जरा ठहर जाओ

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कहीं छुट ना जाय,
ज़रा ठहर जाओ,
कहां भाग रहे,किस ओर जाना है?
सृजन तो यहां है, कलियां मुस्कुराती,
कोयल गीत गाती, भौंरा करता गुनगुन,
धूप-छांव सुहलाती, तितली है खेलती।
तो फूल भाव दिखाते, मिलने को दो-दो मन,
आतुर इतराते, सुंगध आम्र बौरों की,
मदरसा भर जाती और ये चिड़िया ची ची करती जाती।
पीला धुला हुआ उजास,मन भर जाता।
प्रेम यहां गुनगुनाता,
कहां जा रहे,
जरा ठहरो,
कहीं फिर छुट ना जाय,आओ बसंत देख ले।

नाम-रेखा पारंगी
साहित्यिक उपनाम रेखा पारंगी

पतास्टेशन जंवाई बांध,जिला पाली राजस्थान।
शिक्षास्नातकोतर , अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान,एवं इतिहास। कार्य क्षेत्रसरकारी शिक्षक।
विधागध एवं पध। प्रकाशनवूमेन एक्सप्रेस समाचार पत्र एवं इंदौर समाचार पत्र में।
उपलब्धि कोई नहीं
लेखन का उद्देश्य_लिखना मेरा शौक है और हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में सहयोग।

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।