मुझे कोरोना हुआ है

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राधिका ने रोहित के माथे को फिर से सहलाया । माथागर्म था । वह चैंक गई । उसने रोहित के सारे शरीर को छुआ उसे हर जगह वह गर्म ही लगा । उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें उभर आईं । माथे पर अपनी माॅ का स्पर्श पाकर रोहित ने अपनी अलसाई आंखों को खोल दिया ‘‘मम्मी बहुत दुख रहा है ।’’ कहते हुए उसने फिर से अपनी आंखें बंद कर लीं । राधिका ने एक चादर उसके ऊपर डाल दी और उसके माथे को सहलाने लगी । वैसे तो कोरोना जब से शुरू हुआ है तब ही से सारा घर सतर्क हो चुका था । बच्चों का बाहर निकलना तक बंद कर दिया गया था और बड़े भी घर से नहीं निकल रहे थे । चारों तरफ भय का वातावरण था । दिन भर घर के बाहर रहने वाले लोग भी घर के अदंर सिमटे रहने के बाद भी भयभीत थे ।
‘‘नहीं…..नहीं…..रोहित को कोरोना नहीं हो सकता वो तो अभी छोटा है…….’’ राधिका खुद को ही तसल्ली दे रही थी पर वह संष्कित भी थी । यदि सच में कोरोना हो गया तो……..।
वैसे राधिका खुद भी एक प्राईवेट स्कूल में टीचर थी और वहीं उसका इकलौता बेटा रोहित पढ़ता भी था । अभी मार्च में ही तो उसका सातवां जन्मदिन मानाया गया था । दिन भर हंसता-खेलता रहता और सारे घर को परेशान भी करता ‘‘दादी…..देखो आपके बाल तो चांदी के हो गए…..मैं तो एक दिन चुपके सो आपके सारे बाल काटकर बाजार ले जाउंगा और एक अंगूठी बनवा लाउंगा…..’’ । वह अपनी दादी के बालों को खींचता हुआ कहता ।
‘‘अरे….मेरे बाल चिांच रहे हैंे……नहीं मान रहा….तेरी माॅ को बुलाऊं क्या…अरे…छोड़…छोड़ न’’
दादी भी उसकी शरारत को समझती और नाराज होने का अभिनय करतीं ।
‘‘देखो….देखो…..मैंने कितने सारे बाल खींच लिये’’ । रोहित बंद मुट्ठी अपनी दादी को दिखाता । दादी जानती थीं कि उसकी बंद मुट्ठी में कुछ भी नहीं है
‘‘अच्छा…..तू जा…बाजार अभी…..और अंगूठी बनवा ला…..जा…’’
दादी को राहित की शारारत अच्छी लगती । जब तक वह स्कूल में रहता दादी बैचेन बनी रहतीं । वो घर में अकेली हो जाती थी । राधिका और राहित दोनों सुबह जल्दी ही स्कूल चले जाते और दोपहर के बाद ही लौटते तब तक दादी घर में अकेली रहीं आतीं । वो बोर न हों इसलिये घर के रोज के कामों को निपटा देती हालांकि राधिका उन्हें टोकती भी ‘‘अरे माॅ जी आप क्यों काम करती हैं…..आप आराम किया किए जा न…..फिर तो यह शैतान आ जाता है तो आपको आराम करने नहीं देता कम से कम उसके स्कूल जाने पर तो आराम कर लिया करें’’ । राधिका अपनी सास को बहुत स्नेह करती थी और सास भी राधिका को अपनी बेटी ही मानती थी । राधिका के पति की मौत एक एक्सीडेन्ट में हो गई थी तब रोहित पांच साल का था । वे स्कूल में अध्यापक थे । अपने पति की मौत के बाद वह बहुत अकेली हो गई थी । हालांकि सभी ने बहुत प्रयास किया था कि उसकी अनुकंपा नियुक्ति हो जाए पर नहीं हो पाई ‘‘फाईल अभी भी पेंडिंग है’’ । राधिका ने प्राईवेट स्कूल में नौकरी कर ली ताकि उसका टाइम पास भी हो और घर का खर्च भी चलता रहे । उसकी सांस तो पहिले से ही उनके पास ही रह रहीं थीं और वे जातीं भी कहां उनका एक तो बेटा ही था । वह अपनी सास को शादी के बाद से ही अपनी माॅ के स्वरूप् में देखती थ और वैसा ही सम्मान भी करती थी । सास भी उसे बहुत स्नेह करती थी इसलिये दोनो की अच्छी पट भी रही थी । परिवार छोटा था तो राधिका के पैसों से काम चल ही जाता था । पति के न रहने के बाद राहित इस घर का चिराग बन गया था । राधिका तो एक पल के लिये भी उसे अपने सामने से ओझल नहीं होने देती थी । स्कूल में भी वह हर पीरियड के बाद उसे देखने जाती ।
रोहित की तबीयत खराब है । अब क्या करें ? किसी डाक्टर को दिखाने ले जायें और उसने बोल दिया कि उसे कोरोना हो सकता है फिर…’’ । राधिका को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । वह अपनी सासू माॅ के गले लग कर रोनी लगी
‘‘क्या हुआ बेटी…….तुम रो क्यों रहीं हो…’’
‘‘वो….रोहित…….’’
‘‘क्या हुआ उसे…..आज उठा भी नहीं है अभी तक मैं कब से उसकी राह देख रही हूॅ’’
‘‘उसकी तबियत खराब है….’’
‘‘हाॅ…..तो इसमें रोने की क्या बात है…….चलो देखते हैं उसे…’’ ।
दादी के हाथों का स्पर्श पाकर रोहित ने अपनी आंखें खोलीं
‘‘दादी…..कुछ ठीक स नहीं लग रहा है…….’’ उसने दादी के हाथों को जोर से अपने हाथों में दबा लिया ।
‘‘अरे इसका हाथ तो बहुत गर्म है…….’’ उन्होने अपने दूसरे हाथ से रोहित को छुआ । उनके माथे पर भी चिन्ता की लकीर दिखाई देने लगी पर वे अपनी चिन्ता बहु पर जाहिर नहीं होने देना चाह रही थीं क्योंकि वह तो पहिले से ही बहुत परेशान थी सदि उन्हें भी परेशान देखेगी तो उसकी परेशानी और ज्यादा बढ़ जायेगी ।
‘‘बेटी….बुखार तो तेज लग रहा है…..पर परेशान होने की जरूरत नही है तुम हल्दी वाला दूध बना लाओ….बुखार उतर जायेगा…..जब तक मैं बैठी हूॅ रोहित के पास’’
राधिका को कुछ तसल्ली हुई । हल्दी वाले दूध की बात तो टी.व्ही. पर भी हो रही थी । बता रहे थे कि हल्दी वाले दूध पीने से कोरोना होता ही नहीं है । उसके कदम तेजी से किचिन की ओर बढ़ चले वह जल्दी से जल्दी दूध राहित को पिला देना चाह रही थी ।
रोहित का बुखार दोपहर तक कम नहीं हुआ । वह यूं ही आंख बंद किए अपने बिस्तर पर पड़ा रहा । उसे अब सांस लेने में परेशानी होने लगी थी । अब सभी की चिन्ता बढ़ती जा रही थी । क्या करें समझ में नहीं आ रहा था । राधिका ने डाक्टर को फोन लगाने का मन बना लिया ।
‘‘डाक्टर साब रोहित को बुखार है तेज और सांस लेने में भी परेशानी हो रही है’’
‘‘अरे…..ये तो कोरोना के लक्षण हैं………’’
‘‘अब मैं क्या करूं डाक्टर साब…’’
‘‘देखा तुम लोग उससे दूर हो जाओ….क्योंकि कोरोना एक दूसरे से फैलता है…..और सरकारी अस्पताल फोन लगा लो वहां से एम्बुलेंस आ जायेगी……’’
‘‘आप नहीं देख सकते डाक्टर साब……’’
‘‘नहीं…..हम देख भी लेगें तो भी हमें अस्पताल सूचित करना ही पड़ेगा इससे बेहतर है कि आप ही उन्हें बता दें…..जल्दी करें…..उसकी तबियत यदि ज्यादा बिगड़ गई तो दिक्कत होगी’’ ।
डाक्टर साब ने फोन रख दिया था पर राधिका के हाथें रिसीवर अभी भी फंसा हुआ था । वह अस्पताल फोन करने का मतलब समझ रही थी । अस्पताल के कर्मचारी रोहित को ले जायेगें और वह उससे मिल भी नहीं पायेगी । उसकी आंखों से असंू बह रहे थे । राधिका अपने भगवान की मूर्ति के पास बैठी रो रही थी ‘‘प्रभु कुछ करो मेरे लाड़ले को स्वस्थ्य कर दो प्रभु’’ । मूर्ति में भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे ।
एम्बुलेंस के अलावा प्रशासनिक अधिकारियोें की हार्न बजाते वाहनों की आवाज चारों ओर फैल गई थी । वाहनों के घर के सामने खड़े होते ही राधिका के रोने की आवाज तेज होती जा रही थी । आंसू तो दादी के भी बांध तोड़ रहे थे पर वे अपने आपको शांतचित्त किए हुए थी । रोहित ने रूवंय ही अपने एक जोड़ी कपड़े एक थैले में रख लिये थे साथ में साबुन और टूथ ब्रुस भी रख लिया था । एम्बुलेंस के आते ही वह थैला में हाथ में लिये घर के बाहर आ गया था ं एम्बुलेंस में बैठने के पहिले उसने माॅ की ओर देखा जो दूसरी ओर मुंह किए रो रहीं थीं । दादी ने जरूर डाक्टर की हिदायत के बाद भी उसके पास आकर उसे दुलारा
‘‘दादी…..आप माॅ को चुप कराओ न…….’’
‘‘हां तू जा बेटा….और बिल्कुल चिन्ता मत करना तू बहुत जल्दी ठीक हो जायेगा…’’
‘‘ठीक है दादी पर…..माॅ को रोने नहीं देना…..उनसे कहना कि उनका बेटा बहाुदर है और होशियार भी वह अकेले रह लेगा…….ठीक है दादी….माॅ को ध्यान रखना’’
रोहित के एम्बुलेंस में बैठते ही गाड़ियां गंतव्य की ओर दौड़ पड़ी थीं ।
दादी अपने दर्द को अब सहन नहीं कर पा रह थीं । वे अपनी बहु के गले से लगकर रोने लगीं ‘‘बटी ये क्या हो गया……’’ । राधिका तो पहिले से ही अपने आंसू सम्हाल नहीं पा रही थीं । उसके सुबकने की आवाज तेज हो गई ‘‘माॅ वह अकेला अस्पताल में कैसे रहेगा……..वो तो मेरे बिना एक पल भी नहीं रहता….कौन उसे खाना खिलायेगा और कौन उसे दवा देगा……माॅ’’ ।
दोनों रो रहे थे उन्हें चुप कराने वाला कोई नहीं था ।
रोहित को कोविड अस्पताल में एक बेड दे दिया गया था । अस्ताल में बहुत सारे मरीज अपना इलाज करा रहे थे । सभी आश्चर्य से रोहित को देख रहे थे । रोहित अनमना था वह अपने बिस्तर पर आकर लेट गया । उसकी आंखों के सामने अपनी माॅ की रोती हुई तस्वीर उभर रही थी । वह पहली ही बार तो माॅ से अलग हुआ था । उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करेगा और कैसे करेगा । माॅ यदि ऐसे ही रोती रहीं तो कहीं उनकी भी तबियत खराब ने हो जाये । उसकी आंखों से भी आंसू बह निकले ।
‘‘हैलो…….बेटा…….कैसी तबियत है तुम्हारी……..’’
बरसाती पहने कोई आया था शायद डाक्टर साब ही होगें
‘‘जी……अभी ठीक नहीं है……बुखार लग रहा है……’’
‘‘हां आपको बुखार तो है….अभी आपका कोरोना टेस्ट होगा आप तैयार हैं…’’
‘‘जी…….’’
नर्स ने आकर एक काड़ी उसके गले में डाल दी ।
‘‘अब आप रेस्ट करें अभी सिस्टर आपको दवा दे देगी तो आपका बुखार ठीक हो जायेगा’’
‘‘यह कब पता चलेगा कि मुझे कोरोना हुआ है कि नहीं…….’’
‘‘दो दिन बाद….’’ । डाक्टर ने चले चलते उत्तर दिया । रोहित ने अपनी आंखें बंद कर लीं उसे थकान सी लग रही थी । यदि माॅ होती तो वो माॅ को पुकार लेता ‘‘माॅ देखो मुझे दर्द हो रहा है’’
माॅ भी दौड़ी चली आतीं और उसके सारे बदन को सहलाने लगती । माॅ तब तक उसके पस से नहीं उठती जब तक वह सो नहीं जाता । वह कितना भी कहता ‘‘माॅ जाओ…न दादी को भूख लगी होगी उनको खाना दे दो…’’ ।
‘‘मैने दे दिया है…..तू चुपचाप सो जा……मैं तेरे पास से हिलने वाली भी नहीं हूॅ…’’
रोहित की आंखों से आंसू निकलने लगे । माॅ ने तो उसे कभी अकेला छोड़ा ही नहीं आज भी वे अकेला नहीं आने देती यदि मैं ही उन्हें कसम न चढ़ा देता
‘‘नहीं…..मैं रोहित को अकेला नहीं भेज सकती….मैं भी उसके साथ ही अस्पताल जाउंगी…..भले ही मुझे भी कोरोना हो जाए……वहां मेरे बेटे की देखभाल कौन करेगा….मुझ अपनी चिन्ता नहीं है सौ बार कोरोना हो जाए…….’’
‘‘पर माॅ डाक्टर अंकल ने मना किया है आप नहीं आ सकती…’’
‘‘करने दो…मैं तुुझे अकेला नहीं भेज सकती……’’ माॅ रोने लगीं थीं ।
‘‘नहीं माॅ….आप पहले तो मुझसे दूर रहो…..और मुझे ही जाने दो…फिर दादी का ध्यान कौन रखेगा’8
‘‘ तू छोटा है कुछ जानता नही है……मैने बोल दिया न कि मैं तेरे साथ ही ाहूंगी…मतलब रहूंगी…’’
राधिका उठकर अपना बेग तैयार करने लगी ।
‘‘ये तो गलत है माॅ…आप ऐसा नहीं करेंगीं…..आपको मेरी कसम है….’’
‘‘क्या कसम है……तू मेरा बाप बनने की कोशिश मत कर…..’’ । माॅ नाराज हो गई
‘‘अरे….मैं इतना बड़ा तो हो ही गया हॅ कि अपने काम कर सकूं आप बेकार में….’’
राधिका गुस्से में उसके सामने से चली गई फिर तो वे तब भी उसके सामने नहीं आई जब वो एम्बुलेंस में बैठ रहा था ‘‘माॅ नाराज हैं…यदि मैं बीमार नहीं होता तो उनके गालों पर किस कर देता तो माॅ की नाराजी पल भर में दूर हो जाती….पर मैं अभी कैसे करूं अभी तो मैं बीमार हूॅ’’ वह भारी मन लिए ही अस्पताल आया था । उसकी आंखों के सामने से रोती हुई माॅ की तस्वीर ओझल हो ही नहीं रही थी ।
रात का अंधकार फैल जाने के बाद भी घर की बत्तियां नहीं जलाई गई थी । घर में चारों ओर सन्नाटा पसरा था । राधिका तो अचेत सी जमीन पर पड़ी थी और दादी जब से ही दरवाजे पर अनमनी सी बैठी थीं । उनकी उदास आंखें उनके अंदर के दर्द को व्यक्त कर रहे थे । चारों ओर सन्नाटा था । लांकडाउन और कोरोना संक्रमण के कारण कोई भी वैसे भी घर के बाहर निकल ही नहीं रहा था । सभी एक दूसरे से बचने का प्रयास कर रहे थे । उनके घर की उदासी को भी कोई नहीं पढ़ नहीं रहा था । कुछ ठंड सी महसूस हुई तो दादी ने दरवाजा बंद कर लिया । बंद दरवाजे से अंधकार की कुरूपता और बढ़ गई । अंधकार तो होता ही है डरावना, इस डरावने स्वरूप् में यदि सिसकियों की आवाज भी सम्मलित हो जाती है तो उसकी भयानकता भी बढ़ जाती है राधिका का घर रोहित के न होने से डरावना और भयानकता का मिश्रण बन गया था । सासू को अपने पास होने का अहसास करते ही राधिका उनसे लिपट गई ‘‘माॅ मेरा बच्चा कहां है…..उसे लौटाकर ले आओ…….मैं उसके बिना नहीं रह सकती…’’ । उसके आंसुओं की तेज धार ने पहिले से भीगे दादी के आंचल को और भी गीला कर दिया था ।
‘‘माॅ कैसा होगा……मालूम नहीं उसका बुखार ठीक हुआ भी नहीं……उसने कुछ खाया भी नहीं…..क्या कर रहो होगा……मेरा लाड़ला……..’’ । माॅ का दर्द छाती फाड़ रहा था ।
‘‘तुम चुप हो जाओ बेटी…….डाक्टर साब ने उसे दवा दे ही दी होगी और उसकी व्यवस्था भी कर दी होगी । वैसे भी हमारा रोहित समझदार है….तू चिन्ता क्यों कर रही है’’ । वे कह तो रहीं थीं पर वे खुद भी रो ही रहीं थीं
‘‘माॅ देखो कितना सूना घर लग रहा है रोहित के न होने से ’’ राधिका बिलख पड़ी ।
‘‘हाॅ बेटी रोहित के बिना यह घर तो सूना लग ही रहा है पर तू चिन्ता न कर राहित जल्दी ही ठीक होकर आ जायेगा’’ कहते हुए उन्हेाने राधिका को गले से लगा लिया था ।
रोहित की आंख तब ही खुली जब उसे अपने हाथों में सुई जैसा कुछ चुभने का अहसास हुआ । उसने हड़बड़ाकर आंखें खोल ली । नर्स हाथों में इंजेक्शन लिये उसकी बांह को दबा रही थी । रोहित चीख पड़ा ‘‘नो मेम प्लीज मुझे इंजेक्शन मत लगाओ बहुत दर्द करता हे मेम प्लीज…..देखो यहां तो मेरी माॅ भी नहीं है मुझे दर्द होगा तो मैं क्या करूंगा प्लीज रूक जाओ’’
उसने अपने हाथों को समेटने का प्रयास किया पर एक दूसरा व्यक्ति पहिले से ही उसके हाथों को मजबूती से पकड़े हुए था । रोहित पूरी ताकत लगाने के बाद भी अपने ही हाथों को हिला भी नहीं पाया । असहाय रोहित रोने लगा । पर तब तक नर्स उसके हाथों में इंजेक्शन लगा चुकी थी । रोहित दर्द से कराह उठा । नर्स जा चुकी थी रोहित अपने हाथों को पकड़े सुबक रहा था । धीरे-धीरे उसकी सुबकी आंसू में बदल चुकी थी ‘‘माॅ आप अस्पताल ले जा रही हों न तो डाक्टर साब को बोल देना कि वो मुझे इंजेक्ष्रन न लगायें…मुझे डर लगता है न’’
‘‘अरे मेरा बहादुर बेटा जरा से इंजेक्शन से डरता है……..तुम चिन्ता मत करना मैं तुझे अपनी गोद में ले लूंगी तो तुम्हें दर्द भी नहीं होगा और डर भी नहीं लगेगा’’ । माॅ उसे गोद में उठा लेतीं और अपनी बातों में उलझा लेती तब तक नर्स इंजेक्शन लगा देती । वह चीखता तो माॅ उस स्थान को चूम लेती ‘‘देखो तुम्हारा सारा दर्द मैंने चूस लिया है’’ वह जोर से माॅ की गोद से चिपक जाता । पर यहां तो माॅ है ही नहीं । माॅ ने चूम लिया होता तो उसको दर्द हो ही नहीं रहा होता । उसने अपनी बांह को उस स्थान को देखा जहां इजेक्शन लगा था । उक फुंसी सी उभर आई थी । वह फिर रोने लगा माॅ की गोद होती तो वह चिपक जाता । उसने तकिया को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया और चिपक गया । मानो माॅ के आंचल से चिपका हो । उसे माॅ की भी चिन्ता हो रही थी ‘‘माॅ जरूर उसके बिना परेशान हो रहीं होगीं….बार-बार आवाज दे रहीं होगी….‘‘रोहित…रोहित……कहां हो भाई’’ । वो कभी माॅ को परेशान करना होता ने तो ऐसे ही कहीं छिप जाता फिर माॅ सारे घर में ढूंढ़ती फिरती और आवाज लगाती रहती । फिर वह अचानक उनके सामने आ खड़ा होता माॅ उसे देखते ही सीने से लगा लेती ‘‘देख बेटा तू ऐसी शरारत बिल्कुल नहीं किया कर …एक पल भी तुझे नहीं देखती तो मैं पागल हो जाती हूॅ’’ वे रोने लगतीं । पर आज तो वो छिपा नहीं है बल्कि उनसे दूर आ गया है वो भी बीमारी की हालत में माॅ जरूर परेशान हो रहीं होगीं रो रहीं होगीं । माॅ की याद आते ही उसके आंसू और तेज हो गये । वह तकिये से उन आंसुओं को पौछता रहा । यहां उसके सिर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं था ।
‘‘बेटा कुछ खाओगे….किसी ने माॅ जैसे ही उसके सिर पर हाथ रखा था । रोहित चैंक गया ‘‘माॅ…’’ उसके आंखें खोल लीं । सामने माॅ नहीं थी एक बुजर्ग महिला थी । यह भी यहीं भरती थी । जब से रोहित आया था वे उसे देख रही थी । उनका मातृत्व उसे देख कर उमड़ रहा था । इंजेक्शन लगाते समय जब वह रोया था उनको भी बहुत दर्द हुआ था । इसलिये वे उसके पास चलीं आई थीं ‘‘बेटा…..ये लो…बिस्कुट खा लो……’’ उन्होने प्यार से उसका माथा सहलाया । बहुत देर से अपने अकेलेपन से संघर्ष कर रहे रोहित को उनका स्पर्श अच्छा लगा ‘‘नहीं…. ….मुझे कुछ खाने का मन नहीं है….’’ ।
‘‘खा लो….बेटा…यहां तुम्हारी माॅ नहीं आयेगीं खिलाने…और खाओगे नहीं तो जल्दी से स्वस्थ्य कैसे होगे’’ उनकी वाणी में स्नेह बरस रहा था । रोहित चुचाप उनके हाथ से बिस्कुट का पैकेट ले लिया । उसे अहसास हुआ कि भूख तो उसे वाकई लगी ही थी । वह चुपचाप एक-एक बिस्कुट खाता रहा और सो गया ।
राधिका अपनी सास के साथ ऐन सुबह ही अस्पताल पहुंच गई थी । दोनों की रात जागते ओर रोते हुए ही व्यतीत हुई थी । रोने और जागने के निशान उनके चेहरे पर साफ परिलक्षित हो रहे थे । उन्होने रात को ही तय कर लिया था कि सुबह उठते ही वो अस्पताल जायेगीं और अपने बेटे से मिलेगीं । अस्पताल तो वे पहुंच गई पर चैकीदार ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया
‘‘प्लीज भाई साहब मुझे मेरे बेटे से मिलना है अंदर चले जाने दो’’
‘‘देखिए ये कोविड अस्पताल है……सरकारी अस्पताल नहीं कि कोई भी अंदर चला जाए….’’
‘‘मेरा बेटा कल से यहां भर्ती है आप मुझे मिल तो लेने दो…’’
‘‘कोविड अस्पताल के अंदर केवल सरकारी कर्मचारी या डाक्टर ही जा सकते हैं……’’
‘‘प्लीज भाई साहब…..मेरे बेटा बहुत छोटा है…..और कल से यहां है……’’
‘‘आप पढ़ी लिखी दिख रही हैं फिर भी इस तरह की बात कर रहीं हैं…….यहां कोरोना वाले पेशेन्ट ही भर्ती होते हैं और उनसे कोई नहीं मिल सकता……’’
‘‘प्लीज……’’
‘‘नहीं…न……आप गेट से दूर हो जायें’’ । चैकीदार ने गुस्से से बोला जरूर था पर वह माॅ की ममता को समझ भी रहा था । पर वह भी क्या करे । वह मजबूर है । यह बीमारी ही ऐसी है कि एक दूसरे से फैलती है……..वह किसी को भी अदंर जाने की अनुमति नहीं दे सकता । उसने अपना चुहरा दूसरी ओर घुमा लिया था । वह नहीं चाहता था कि वह रोती हुई महिला को देखे ।
राधिका और उसकी सास असहाय सी एक ओर खड़ी हो गई थीं । उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें । वे रोहित से मिले बगैर नहीं जायेंगीं यह दृढ़ निश्चय जरूर वे कर चुकीं थीं ।
रोहित को भी रात को नींद नहीं आई थी । उसे बगैर माॅ के नींद आती ही नहीं है । कभी आंखों में झपकी आ भी जाए तो कुछ ही देर में वह हडबड़ा कर जाग जाता ‘‘माॅ…’’ फिर तकिया को सीने से लगा कर रोने लगता । रात भर वह ऐसा ही करता रहा । सुबह वह महिला ही उसके पास आई थी ‘‘चलो बेटा…..मेरे साथ चलो……मुंह-हाथ धो लेना मैं भी मंजन कर लूंगीं…’’ । रोहित को अब वह महिला अपनी सी लगने लगी थी । वह उसके साथ चला गया । उसने ही उसे दूध दिया था और बिस्कुट भी । रोहित को आज अपनी तबियत ठीक लग रही थी । उसने निगाह भर वहां अपने-अपने बेड पर लेटे सारे लोगों को देखा । वह उठा और एक मरीज के पास जाकर खड़ा हो गया ‘‘अंकल…..आप को दर्द हो रहा है….मैं आपके पैर दबा दूं…’’ ।
‘‘नहीं बेटा……तुम जाओ……’’ । रोहित ने उनके माथे को सहलाया और फिर अपने बेठ पर आकर बैठ गया । थोड़ी देर बाद वह फिर उठा और एक दूसरे मरीज के पास जाकर बैठ गया ।
‘‘कुछ चाहिए बेटा…….’’
‘‘नहीं अंकल….मैं तो आपका हाल जानने आया था……’’
‘‘मैं तो ठीक हूॅ बेटा……कल मेरी छुट्टी भी हो जायेगी……पर तुम अपना ध्यान रखना’’
रोहित सारे मरीजों से मिल चुका था । अब क्या करे । आज वह स्वस्थ्य महसूस कर रहा था । उसका मन हो रहा था कि कोई उससे बात करे । यदि वह चुप बैठा रहेगा तो माॅ की याद आयेगी । माॅ की याद आते ही उसकी आंखांे से आंसू बहने लगते थे । वह जबरदस्ती अपने आंसुओं को दबाये हुए था । माॅ भी तो उसकी याद कर रही होगी और दादी भी । दादी तो बाहर बैठी होंगीं । वह उन्हें इक्सर बाहर बैठे ही देखता था ‘‘आप यूं बाहर ही क्यों बैठीं रहतीं हैं’’
‘‘मुझे अंदर अच्छा नही लगता……और फिर तेरी राह भी तो देखना होती हे मेरा लाड़ला आयेगा’’
दादी बाहर बैठकर उसके आने का इंतजार कर रहीं होगीं । पर वह जायेगा कैसे उसे तो कोई जाने ही नहीं देगा । उसने सिर उठाकर उन दादी को खोजने का प्रयास किया जिनके साथ वह सुबह मंुह-हाथ धोने गया था । वह लगभग दौड़ता हुआ उनके पास जाकर खड़ा होगया
‘‘अरे….क्यों बेटा…कुछ चाहिये……’’ बहुत प्यार से उन्होने बोला था । उसे लगा जैसे उसकी दादी ही उससे बात कर रहीं हों ‘‘मुझे माॅ की याद आ रही है…….’’ । अपनी आंखों को हाथों से ढंक लिया था रोहित ने ताकि उसके आंसू दिखाई न दें
‘‘आ………मेरे पास बैठ………मेरा लाड़ला बेटा आ जा मैं हूॅ न….’’
उन्होने उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगीं ।
‘‘दादी माॅ से कब मिलूंगा……माॅ कब आयेगी…..मुझे लेने…’’
‘‘देखो बेटा…माॅ यहां तो आ ही नहीं सकती……ये अस्पताल है न यहां केवल जो बीमार होते हैं न वो ही आ सकते हैं……यहां मैं हूॅ न…….तुम तो बहुत समझदार बेटा हो…….तो जल्दी से ठीक हो जाओ फिर माॅ के साथ ही रहना….’’ बुजुर्ग महिला की आंखें भी भर आई थीं ।
‘‘ठीक है दादी…….मैं जाऊं अपने बिस्तर पर….’’ । रोहित ने उत्तर भी नहीं सुना ।
दोपहर को डाक्टर की गाड़ी को देखकर राधिका उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई थी ‘‘डाक्टर साब मेरा बेटा रोहित यहां भर्ती है……मै उससे मिलना चाहती हूॅ’’
‘‘अच्छा रोहित…..बहुत प्यारा बच्चा है……कल उसका टेस्ट तो हो गया है रिपोर्ट कल तक ही आयेगी’’
‘‘मुझे उससे मिलवा दें प्लीज…..’’ अब दादी ने भी हाथ जोड़ लिये थे ।
‘‘देखा वो कोरोना का पेशेन्ट है आप तो जाने ही हैं कि कोरोना के पेशेन्ट को किसी से मिलने नहीं दिया जाता ताकि वह बीमारी न फैले……’’
‘‘वो बहुत छोटा है डाक्टर साब कभी हमारे बगैर रहा भी नहीं है……’’
‘‘हां मैं जानता हूॅ……पर आप चिन्ता न करें …….वहां उसको कोई परेशानी नहीं होगी उसको मैं अभी जा रहा हॅू तो नर्स को और बोल दूंगा…’’
‘‘प्लीज डाक्टर साब एक बार मुझे उसे दूर से ही दिखा दो…….’’
‘‘देखो …आप ऐसा न करें तो बेहतर है……कुछ दिनों तक आप उससे न ही मिलें’’
डाक्टर साब की गाड़ी अंदर की ओर मुड़ गई थी । राधिका बहुत देर तक यूं ही गेट के पास खड़ी रही फिर दोनों अपने घर लौट आये ।
रोहित स्वस्थ्य होकर अपने घर लौटा था । राधिका उसे बहुत देर तक अपने सीने से लगाये रही थी । आज फिर घर में रौनक लौट आई थी । दादी ने बाहर ही अल्पना सजा दी थी जहां रोहित को बैठाकर आरती उतारी गई थी । रोहित के साथ वो ब ुजुर्ग महिला भी थी उनकी भी आज ही अस्पताल से छुट्टी हुई थी । उन्हेाने पूरे समय रोहित का ध्यान रखा था । रोहित उन्हें अपनी माॅ से मिलवाने जबरदस्ती लेकर आया था । राधिका भावावेश में उनके चरणों पर गिर गई थी ।
‘‘नहीं बेटा…..तुम्हारा लाड़ला छोटा जरूर है पर बहुत समझदार है उसने अपने बलबूते पर कोरोना को हराया है….देखना एक दिन यह बहुत बड़ा साहब बनेगा’’
रोहित अब तीनों की गोद में खेल रहा था ।

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा (म.प्र.)

नाम: कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

पिता का नाम: स्व. श्री जीवनलाल जी श्रीवास्तव

माता का नाम: स्व. श्रीमती हरकुंवर बाई श्रीवास्तव

अग्रज ‘ साहित्यकार नरेन्द्र श्रीवास्तव

शिक्षा: स्नातक

संप्रति: सलाहकार संपादक राजनीतिक क्रांति, भोपाल

प्रकाशित कृतियां: कहानी संग्रह – 7
व्यंग्य संग्रह – 10
सहित 30 कृतियां प्रकाशित

सम्मान: करीब 52 सम्मान प्राप्त

स्थायी पता : महाराणा प्रताप वार्ड, पलोटन गंज, गाडरवारा

               जिलाः नरसिंहपुर (म.प्र.)
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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।