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अंग्रेजी अखबार ‘मिंट’ में छपे आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के सिर्फ 6 प्रतिशत लोग किसी तरह अंग्रेजी बोल लेते हैं। अंग्रेजी को सिर्फ ढाई लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा लिखवाया है। वास्तव में इन ढाई लाख लोगों की माताएं अंग्रेजीभाषी होंगी, इसमें भी मुझे संदेह है। जो छह प्रतिशत याने भारत के 8-10 करोड़ लोग अंग्रेजी बोल लेते हैं या समझ लेते हैं, वे कौन हैं ? यह जानने के लिए हमें 2011 में हुई सरकारी जन-गणना का सहारा लेना होगा। इसके अनुसार देश के 41 प्रतिशत संपन्न लोग अंग्रेजी बोल सकते हैं जबकि गरीबों में सिर्फ 2 प्रतिशत ऐसे हैं, जो अंग्रेजी बोल सकते हैं। देश के 33 प्रतिशत ग्रेजुएट अंग्रेजी बोल सकते हैं याने 66 प्रतिशत ग्रेजुएट (स्नातक) ऐसे हैं, जो अंग्रेजी नहीं बोल सकते। शहर के 12 प्रतिशत और गांवों के 3 प्रतिशत लोग अंग्रेजी बोल लेते हैं। ईसाइयों को सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोलने का अभ्यास है, उससे कम हिंदुओं को और उनसे भी कम मुसलमानों को। इसी प्रकार ऊंची जातियों में अंग्रेजी बोलनेवालों की संख्या सबसे ज्यादा है। पिछड़े और अनुसूचित लोग अपनी-अपनी भाषाओं का ही ज्यादा प्रयोग करते हैं। इन आंकड़ों से आप क्या नतीजा निकालते हैं ? क्या वह नहीं, जो डाॅ. राममनोहर लोहिया 60-65 साल पहले बोला करते थे ? वे कहा करते थे कि अंग्रेजी देश में वर्ग-भेद, जाति-भेद और गांव-नगर भेद की भाषा है। यह भारत को कई टुकड़ों में बांटनेवाली भाषा है। अंग्रेजी द्वारा किया जा रहा भारत-विभाजन भारत-पाक विभाजन से भी अधिक खतरनाक है। यह भारत में गरीबी-अमीरी की खाई खोदता है। नकलचियों की फौज खड़ी करता है। मौलिक सोच की जड़ों में मट्ठा डालता है। अंग्रेजी का वर्चस्व लोकतंत्र को खोखला करता है। मुट्ठी भर नौकरशाह, ऊंची जातियां, शहरी और संपन्न लोग करोड़ों गरीबों का खून चूसते हैं, उनका हक मारते हैं, उन्हें बेवकूफ बनाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह उनका शोषण का सबसे बड़ा हथियार है। इसका अर्थ यह नहीं कि अंग्रेजी या किसी भी विदेशी भाषा को हम भारत में अछूत घोषित कर दें लेकिन हम उसे अपनी मातृभाषा, पितृभाषा, पतिभाषा, पत्नीभाषा, पुत्रभाषा और स्वभाषा का दर्जा दे दें, इससे बड़ी मूर्खता और गुलामी क्या हो सकती है ? जिस वस्तु का इस्तेमाल हमें पांव की जूती की तरह करना चाहिए, उसको हमने पगड़ी बनाकर सिर पर बिठा रखा है।
#डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
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