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मन की कोमल व्यथाएँ लबों तक रही,
गीत बनते गये, स्वर निखरते गये।

हो सका ना मिलन प्रीत में तो कभी,
दो किनारे थे हम ,सँग चलते रहे।।

भाव मन के मेरे, नैन पढ़ते तेरे,
मौन लब थे, नयन किन्तु कहते रहे।

मन के प्रश्न मेरे ,चिर प्रतीक्षित रहे,
तुम जवाबों में हरपल बिखरते रहे।।

प्रीत में मिलना होता जरूरी नहीं,
दूर हो कर भी हम तो निखरते रहे।

इस हथेली की रेखा में तुम हो नहीं ,
जानते थे मगर आस  करते रहे।।

तुम हो मीराँ सी पावन अमर प्रेम में,
कृष्ण बन मन में तेरे धड़कते रहे।।

#पायल शर्मा, डूंगरपुर

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http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2016/11/cropped-cropped-finaltry002-1.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2016/11/cropped-cropped-finaltry002-1-150x100.pngmatruadminUncategorizedकाव्यभाषाpayal,ramsharma,sharmaमन की कोमल व्यथाएँ लबों तक रही, गीत बनते गये, स्वर निखरते गये। हो सका ना मिलन प्रीत में तो कभी, दो किनारे थे हम ,सँग चलते रहे।। भाव मन के मेरे, नैन पढ़ते तेरे, मौन लब थे, नयन किन्तु कहते रहे। मन के प्रश्न मेरे ,चिर प्रतीक्षित रहे, तुम जवाबों में हरपल बिखरते रहे।। प्रीत में...Vaicharik mahakumbh
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