पानी में बताशा तैर गया

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युगों के बैरी मित्र हुए,
न सगों का मन से बैर गया।
यहाँ उथले में ही डूब गए,
वहाँ पानी में बताशा तैर गया।।
युगों के बैरी मित्र हुए……
मेरा दीपक जले रात भर,
और का जलते बुझ जाए।
छलनी जिसमें छेद बहत्तर,
गैर के अवगुण बतलाए।।
खोट हैं जिनकी नीयत में,
यहाँ उन्हीं का परचम फहर गया,
यहाँ उथले में ही…..।
अपनी पीड़ा हर कोई जाने,
और का दर्द दिखावा है।
अपनी खुली तो लगे छुपाने,
गैर का झूठ छलावा है।।
खुशी गैर की हजम हुई न,
विध्वंस का खाका तैर गया…
यहाँ उथले में ही…….।
सपने रोज सजाने वाले,
खुशफहमी में रहते हैं।
रोज कमाने खाने वाले,
सदा मौज में रहते हैं।।
लेते हैं वो जब अंगड़ाई,
तो लगे जमाना ठहर गया…
यहाँ उथले में ही…….।
आपस की तकरार छोड़कर,
निर्माणों में लग जाएं।
श्रेष्ठजनों को साथ जोड़कर,
अभियानों में रम जाएं।।
विष नहीं विषग्रंथि निकालें,
तब समझें पूरा जहर गया…
फिर नहीं कहेंगे…..
यहाँ उथले में ही डूब गए,
वहाँ पानी में बताशा तैर गया।।।।
———#आर.पी.सारंग
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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।