संवाद होना चाहिए…

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naroliya
प्रायः यह देखा गया है कि,आज की युवा पीढ़ी जिन्दगी को जीना नहीं चाहती,बल्कि उड़ना चाहती है। पा लेना चाहती है सबकुछ, कुछ ही पलों में। धैर्य,शान्ति,सबर जैसे शब्द तो जैसे उनकी जिन्दगी में ज्यादा मायने ही नहीं रखते। ऐसे हालातों में संवाद ही एक ऐसा जरिया है,जिससे युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाई जा सकती है,क्योंकि संवादहीनता कभी-कभी दूरियां बढ़ा देती हैं और ये दूरियां धीरे-धीरे रिश्तों में एक अजीब-सी खाई का रुप ले लेती है जिसे फिर कितना भी पाटो,वह नहीं भरती है। संवादहीनता से उत्पन्न दूरी अक्सर परिवार में तनावपूर्ण माहौल पैदा कर देती है,जिसे चाहकर भी आप सामान्य या खुशनुमा नहीं बना पाते हैं। फिर सिलसिला चल पड़ता है एक-दूसरे पर दोषारोपण का। माँ-बाप अपना पल्ला छाड़ लेते हैं,ये कह कर कि ये तो है ही शुरु से गलत,कभी हमारी सुनी ही नहीं,कभी हमें बताया इसने कि ये क्या चाहता है। तो बच्चा झुंझलाता फिरता है कि अब सबको मेरी फिक्र हो रही है,तब कहां थे जब मैं अपनी बातें आपसे कहना चाहता था। तब तो आपके पास समय ही नहीं था मेरे लिए। अपनी जिन्दगी में आप इतना व्यस्त थे कि आपको समय ही कहां था मुझसे बात करने का। तब तो मैं हमेशा अंदर-ही-अंदर घुटता रहता था और कमरे में रो-रोकर सो जाता था। दिल चाहता था कि कोई आए और मुझसे पूछे कि बेटा क्या हुआ है, क्यों रो रहा है तू,क्या तकलीफ है तुझे! हमें बता,हम हैं न तेरे साथ,हम दूर करेंगे हर मुश्किल को..,पर तब तो कोई नहीं आया,उल्टा डाँट दिया जाता था यह कहकर कि घर का माहौल मत बिगाड़ो।
अक्सर होता ये है कि,एक उम्र के बाद हर एक बच्चे को एक ऐसे दोस्त की जरुरत होती है जिससे वह अपनी बात कह सके। अपने दर्द बांट सके और अपनी खुशी का इजहार कर सके। उससे पूछ सके कि वह सही कर रहा है या गलत,या उसे इन हालातों में क्या करना चाहिए या क्या नहीं। पहले-पहल वह ऐसा ही दोस्त अपने पिता,अपनी माँ और अपने भाई-बहनों में तलाशता है। जब उसे यह दोस्ताना माहौल और संवाद करने की अपनी चाह परिवार में पूरी होती नजर नहीं आती, तो उसकी तलाश अपने इर्द-गिर्द पनपते नए-नए दोस्तों और सहपाठियों में शुरु हो जाती है। ऐसे में अगर कोई सही दोस्त उसे मिल गया तब तो हालात बिगड़ने से बचने की गुंजाइश होती है, मगर उसकी तलाश किसी गलत शख्स पर आकर ठहर गई तो फिर हालात बद-से-बदतर होते चले जाते हैं। फिर उसे आप लाख समझाओ कि, वह जिसके साथ है वह गलत है,दिशा से भटका हुआ है तुम्हें भी भटका रहा है मगर वह नहीं सुनता क्योंकि उसे तो उसी में अपना सुख नजर आने लगता है। उसे लगता है यही वह दोस्त है जिसकी उसे तलाश थी,यही तो मेरी सुनता है, तो यह गलत कैसे हो सकता है। ऐसे हालातों में अगर आपका बच्चा बुद्धिमान है,समझदार है तो वक्त के साथ-साथ उसे इस बात का अहसास हो जाएगा कि उसने जिसका दामन थामा है वह गलत है और उसकी सोहबत में वह खुद भी दिशा भटक रहा है। जैसे ही उसे इस बात का अहसास होगा, वह खुद ही उसका साथ छोड़कर सही दिशा की ओर बढ़ने लगेगा, मगर हालात फिर वहीं आकर खड़े हो जाते हैं,जहां से शुरु हुए थे। ऐसे में अगर आपने उसकी मनः स्थिति को समझकर उससे संवाद करना शुरू कर दिया तो धीरे-धीरे हो सकता है कि वह आप में अपना दोस्त तलाशने लगे और आप से अपने दिल की हर एक बात शेयर करने लगे। ऐसे में आप उसे समझा सकते हैं कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत।
मगर यदि आपका बच्चा मंदबुद्धि है या सामान्य बुद्धि रखता है, तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं। ऐसे में वह यह लम्बे अर्से तक समझ ही नहीं पाता कि, वह जो कर रहा है वह गलत है,उसकी जिन्दगी के लिए घातक है और उसका दिशा भटकाव उसकी जिन्दगी को भयावह बना देगा। हालात ऐसे हो जाते हैं कि जब तक उसे यह सब समझ आए, बहुत देर हो चुकी होती है। वह बहुत कुछ खो चुका होता है और बहुत कुछ खोने के लिए खुद को मजबूर भी महसूस करने लगता है। फिर भी इतनी देर कभी नहीं होती कि, हालातों को सुधारा न जा सके। ऐसे हालातों में भी संवाद ही एक जरिया है जिससे आप अपने बच्चे के जीवन में आए भटकाव को धीरे-धीरे ही सही खत्म कर सकते हैं। उसे जिन्दगी के सही मायने सिखा सकते हैं,लेकिन अगर आपने ऐसे हालातों में भी संवादहीनता जारी रखी तो बच्चे का भविष्य ऐसा भयावह हो सकता है,जिसकी कल्पना करते ही किसी भी माँ-बाप की रुह भी काँप उठे।
ऐसा नहीं है कि, संवाद केवल बच्चों और माँ-बाप के बीच में ही जरुरी है या संवादहीनता से हालात केवल इस रिश्ते में ही बिगड़ते हैं। हर एक रिश्ता चाहे वो पति-पत्नी का हो,भाई-भाई का हो या दोस्ती का हो,संवाद होना बहुत जरुरी है। कई बार ऐसा होता है कि गलत कोई नहीं होता,मगर संवाद का न होना रिश्तों में दूरियां बढ़ा देता है और ये दूरियां अक्सर गलतफहमी का शिकार हो जाती हैं।इससे रिश्तों में गरमाहट और अपनापन ख़त्म होने लगता है। इसलिए,संवाद बनाए रखिए क्योंकि संवाद ही एक ऐसी शक्ति है जिससे आप अपनों को करीब ला सकते हैं और परिवार और रिश्तों में एक खुशनुमा माहौल रख सकते हैं।

                                                                          #रविंद्र नारोलिया

परिचय : इंदौर(मध्यप्रदेश) के परदेशीपुरा क्षेत्र में रविंद्र नारोलिया रहते हैं। आपका व्यवसाय ग्राफिक्स का है और दैनिक अखबार में भी ग्राफिक्स डिज़ाइनर के रुप में ही कार्यरत हैं। 1971 में जन्मे रविंद्र जी कॊ लेखन के गुण विरासत में मिले हैं,क्योंकि पिता (स्व.)पन्नालाल नारोलिया प्रसिद्ध कथाकार रहे हैं। आप रिश्तों और मौजूदा हालातों पर अच्छी कलम चलाते हैं।

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matruadmin

2 thoughts on “संवाद होना चाहिए…

  1. संभवतः इसीलिए कहा जाता है कि संवाद बनाए रखिये हर समस्या का कोई न कोई हल या रास्ता निकल आयेगा।

  2. I really like संवाद होना चाहिए… because it explain the reality of generation gap. It shows that people have to be change their thinking & they have to be think as like as youth think.

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।