साहचर्यजनित प्रेम ही भारतीय-परिवार का मेरुरज्जु है।

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dipti jha

भारतीय जीवन में परिवार का तात्पर्य विवाहित-युगल और उनके बच्चों भर से नहीं होता। पति-पत्नी के युग्म से जिस ‘दम्पती’ नामक एकीकृत रूप की निर्मित्ति होती है, उसके साथ ही कुटुंब के घनिष्ठ लोगों को समवेत् रूप में एक इकाई मान परिवार की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। उदात्त भारतीय संस्कृति के उदारचेता ऋषियों ने तो इससे भी आगे जाकर पूरी वसुधा को ही परिवार मानने का उद्घोष कर दिया।

यहाँ ‘विवाह’ भी कोई समझौता या व्यवस्था नहीं, वरन् ‘विशेष वहनम्’ के प्रण का संस्कार है। एक बार अग्नि को साक्षी मानकर सात परिक्रमा कर लेने के उपरांत वर-वधू एक दम्पती बन जाते हैं, जिस युति को सात जन्मों तक भंग नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि तलाक़ या divorce की अवधारणा यहाँ के अनुकूल नहीं है। दो अपरिचित लोग एक बंधन में बंधते हैं और रिश्ता जन्म-जन्मांतर तक निभ जाता है।

इसकी तुलना पश्चिम के love at first sight, सहजीवन (live-in relationship) से करें तो पता लगता है कि स्थाईत्व के पैमाने पर भारतीय संस्कृति के विवाह की कोई सानी नहीं है।  शादी के कुछ घण्टों के अंदर ही तलाक़ तो खर्राटे की वजह से तलाक़ आदि की खबरें पढ़कर हमारे यहाँ के आमजन अंचभित हो जाते हैं। यहाँ तो उदाहरण है कि ज़बरन भी सिंदूर लगा दिया तो जीवन भर का साथ हो गया। यही कारण है कि पश्चिम के युवाओं की दिलचस्पी भारतीय-रीति से विवाह करने में बढ़ी है।

गहराई में उतरकर देखें, तो भारतीय संस्कृति का प्रेम मूलतः सहचर्यजनित होता है। ‘प्रथम दृष्टया प्रेम’ की संकल्पना को यहाँ उद्दीपन मानकर कई चरणों में जाँचने-परखने और आगे बढ़ने की बात की जाती है। हालाँकि, स्वयंवर की प्रथा भी इसी भारतभूमि पर रही है और शकुंतला और भरत का ‘वनवासी उद्दाम प्रेम’ भी यहीं के साहित्य में है, पर इनमें से किसी में भी एक बार जुड़ने के बाद अलग होने की व्यवस्था नहीं है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर के आदिवासियों की ‘घोंटुल’ व्यवस्था भी सहजीवन जैसा ही प्रतीत होती है, पर ग़ौर से देखने पर यह उससे कहीं उन्नत और टिकाऊ है। इन घोंटूलों में युवक-युवतियों को भावी जीवन के लिए भली-भाँति तैयार किया जाता है। जिनमें स्थायित्व की संभावना क्षीण होती है, वे आरम्भ में ही अलग हो जाते हैं। विवाह के बाद इसकी नौबत ही नहीं आती।

यहाँ तो पति-पत्नी एक साथ रहकर एक-दूसरे के प्रेम में पगते हैं। यहाँ तो प्रभु श्रीराम भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम होते हैं, जो लोकोचित कर्त्तव्य करते हैं, लोकोचित प्रेम और विरह का प्रदर्शन करते हैं।
हे खग-मृग हे मधुकर श्रेणी।
तुम देखउँ सीता मृगनयनी।।
इसी तरह का भाव जायसी द्वारा विरचित किसानी जीवन का महाकाव्य ‘पद्मावत’ की विरहिणी नायिका (धर्मपत्नी) नागमती भी प्रदर्शित करती है।
“पिय सौं कहेहु सँदेसरा हे भौंरा! हे काग!!
सो धनि बिरहै जरि मुइ तेहिक धुवाँ हम्ह लाग।।”

ध्यातव्य है कि रामचरितमानस के नायक जहाँ खग-मृग से अपनी विरह-वेदना प्रदर्शित करते हैं, वहीं नागमती प्रेम की पीर में इतनी डूबी हुई है कि वह भी भौंरे, कौवे से बातें करने लगती है। वेदना की तीव्रता ऐसी है कि प्रियतम तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए वह भौंरे और कौवे के द्वारा भी अपने भावों की अभिव्यंजना करती है।

सहचर्यजनित प्रेम से उद्भिद प्रेम को आगे केदारनाथ अग्रवाल स्वर देते हैं-
“मिलकर वे दोनों प्रेमी, दे रहे खेतों में पानी।
मुझे जगत् जीवन का प्रेमी, बना रहा है प्रेम-तुम्हारा।।”

इस तरह हम देखते हैं कि भारतीय जनजीवन में परिवार की हर उद्भावना सहचर्यजनित है। प्रेम के लिए यहाँ का कवि लिखता है-
“यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने, परिचय की वह गाँठ लगा दी। था, पथ पर मैं भूला-भाला। फूल उपेक्षित कोई फूला।”
ध्यातव्य यह कि यहाँ भी परिचय की गाँठ ही लगती है, बस। आगे पारिवारिक जीवन का गौरवशाली प्रासाद तो सहचर्यजनित प्रेम से ही बनता है।

#दीप्ति झा
जबलपुर(मध्यप्रदेश)
(एमए, बीएड, दिल्ली विश्वविद्यालय)
हिंदी शिक्षिका (केंद्रीय विद्यालय, सी एम एम जबलपुर),
स्वतंत्र लेखन

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।