किसे ढूंढ रहें हो

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कल से कल तक में
आज को ढूंढ रहा हूँ।
जीवन के बीते पलो को,
आज में खोज रहा हूँ।
शायद वो पल मुझे
आज में मिल जाये।।

बीत हुआ समय,
कभी लौटकर नही आता।
मुंह से निकले शब्द,
कभी वापिस नही आते।
इसलिए बहुत तोलमोल कर,
शब्दो को सदा बोलना चाहिए।
जिससे सुनने वाला आपकी,
वाणी से आपका हो जाये।।

दिल और मन
बहुत छोटे होते हैं।
दोनों पर वाणी का बहुत,
जल्दी असर होता हैं।
जिससे कभी कभी बड़े,
दुश्मन भी दोस्त बन जाती हैं।
और कभी कभी बने बनाये,
रिश्ते भी बिगड़ जाते हैं।।

वैसे तो इस युग में कोई,
किसी का होता नहीं।
पर भी कुछ झूठे और
मायाचारी रिश्ते होते हैं।
जो दिल दिमाग और,
मन से सोचता हैं।
वो कलयुग में भी जीवन,
हंसते खिलखिलाते जीत हैं।।

संजय जैन (मुम्बई)
जय जिनेन्द्र देव की

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।