फ़िल्म समीक्षा- once again

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rashmi malviy
औरत अपने जीवन में से नमक निकालकर खाने में कब डाल देती है वो खुद नहीं जानती..
और सालों साल जीती है स्वादविहीन जिंदगी…
हमारे यहाँ हर शख्स खूब सारे character certificate  रखता है साथ में …किसी भी वक़्त ,हर कहीं ,किसी भी नुक्कड़ पे ,गली में ,चौराहे पर जरूरत पड़ सकती है …और हाँ फेस बुक पर भी।
इस एक काम को पूरी ईमानदारी और शिद्दत से निभाता है समाज और वो चार लोग….
जिनके कहने का डर पैदा होते समय से मरने तक बना रहता है।
एक औरत है, जो रेस्तरां चला लेती है
जो छोटे बच्चों को अकेले बड़ा कर लेती है
जो एक हाथ में करछी और एक में कार की स्टेरिंग रख लेती है..
वो सब कर सकती है ….
बस अपने अकेलेपन का साथी नही ढूढं सकती..
जिसकी खून पसीने की कमाई खा सकते हैं लेकिन उसका अकेलापन नही देख सकते। उसी के हाड़ मांस से बने बच्चे भी नही ।
सबसे पहले तो परिवार में वही बच्चा जो पापा को अपनी शादी पर मिस तो करता है लेकिन माँ के जीवन की शून्यता नहीं देख पाता।माँ को कटघरे में खड़ा तो करता है लेकिन ढाल नहीं बन पाता।तलवार बनकर उसके चीथड़े उड़ाने  में सबसे पहला आदमी अपना खुद का बेटा हो तो फिर कहना ही क्या …
Once again…ये एक फ़िल्म बिल्कुल भी नहीं है ये दो अकेले लोगों का अकेला मन है जीवन है ।जो साथ होना तो चाहते हैं लेकिन दुविधा भी है ,समाज भी।
कहते हैं मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन ये समाज सामाजिक बिल्कुल भी नहीं है। ये समाज किसी को दोबारा जीने का मौका नहीं देता।
पहला मौका भी किस्मत वालों को ही मिलता है
एक बार फिर…
नहीं ,क़भी नहीं,बिल्कुल नहीं…
शेफाली जी अपनी पूरी सुंदरता के साथ मौजूदगी दर्ज कराती हैं एक अकेली औरत है लेकिन बेचारी कही से भी नहीं ।साधारण होना जैसी सुंदरता कोई नही।
नीरज कबि जी अपनी पूरी संजीदगी के साथ इसमे एक पिता भी है और एक अकेले पुरुष भी ,ऐसा कौन होगा जो साथ ना चाहे।
चाहना गलत भी नहीं।
फ़िल्म एक लय में चलती है दरअसल आप जब इसे देखते हैं तो ऐसा लगता है कि घर की छत पर खड़े होकर पास के घर में सब होता हुआ देख रहे हैं।सब आसपास का जान पड़ता है ।नाटकीय कुछ नहीं लगता ।और बहुत शोर करने वाले इस समय में पत्थर पर मसाले ,चटनी पीसने की ,तड़के की और बहुत खूबसूरत फ़ोन पर एक दूसरे की शांत आवाज़ सुनाई देती है ….
और दोनों कलाकारों का सधा हुआ अभिनय नही है मानो सच में अकेलेपन की खामोशी को जीते नज़र आते हैं।आँखे ही ज्यादा बोला करती हैं वैसे अगर कोई पढ़ पाए।
तारा एक अकेली नही है ना जाने कितनी तारायें हैं जो मसाले हाथ से मसल कर उसे सूंघ कर ही खुश हो जाती हैं की महक है अभी।
भूत जब तक प्यार नहीं करता वो इंसान कैसे बनेगा…
चारों तरफ भूत ही भूत हैं या फिर बनिया ,जीने का मकसद ही हिसाब किताब !!
बाकी मुंबई है हर जगह और अपने पूरे खूबसूरत रूप में है  खासकर मुंबई की रात ….
जो वाकई बहुत खूबसूरत होती है हंसती खिलखिलाती, जीवंतता से सरोबार…
समंदर के होने का बहुत घमंड है मुंबई को…
सहमति एक जर्रा है और असहमति पूरा आसमान…
मगर सुनो …एक बार फिर…
रश्मि मालवीय
#रश्मि मालवीय
परिचय: रश्मि मालवीय
 इंदौर(मध्यप्रदेश)
समाज शास्त्र में परास्नातक
लाइब्रेरी साइंस में स्नातक
शिक्षा में स्नातक
पिछले 13 वर्षों से पुस्कालयध्यक्ष के पद पर कार्यरत व हिंदी  साहित्य से लगाव है |
कई पत्रिकाओं एवं  वेब पत्रिकाओं में कविता प्रकाशित होती है|
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।