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mukesh sing
भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मानी जाती है। लोकतंत्र के एक ऐसे स्तंभ रूप में,जिसके बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना ही नहीं की जा सकती। मीडिया को यह  सम्मान यूं ही नहीं मिला है,बल्कि उसे इस सम्मान का हकदार बनाया है उसकी वास्तविक कार्य पद्धति ने। इसका उदाहरण है आजादी की जंग में सशक्त भूमिका निभानेवाला हमारा महाबली मीडिया। यह सर्वविदित है कि,देश को मिली आजादी मीडिया के भी अथक प्रयासों का नतीजा है। इस लिहाज से वर्तमान में भी मीडिया की जिम्मेदारियां काफी हद तक बढ़ जाती हैं। उसपे हर कीमत पर लोकतंत्र को बचाए रखने की जिम्मदारी आ जाती है,और देश के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे ब्रिटिशकालीन मीडिया ने अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया था। उन्होंने अपनी सत्यनिष्ठ पत्रकारिता से देश में जाकरुकता ला दी थी,जिसके फलस्वरूप आज हम एक आजाद,लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक हैं,हम स्वतंत्र हैं,पर वर्तमान समय में मीडिया का स्वरुप लगातार बदल रहा है। आज अधिकतर मीडिया घराने देश विरोधी ताकतों के समर्थन व गुणगान में व्यस्त दिखाई देते हैं। वे कश्मीर में अलगाववादियों और पत्थबाजों का समर्थन करते हैं तो दिल्ली में ‘भारत तेरे टुकड़े हजार होंगे’ कहनेवालों के बचाव में जुट जाते हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी ताकतों की पैरवी कर रहा है। वे लोकतंत्र बचाने के नाम पर देश को तोड़ने के प्रयासों को बढ़ावा दे रहें हैं,जिसके फलस्वरूप लोगों में मीडिया के प्रति रोष की भावना उभरकर सामने आ रही है। लोग सोशल मीडिया के जरिए मीडिया के अन्य माध्यमों के प्रति आक्रमक हो रहें हैं। वे सोशल मीडिया में अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। मीडिया के लिए उल्टे-सीधे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है,जो मीडिया की विश्ववसनीयता के लिए नितांत ही दुर्भाग्यजनक है।
ऐसी स्थिति में किसी को कोसकर या किसी और पर दोष रोपकर मीडिया को हाशिए पर लाने वाले लोग खुद की गलतियों से पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। जो लोग सोशल मीडिया में अपनी भड़ास निकाल रहें हैं,वे आम लोग हैं,जिन्हें मतलब है देश से,समाज से और देश के लिए चिंतन करनेवाले व्यक्तियों-संगठनों से। देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता लगातार यूं ही नहीं बढ़ रही है,बल्कि इस लोकप्रियता का कारण है उनकी निरपेक्षता और मीडिया की एक विशेष लॉबी द्वारा बात-बात पर उन्हें निशाना बनाया जाना।
मीडिया में सक्रिय एक खास तबका ऐसा भी है,जो व्यत्किगत लाभ के लिए अपनी ताकत का फायदा उठाता है। मीडिया में एक बड़ा समूह ऐसा भी है,जो राजनीतिक दलों की तरह ही छद्म धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता है। अल्पसंख्यकों के नाम पर संप्रदाय विशेष की बात करता है पर,वहीं प्रकृत अल्पसंख्यकों की श्रेणी में आनेवाले बौद्ध,जैन,सिख,पारसी आदि अन्य धर्मावलम्बियों का जिक्र तक नहीं करता है। उनके लिए कभी नहीं बोलता,किंतु देश में रहनेवाले बहुसंख्यकों की भावनाओं को आहत करते हुए बीफ के समर्थन में समाचार पत्रों में शीर्षक बनाता है। दिनभर खबरें दिखाता है,बड़े-बड़े चर्चे कराता है,जिसकी प्रतिक्रिया तुरंत ही दिखने लगती है और में देश में आपसी सौहार्द के स्थान पर सांप्रदायिक झगड़े बढ़ जाते हैं।
देश में आज जो सांप्रदायिकता का माहौल बना है,ये कहीं-ना-कहीं परोक्ष रूप से मीडिया के ही एक तबके की देन है। उसी मीडिया की,जो गोधरा कांड के बाद उपजे गुजरात दंगों का बस एक पहलू दिखाता है,जो विवादित ढांचे को ढहाए जाने को बड़ी खबर बनाता है,पर देश के विभिन्न हिस्सों में रोज गिराए जा रहे मंदिर पर मुंह तक नहीं खोलता है। एक अखलाख के मारे जाने पर अपने ही देश को विश्व दरबार में असहिष्णु राष्ट्र के रुप में पेश करता है,पर बंगाल,केरल,उत्तरप्रदेश,जम्मू-कश्मीर में मारे जा रहे लोगों के लिए सुरक्षा की मांग तक नहीं करता।
देश के लिए वह समय भी बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रहा है,जब एक आतंकवादी को देश के कानून द्वारा फांसी दिए जाने पर चंद जयचंदी स्वदेशी अखबारों ने ही हमारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थेl इन्होंने तब हैरानी नहीं जताई थी,जब उसी आतंकवादी को बचाने के लिए रात को २ बजे देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खुलवाया गया था।
सोशल मीडिया का भारतीय मीडिया के प्रति गुस्सा तब भी जायज लगता है,जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेताओं द्वारा देश के संसाधनों को नुकसान पहुंचाए जाने पर विशेष चर्चा नहीं होती,जबकि होना यह चाहिए कि मीडिया द्वारा सरकार व संसद पर इस बात का दबाव बनाया जाना चाहिए कि,ऐसे नेताओं के गुनाह साबित होने पर उन्हें सश्रम कारावास की सजा दी जाएl साथ ही उनके भ्रष्टाचार के बराबर की संपत्ति की कुर्की का विधान बनाया जाए। बैंक के ऋण चूककर्ताओं पर बैंक द्वारा की गई कारवाई की तरह ही भ्रष्टाचार की सजा काट रहे व्यक्ति के परिवार के सदस्यों को भी चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। उनका राजनीतिक अधिकार पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाना चाहिए,और यह तब संभव होगा जब मीडिया इसके लिए आवाज उठाए। जब मीडिया बिना किसी स्वार्थ के सरकार और संसद पर दबाव बनाए,पर ऐसा होगा नहीं,क्योंकि अधिकतर बड़े मीडिया घरानों का सम्पर्क राजनीतिक व्यक्तियों या दल से है। इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि,आज मीडिया की ही मेहरबानी से भारत की राजनीति में बहुत से अयोग्य राजनेताओं ने भी प्रवेश कर लिया  है। मीडिया कवरेज की वजह से अब देश की राजनीति में ऐसे लोग भी घुस आए हैं,जिनकी औकात अपना परिवार चलाने की नहीं है,पर यह देश का दुर्भाग्य है कि वे आज प्रदेश-देश चला रहे हैं।
मीडिया,जिसे गरीबों की आवाज बनना चाहिए था,वह आज कार्पोरेट का पिछलग्गू बना हुआ है। देश में बढ़ती गरीबी,अशिक्षा,सामाजिक पक्षपात आदि मुद्दे तो जैसे अखबारों व चैनलों से गायब ही हो गए हैं। ये मुद्दे मीडिया को बस तब याद आतें हैं,जब कहीं चुनाव हो और नेताओं द्वारा उन्हें इन मुद्दों को उठाने के लिए इन पर कृपा बरसाई जाए। रोहित वेमुला की मौत मीडिया के दोहरे चरित्र का प्रमाण है। देश की संपूर्ण मीडिया ने इस खबर को पूरा स्थान दिया,पर देश के विभिन्न इलाकों में हर रोज गरीबी और सामाजिक विभेद की वजह से मर रहे दलितों की सुध लेनेवाला कहीं कोई नहीं है । मीडिया का ये बदलता स्वरूप लोगों में निराशा की भावना को जन्म दे रहा है। मीडिया का पक्षपात लोगों को लगातार निराशा की गर्त में ढकेलता जा रहा है,जो समाज के लिए चिंतनीय है। ऐसे में मीडिया के पैरोंकारों का ये दायित्व बनता है कि,वे आधुनिक मीडिया से जुड़े पत्रकारों को उनका वास्तविक दायित्व याद दिलाएं और समाज को फिर से सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करें। तब जाकर सही मायनों में मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बन पाएगा,अन्यथा यह एक कोरी  जुमलेबाजी भर रह जाएगी।
                                                                                                  # मुकेश सिंह
परिचय: अपनी पसंद को लेखनी बनाने वाले मुकेश सिंह असम के सिलापथार में बसे हुए हैंl आपका जन्म १९८८ में हुआ हैl 
शिक्षा स्नातक(राजनीति विज्ञान) है और अब तक  विभिन्न राष्ट्रीय-प्रादेशिक पत्र-पत्रिकाओं में अस्सी से अधिक कविताएं व अनेक लेख प्रकाशित हुए हैंl तीन  ई-बुक्स भी प्रकाशित हुई हैं। आप अलग-अलग मुद्दों पर कलम चलाते रहते हैंl 

 

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