Advertisements
salil saroj
इन लहजों ने कुछ तो छिपा रक्खा है
कहीं आँधी कहीं तूफाँ उठा रक्खा है
आँखों के दरीचे में काश्मीर दिखे हैं
हर अँगड़ाई में बहार बिछा रक्खा है
हुश्न का मजाल तो अब समझ में आया
दिल्ली कभी पंजाब जगा रक्खा है
तुम्हारे नाम की जिरह शुरू हुई जैसे ही
दोनों सदनों ने हंगामा मचा रक्खा है
जिस्म कहीं और शुमार होता ही नहीं
तूने सचमुच खुदा ही दिखा रक्खा है
#सलिल सरोज
परिचय : सलिल सरोज जन्म: 3 मार्च,1987,बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)। शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011), जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)। प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका”कोशिश” का संपादन एवं प्रकाशन, “मित्र-मधुर”पत्रिका में कविताओं का चुनाव। सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश।पंजाब केसरी ई अखबार ,वेब दुनिया ई अखबार, नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स, दैनिक भास्कर ब्लॉग्स,दैनिक जागरण ब्लॉग्स, जय विजय पत्रिका, हिंदुस्तान पटनानामा,सरिता पत्रिका,अमर उजाला काव्य डेस्क समेत 30 से अधिक पत्रिकाओं व अखबारों में मेरी रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। भोपाल स्थित आरुषि फॉउंडेशन के द्वारा अखिल भारतीय काव्य लेखन में गुलज़ार द्वारा चयनित प्रथम 20 में स्थान। कार्यालय की वार्षिक हिंदी पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित।
(Visited 12 times, 1 visits today)
Please follow and like us:
0
http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2018/06/salil-saroj.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2018/06/salil-saroj-150x150.pngmatruadminUncategorizedकाव्यभाषाsalil,sarojइन लहजों ने कुछ तो छिपा रक्खा है कहीं आँधी कहीं तूफाँ उठा रक्खा है आँखों के दरीचे में काश्मीर दिखे हैं हर अँगड़ाई में बहार बिछा रक्खा है हुश्न का मजाल तो अब समझ में आया दिल्ली कभी पंजाब जगा रक्खा है तुम्हारे नाम की जिरह शुरू हुई जैसे ही दोनों सदनों ने हंगामा मचा...Vaicharik mahakumbh
Custom Text