लॉकर

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मिर्जा का शरीर बढ़े रक्तचाप के लपेटे में आ गया था| डॉक्टर ने दवाई के साथ कुछ परहेज भी बांधे थे| मिर्जा का मन परहेज का आदी न था| उठते बैठते मुये डॉक्टर को सौ-सौ लानते भेजते|
“रोटी में थोड़ा घी तो चुपड़ दिया करो| सूखी रोटी हलक से नीचे नहीं उतरती|”
बेगम भी तो मजबूरी की राह पकड़े थी|रसोई दोनो दुल्हनों के हाथ आ गयी थी| कहाँ से बेगम रोटियों में तरावट डालती| परहेज के नाम पर कितने स्वांग रचे जा रहे थे,ये बेगम अपनी आँखो देख आयी थी|
मिर्जा की लपलपाती जीभ का भी अंत नहीं| घर में मनपसंद खाना न मिलता,मगर बाजार तो खुले थे| सूखी रोटी से अजीज मिर्जा ने उसी दम,दाल भरी दो-चार कचौरियां मगँवायी| साथ में सोंठ की चटनी और प्याज के कतले| तब जाकर उनकी जीभ को जन्नत मिली| मिर्जा की रोज की आमद देख,बेशक बेगम लानत-मनालते भेजती मगर उन पर दमड़ी का असर न बैठता|
मिर्जा की तरावट देख एक दिलजले की जुबान कोयला हो गयी और बाजार में ये खबर उड़ी कि मिर्जा की बैंक में नोटो और जवाहरतो की ढेरी लगी हैं| उनकी दोनो औलद कुढ़ कर जल उठी|घर की बात घर में नहीं पता और बाजार रोशन हो गया| उस मुँहजले की बात का मगर असर ये हुआ कि दोनो औलादे मय बीवी मिर्जा की खिदमत में उतर आये| मिर्जा की बदपरहेजी उनकी जिदंगी का दोजख हो गई और वे अल्लाह अल्लाह करते अल्लाह के हो गये|
मिर्जा के बाद बीवियों ने लाख बेगम को घेरा पर वे लॉकर के अंदर का हाल न जान पायी|बेगम को मिर्जा ने अपनी तरह काढ़ लिया था|बेगम भी मिर्जा की राह चली और मिर्जा की तरह ही दूनिया से रूखसती ली|
अम्मी की कुच के बाद दोनो बैंक की ओर लपके| गढ़ा खजाना मिलने की खुशी उनके चेहरे पर चिपटी थी| पर लॉकर में तो सन्नाटा खिचां था|नोटो की गड्डियाँ ख्वाबी महल साबित हुये| हाँ,जेवर के नाम पर खरे सोने की आदम जमाने की दो अगुँठियाँ बरामद हुई|और एक खतः
” परसी थाली जब सामने से हटती हैं, तब कैसा लगता हैं, आज तुम दोनो को इसका अहसास हुआ होगा| शुक्र मनाओ कि मकान का मुलम्मा तुम दोनो के नाम पर चढ़ा हैं| और फिर जैसी हमारी कटी वैसे ही तुम्हारी भी कट जायेगी|”

अंजू निगम, देहरादून

परिचय

दैनिक जागरण”,”इंदौर समाचार”,”वीणा”,”कलमकार”,”अद्भुत समाचार”,”दृष्टि”,”सत्य की मशाल”,”द राईजिंग स्टेप”,”न्यूज टुडे,”लोकमत समाचार” में मेरी कहानियाँ एंव लघुकथा छप चुकी हैं|इसके अलावा “आकाशवाणी इंदौर”से मेरी तीन कहानियाँ प्रसारित हो चुकी हैं|साहित्य पीडिया द्वारा प्रेषित काव्य संग्रह में मेरी कविता को स्थान,सम्मान एंव प्रशस्ति पत्र मिल चुका हैं|क्षितिज द्वारा आयोजित”अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन”में भी मेरा लघुकथा वाचन,सम्मान एंव प्रशस्ति पत्र मिल चुका हैं| नदी अभियान से जुड़ी हूँ| जिसके तहत हाल ही में मुझे”यमुना सम्मान” मिल चुका है| “स्टोरी मिरर” द्वारा प्रशस्ति पत्र प्राप्त हो चुका है|

 न्यूज टुडे, लोकमत समाचार, समाज्ञा  स्टेप अहेड, उत्कर्ष एक्सप्रेस में भी रचना प्रकाशन|   अलावा इसके संस्कार भारती द्वारा आयोजित काव्य समारोह में काव्य पाठ एंव सम्मान|हाल ही में मेरी लघुकथा का पंजाबी अनुवाद हुआ है| दिल्ली लघुकथा अधिवेशन में सम्मान|आकाशवाणी देहरादून से लघुकथा का पाठन एंव प्रसारण|

पता:- श्रीमती अंजू निगम, देहरादून

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।