‘अच्छा भला तो था फिर यकायक कैसे कोरोना पाजेटिव हो गया……ये डाक्टर तो कुछ भी बोलते हैं.अपन तो चलते हैं रास्ते में कोई दूसरा डाक्टर मिलगा उसे ही दिखायेगें……’’ । सभी को अपने घर जाने की जल्दी थी इसलिये वे चाहते और समझते हुए भी अपनी-अपनी सलाह दे रहे थे । हामीद बहुत देर तक सारी बातें सुनता रहा फिर यकायक कड़क स्वर में बोल पड़ा

‘‘आप लोग किस टाइप के व्यक्ति हैं…..आपका एक साथी बीमार है….उसे बुखार है….उसकी सांस रूंक-रूक कर आ रही है और आप…..चलने की बात कर रहे हैं…शर्म आनी चाहिये…’’

हामीद कह कड़क आवाज ने कुछ देर के लिये निस्तब्धता तो पैदा की पर वह ज्यादा देर नहीं रह सकी ।

‘‘तो हम क्या करें……ये बीमार है…..तो इनको यहीं छोड़ देते हैं……हम तो नहीं रूकने वाले….’’

हामीद ने घूर कर उस बोलने वाले की ओर देखा । उसके घूरने का प्रभाव किसी पर नहीं हुआ ।

‘‘इनको अकेला बीमारी की हालत में छोड़ दोगे…..क्या इंसानियत है तुम्हारी……’’

‘‘इनका भाई है न……कहां है…….सुनो तुम भी उतर जाओ….अपने भाई का इलाज कराओ और जब वो ठीक हो जाये तो लेकर गांव चले जाना…….’’ । सभी की नजरें विनोद के भाई की ओर उठ चुकी थीं । विनोद का भाई इस घटनाक्रम के लिये तैयार नहीं था । वह घबरा गया

‘‘मैं……अकेला……नहीं….नहीं…..मैं नहीं रूक सकता……’’ । उसने साफ इंकार कर दिया था ।

‘‘तुम सगे भाई हो न……अपने भाई को ऐसी हालत में अकेला छोड़कर जाना चाहते हो…..’’

‘‘तो क्या करूं……इन्हें साथ में रख लो….हम तो अपने गांव में ही इलाज करा लेगें….’’

‘‘अरे उनकी हिम्मत बैठने की हो नहीं रही है……आप कैसे…इन्हें गांव तक ले जायेगें….’’

हामीद ने बहुत तेज गुस्सा आ रहा था । वह अपने गुस्से को दबाये हुए था ।

‘‘तो मैं नहीं रूक सकता…..आप मेेरे साथ रूकें सोहन और मल्लू भी तो मैं रूक सकता हूॅ’’

सोहन और मल्लू जैसे उबल पड़े

‘‘अरे तू हमें क्यों लपेट रहा है अपने साथ…..तेरा भाई है…..तू रूक….’’

‘‘मैंने बोल दिया न कि मैं अकेला नहीं रूक सकता……मतलब नहीं रूक सकता….’’

चारों ओर खामोशी छा गई ।

‘‘तुम लोग तो इंसान भी नहीं हो भाई…..एक भाई अपने भाई के लिये नहीं रूकना चाहता, एक मित्र अपने मित्र के लिए नहीं रूकना चाहता……शर्म आ रही है मुझे…….खैर आप लोग जायें मैं रूकूंगां..’’

हामीद ने अपना फैसला सुना दिया था । सारे लोग उसे आवाक नजरों से देख रहे थे

‘‘देखिये……इन्हें तो मैं जानता तक नहीं हूॅ…..पर इंसानियत को तो जानता हूं…..मैं रूकूंगा….’’

कोई कुछ नहीं बोला । हामदि ने अपना और विनोद का सामान बस से उतार लिया । हामिद को उतारकर बस आगे बढ़ गई थी । हामिद विनोद को गोदी में उठाये कोविड अस्पताल की ओर पैदल ही निकल पड़ा था । उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे ।

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

आपका जन्म 29 अप्रैल 1989 को सेंधवा, मध्यप्रदेश में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर हुआ। आपका पैतृक घर धार जिले की कुक्षी तहसील में है। आप कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। आपने अब तक 8 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया है, जिसमें से 2 पुस्तकें पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मातृभाषा डॉट कॉम, साहित्यग्राम पत्रिका के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 21 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण उन्हें वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं और ख़बर हलचल न्यूज़ के संस्थापक व प्रधान संपादक हैं। हॉल ही में साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन संस्कृति परिषद्, संस्कृति विभाग द्वारा डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' को वर्ष 2020 के लिए फ़ेसबुक/ब्लॉग/नेट (पेज) हेतु अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से अलंकृत किया गया है।