दीपक तले उजाला…पुस्तक समीक्षा

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पुस्तक समीक्षा
शीर्षक – दीपक तले उजाला
कवयित्री : आदरणीया उर्मिला श्रीवास्तव जी
पृष्ठ : 100
मूल्य : 100₹
दीपक तले अंधेरा जी हम सबने सुना और सुन रखा है, कि दीपक तले अंधेरा और वास्तविकता भी यही है, यथार्थपूर्ण कि दीपक जहाँ को तो रौशनी देता है, किन्तु उसके तले ही अंधेरा स्थापित रहता है। आज जब मेरे हाँथ में *दीपक तले उजाला* काले रंग के पृष्ठ दैदीप्यमान होता दीपक से सुसज्जित आयी और हमने इसके पृष्ठों को पलट कर देखा , तो दीपक तले अंधेरा की सभी यथार्थता आज धरी की धरी रह गईं। क्योंकि पन्नो में भीतरी अन्तर्वेदनायें , उन्नत सोच से परिपूर्ण भावनाओं आदि ने सिद्ध किया कि यदि हमारी सोच अच्छी है, और हमारी इच्छा शक्ति प्रबल है, तो निश्चितता हमारे हांथों में है,कि *हम दीपक तले भी उजाला कर सकते हैं।*
          पुस्तक के संकलन उसे मूर्त रूप प्रदान कर जनमानस को लोकार्पित करने हेतु हमें एक अलग ढंग से सोचने के लिए मजबूर करने हेतु सर्वप्रथम इस *‛दीपक तले उजाला’* पुस्तक की कवयित्री आदरणीया उर्मिला श्रीवास्तव जी को बहुत बहुत बधाई संग आभार प्रकट करती हूँ।
          सर्वप्रथम यदि पुस्तक में भावों को देखा जाए , तो भावों की गढ़ता इस पुस्तक को भावनात्मक दृष्टि अत्यंत दृढ़ता प्रदान करते हैं, जिससे भावनात्मक पक्ष प्रबल होने के साथ – साथ पाठकों को पुस्तक से आत्मीय भाव से जोड़ते हैं। पुस्तक में कवयित्री द्वारा पन्नो के कैनवास पर उकेरे गए भाव चित्रात्मक रूप में हमें उस दृश्य से सीधा – सीधा जोड़ते हैं, और एक सीख, एक उद्देश्य को प्रकट करते हैं। भावनात्मक सबलता इस पुस्तक की जान है, और पुस्तक को बार – बार पढ़ने के लिए मजबूर करती है।
          प्रस्तुत पुस्तक में शब्दशक्ति या बिंबांकन की बात की जाए तो अनेक पहलू देखने को मिलते हैं, जिसमें अभिधा या लक्षणा में अनेक तरह के बिंब प्रस्तुत किये गए जैसे –
 *उड़ी हुई आंखों से निंदिया जाग जाग मैं हार गई।*
 *कविता का सागर उमड़ा है, सब बातें बेकार हुई।।*
आपका यह कविता कहना का माध्यम बेहद अनूठा है, एवं एक सार्थक सन्देश देने में सक्षम । पुस्तक में शब्दों का चयन एवं भावों का कहन अत्यंत गहरा एवं तरल है, जोकि सीधा छाप हमारे मनमस्तिष्क पर छोड़ता है, और समाज मे हो रही घटनाओं वेदनाओं के प्रति सोचने को मजबूर करता है, जैसे –
 *कहा बाप ने तब बेटे से मुझको सजा मिली है।*
 *तुझसे पहले एक बेटी की हत्या मैंने की है।।*
                        या
 *हम उनकी क्या सेवा करते बस मेवा ही लेते हैं।*
 *धरती जल देती हमको हम उसका दोहन करते हैं।।*
          भाव कई बिंदुओं को एकत्र करते हुए कई अनुभाग में ढलते हैं, तब जा पुस्तकाकार रूप पाते हैं, इसी प्रकार समीक्षा भी अनेक बिंदुओं को समावेश है, जिसमें अन्यत्र बिंदुओं पर यह पुस्तक *दीपक तले उजाला* खरी उतरती है, और अपनी सार्थकता को इस समाज मे स्थापित करने में पूर्णतया खरी उतरती है। यह पुस्तक एक प्रखर लेखनी एवं सशक्त हस्ताक्षर उर्मिला श्रीवास्तव जी की पहचान है, जो इस साहित्य वरन समाज मे किसी परिचय की कोई मोहताज नहीं है। आपके अनेकानेक बार बधाई सहित हार्दिक शुभकामनाएं।
#सौम्या मिश्रा अनुश्री
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।