`चरणपादुकीकरण`

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sunil jain
भारत में कई प्रकार का मौसम होता है,लेकिन `चरणपादुकीकरण` यानी `चप्पलीकरण` का कोई मौसम नहीं होता। यह पश्चिमी विक्षोभ की तरह कभी भी आ जाता है। बरसता है और चला जाता है। यह परम्परा राजा राम के समय से चली आ रही है। इसका जनक भरत को माना जाता है। उस समय चप्पल यानी `खड़ाऊ` एक प्रतीक हुआ करती थी-व्यक्ति का,सम्मान का,आदर का। बाद में यह परम्परा नारी शक्ति के हाथ में चली गई। नारी शक्ति में जाने का भी मुख्य कारण यह रहा कि,पुरूषों ने जूतियां,जूते,गम बूट आदि पहनना शुरु कर दिया। एक बात और यह भी थी कि,अब न राजा राम रहे और न ही सम्मान करने वाले भरत।
एक बात तय है कि,जिसमें करण लग जाता है वह हवा से बातें करने लगता है। विकास की दृष्टि से देखा जाए तो जहां करण लगा,विकास शुरु। जैसे सड़क का चौड़ीकरण,विभागीकरण,निजीकरण,सरकारीकरण,स्त्रीकरण,सहयोगीकरण..आदि l कुल मिलाकर तय है कि,जब चप्पल के साथ `करण` जुड़ा,उसका स्तर बढ़ता ही गया। भरत वनवास के समय राम की खड़ाऊ सिर पर रखकर लाए थे,वे खड़ाऊ चप्पल कब बन गए,पता ही नहीं चला। समय के साथ-साथ चप्पल का स्त्रीकरण हो गया और चप्पल को स्त्रीलिंग की श्रेणी में भाषा वैज्ञानिकों ने ठोंक दिया। पुरुषों के हिस्सों में कभी-कभार चप्पल पहनने का शौक मात्र रह गया। चप्पलीकरण का विकास तलवार की तर्ज पर हुआ। नारी शक्ति ने इसे अस्त्र-शस्त्र दोनों की तरह इस्तेमाल किया। जब-जब नारी पर विपदा आन पड़ी,उसने बखूबी चप्पल का प्रयोग अपनी आत्म रक्षा(सम्मान) के लिए किया। `एन्टी रोमियो दल` तो अब बना है,पहले तो रोमियों केवल चप्पलीकरण से डरते थे। हर बात में नारी शक्ति का तकिया कलाम होता था-चप्पल देखी है। चप्पल में हवाई चप्पल का उपयोग कम ही किया गया। इससे मार कम लगती है और रोमियो को पिटने का कम अहसास होता है। बाटा,पावर और अन्य कम्पनियों ने चप्पलीकरण के बढ़ते उपयोग को देखते हुए और ज्यादा मजबूत चप्पल बनाना शुरू कर दी। जब भी जरुरत पड़े,इसे फेंककर उपयोग किया जा सके। एक बार लगने पर उसका निशान काफी दिनों तक चप्पलीकरण की यादा ताजा बरकरार रखे,ताकि रोमियो निशान के समाप्त होने तक महिला एन्टी न हो सके। इसका हिन्दी फिल्मों में जोर-शोर से प्रयोग किया गया है। नायक को स्टेज पर चप्पल फेंककर सम्मानित किया जाता,लेकिन जब नायक गाना समाप्त करता तो चप्पलीकरण करने वाले शर्म से पानी-पानी हो जाते हैं और उसे दिल दे बैठते हैं। राजनीति के शब्दकोश में शर्म नाम का शब्द वर्तमान काल में नहीं पाया गया। अगर किसी ने राजनीति में शर्म को देखा तो फादर कमिल बुल्के के शब्दकोश में अवश्य डालें।
`चप्पलीकरण` का श्रेय महिलाओं में किसी एक को नहीं दिया जा सकता। इसका उपयोग अधिकतर उन महिलाओं द्वारा सफलतापूर्वक किया जाता है,जिनके पतिश्री रात को मदिरापान कर लौटते हैं। घर की सारी कमाई पीकर उड़ा देते हैं और उसे उड़ने से बचाने के लिए चप्पल का प्रयोग महिलाओं द्वारा किया जाता है।

चप्पलीकरण का प्रभाव देखने से पता लगता है-चप्पलीकरण का शिकार हीनभावना से ग्रसित होता है। वह बार-बार कसम खाता है,अब कभी इस तरह का अवसर प्रदान नहीं करेगा। चप्पलीकरण का प्रयोग चुनाव के दौरान बोर करने वाले नेताओं पर अण्डे-टमाटर के साथ किया जाता है। राजनीति में जूता फेंकू तो बहुत हुए,लेकिन चप्पलीकरण वाले अब नजर आने लगे हैं। वैसे भी जब आदमी जमीन से उड़ने लगता है तो वह अपनी औकात भूल जाता है। सबसे पहले अपनी मातृभाषा का त्याग,उसके बाद संस्कारों का त्याग,उसके बाद आदर-सत्कार की भावना का त्याग और अंत में गर्व को धारण कर अपनी सीट पर बैठने के लिए उतावला हो जाता है,जिस पर जनता-परिवार-स्वजन बिठाते हैं,उसी सीट के लिए वह अपने ही स्वजनों को चप्पलों से पीटकर अपने दम्भ का प्रदर्शन करता है।
चप्पलीकरण के बाद अक्सर चप्पलीकरण का शिकार शर्म से लाल हो जाता है,उसका सिर झुक जाता हैl समाज में उसका सम्मान कम हो जाता है,लेकिन विशेष परिस्थितियों में चप्पल मारने वाले का सिर शर्म से झुक जाता है और खाने वाले का सिर गर्व से उठ जाता है। चप्पल खाने वाले के साथ समाज,सत्ता,राजनीति,युवा,बुजुर्ग सब होते हैं और चप्पल मारने वाला ट्रेन में मीडिया से मुंह छिपाता हुआ निकलता दिखाई देता है,लेकिन राजनीति में शर्म शब्द नहीं है और इसी शब्द के सहारे अच्छे-अच्छे राजनीतिज्ञ गर्व से सीना तानकर ठूंठ की तरह खड़े रहते हैं।
देश में एक नए कानून का इजाफा होना चाहिए। किसी के भी सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले हर चप्पलीकरण वाले को सजा होनी चाहिए। समाज द्वारा उसका  बहिष्कार करना चाहिए,उसे चप्पलविहीन कर देना चाहिए। चप्पलों की दुकानों पर नोटिस लगा देना चाहिए कि चप्पल उसे ही बेची जाएगी जो सम्मान के लिए पहनता हैl जो अपने सम्मान के लिए चप्पल चलाता है,जो परिवार की रक्षा के लिए चप्पल रखता है,जो लड़की की शादी के लिए चप्पल रगड़ता है,जो आफिसों में बाबू का काम करता हैl कोल्हापुरी चप्पलों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाना चाहिए,क्योंकि इनकी मारक क्षमता और भेदन क्षमता मिसाइल की तरह होती है। चप्पल केवल सम्मानित व्यक्तियों को बेची जानी चाहिए। इसके लिए उन्हें किसी राजपत्रित अधिकारी का प्रमाण-पत्र भी पाना जरुरी होना चाहिए। हर ऐरे-गैरे को चप्पल नहीं बेची जानी चाहिए। जिसका आधारकार्ड में नाम हो,राशनकार्ड में नाम,भारतीय नागरिक हो और सम्मानित नागरिक हो,उसे ही चप्पल बेची जानी चाहिए। अब कुर्ते और पाजामे के साथ के लिए जूतों को पहनना अनिवार्य कर देना चाहिए।
चप्पलीकरण देश-जाति-समाज-धर्म के विकास में सबसे बड़ी कड़ी है। इसका जब-जब प्रयोग होता है,तब-तब समाज जागृत होता है,लोगों में जागरुकता बढ़ती है। लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग हो जाते हैं। उनमें स्वाभिमान जागृत होता है। चप्पलीकरण पर विशेष आयोजन होने चाहिए,ताकि इसके सही प्रयोग की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकें। इससे प्रभावित लोगों को सामाजिक सम्मान और आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए। चप्पल को मिसाइल का दर्जा प्राप्त होना चाहिए। 26 जनवरी की परेड में इसके प्रयोग के प्रदर्शन होने चाहिए। इस पर भी राष्ट्रीय सम्मान शुरु किया जाना चाहिए। इसका चुनावी घोषणा-पत्र में जिक्र किया जाना चाहिए। चप्पल मारने वाले और चप्पल खाने वालों का समान अधिकार होना चाहिए। चप्पल मारने वाला बड़ा और चप्पल खाने वाला छोटा नहीं होना चाहिए।
                                                                                       #सुनील जैन राही
परिचय : सुनील जैन `राही` का जन्म स्थान पाढ़म (जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद ) हैl आप हिन्दी,मराठी,गुजराती (कार्यसाधक ज्ञान) भाषा जानते हैंl आपने बी.कामॅ. की शिक्षा मध्यप्रदेश के खरगोन से तथा एम.ए.(हिन्दी)मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया हैl  पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन देखें तो,व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी आपके नाम हैl कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में आपकी लेखनी का प्रकाशन होने के साथ ही आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हुआ हैl आपने बाबा साहेब आंबेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया हैl मराठी के दो धारावाहिकों सहित 12 आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैंl रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 45 से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैंl कई अखबार में नियमित व्यंग्य लेखन जारी हैl 

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।