क्षमापना जीवन का महत्वपूर्ण कर्तव्य

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‘मुझे क्षमा कर दिजिए मेरी वजह से आपको दुःख पहुँचा’ यह कहना बड़े साहस का काम है।शायद इसी लिए क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है। क्षमा करना उतना कठिन नहीं है जितना क्षमा मांगना। गलती करना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हम सभी अहंकार या प्रमादवश गलती करते हैं, किसी की अवहेलना करते हैं, किसी का अपमान करते हैं। लेकिन हमें अपनी गलती का अहसास हो गया हो तो साफ मन से क्षमा याचना करके गलती से होने वाले गंभीर परिणामों का टाला जा सकता हैं।

क्षमा एक ऐसा शब्द है, जो ये दर्शाता है कि आप अपने किये किसी गलत काम के लिए शर्मिंदा हैं और साथ ही इस एक शब्द का इस्तेमाल करके आप, गलती हो जाने के बाद किसी भी रिश्ते को सुधार भी सकते हैं। क्षमायाचना का भाव तभी आता है, जब दुखी हुआ इंसान, उस सामने वाले इंसान के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश करना चाह रहा है, जिसे दुःख हुआ है। क्षमा मांगना कोई विशेष कला या ज्ञान नहीं। यह तो केवल इस पर निर्भर है कि आप स्पष्ट रूप से सत्य बोल पाते हैं कि नहीं। जब हमें वास्तव में अपने कार्य पर पछतावा होता है, तो सही शब्द स्वत: ही बाहर आने लगते हैं और क्षमा मांगना अत्यंत सरल हो जाता है।

वास्तव में क्षमा याचना विश्वास का एक पुनःस्थापन है। इस के द्वारा आप यह कह रहे हैं कि मैंने एक बार आप का विश्वास तोड़ा है किंतु अब आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं और मैं ऐसा फिर कभी नहीं होने दूँगा। जब हम एक भूल करते हैं, तो दूसरे व्यक्ति के विश्वास को झटका लगता है। अधिकतर सकारात्मक भावनाओं की नींव विश्वास ही होती है।

एक सच्ची क्षमा याचना में “यदि” और “परंतु” जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं होता। यह कहना कि आप ने ऐसा क्यों किया इसका भी कोई अर्थ नहीं। सर्वश्रेष्ठ क्षमा याचना वह है जहाँ आप यह पूर्ण रूप से समझें, महसूस करें तथा स्वीकार करें कि आप के कार्यों ने अन्य व्यक्ति को ठेस पहुँचाया है। एक कारण या औचित्य दे कर अपनी क्षमा याचना को दूषित न करें। यदि आप सच्चे दिल से क्षमा नहीं मांगते हैं तो आप अपनी क्षमा प्रार्थना का नाश कर रहे हैं। इस से दूसरे व्यक्ति को और अधिक कष्ट होगा। आप एक क्षमा याचना अथवा एक बहाने में से केवल एक को ही चुन सकते हैं, दोनों को नहीं।

संसार के प्रत्येक धर्म और दर्शन में क्षमा को आत्मोन्नती के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। जैन धर्म में क्षमापना को जीवन का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य बताया गया है। ‘क्षमापना का अर्थ है क्षमा मांगना भी और क्षमा करना भी।‘ जीवन में कोई भी व्यवहार हो जब परस्पर रूप से दोनों और से निभाया जाता है तो ही सार्थक होता है। एक सच्ची एवं निष्कपट क्षमा याचना वह होती है जिस में आप अपने अपराध को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं। किंतु यदि अन्य व्यक्ति आप की क्षमा प्रार्थना स्वीकार नहीं करते है तो भी आप प्रयास जारी रख सकते है। एक क्षमा के बदले हमेशा एक और क्षमा आती है, फिर भले ही वो आपके द्वारा ही किसी बात का अहसास होकर आए या फिर सामने वाले इंसान के द्वारा, हो सकता है कि उसे लगे, कि इस बहस में वो भी बराबर के हिस्सेदार हैं, और वो आपसे क्षमा माँगने लगें। आप भी क्षमा करने के लिए तैयार रहें।

#संदीप सृजन

उज्जैन

matruadmin

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।