ओमपाल सिंह निडर : आंदोलन के सूत्र से अग्निधर्मा कविता तक

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रश्मिरथी

ओमपाल सिंह निडर : आंदोलन के सूत्र से अग्निधर्मा कविता तक

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डॉ अर्पण जैनअविचल

 श्री दुर्गा सिंह व श्रीमती देवकोर की कुक्षी से  १० जून १९५० को खुशहालगढ़ (अनूपशहर) बुलंदशहर, उत्तरप्रदेश की साहित्यिक धरा पर जन्में ओम पाल काव्य कुल के अग्निधर्मा  कविता पाठ करने वाले महनीय कवि बने। बी.ए.ऑनर्स, एम.ए. पी.एच.डी. (राजनीतिशास्त्र) तक पढाई करने वाले ‘निडर’ जी वर्तमान में एस. आर.के. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फिरोजाबाद उ.प्र में प्राध्यापक पद से सेवानिवृत हुए है। देश की राजनीती को भी बेहतरीन तरह से समझ कर राममंदिर मुक्ति आंदोलन का सूत्र वाक्य भी आपके ही द्वारा दिया है।  और आप भारत की लोकसभा में बतौर सांसद भी पहुंचे है। कवि सम्मेलनों के सिलसिले में ओज के कवि ओमपाल सिंह ‘निडर’ ने देश के 24 प्रान्तों में अब तक लगभग 7000 कवि सम्मेलनों में सहभाग लिया है। निडर जी द्वारा रचित ‘मुझको मेरी कुटिया प्यारी, तुमको तुम्हारे महल मुबारक..इन ईंटों की ऊंचाई को मैनें नमन नही सीखा है’ नामक कविता आपातकाल में जेलों में बन्द राजनीतिक बंदियों द्वारा गाई जाती थी। “बच्चा बच्चा राम का,जन्म भूमि के काम का” नामक उद्घोष सन 1975 में व 1978 में “सौगन्ध राम की खाते है,हम मंदिर वहीं बनायेंगे”

द्वारा रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का सूत्रपात करने का सौभाग्य निडर साहब को प्राप्त हुआ है। अपनी कविताओं के कारण दो बार जेल और 5 बार आक्रमण भी आपने सहे है। वर्तमान में आप संस्कार भारती के संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय कवि संगम के पूर्व राष्ट्रीय सलाहाकार और जनवरी 2014 से अ.भा. साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष भी है साथ ही 11 वीं लोकसभा के सदस्य बतौर सांसद रहे। आपको सैकड़ों अलंकरण और हजारों पुरुस्कार मिले। आपको 13 मार्च 2015 को देवगढ़ महोत्सव, सोनगढ़ (उ.प्र.) देश की 7 साहित्यिक संस्थाओं ने मा. कलराज मिश्र जी के कर कमलों द्वारा “राष्ट्र कवि” की उपाधि प्रदान की। हिन्दू , हिंदी और हिंदुस्तान के राग को गाने वाले अग्निधर्मा कवि निडर साहब सेवा निवृति के पश्चात् पूर्णकालिक कविसम्मेलनों के माध्यम से भारत की मनीषा का देश धर्म के प्रति जागरण कर रहे है।

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प्रो.ओमपालसिंह ‘निडर’
रस- वीर रस
अनुभव – ४० वर्ष से अधिक
निवास-स्वाभिमान” 48/2, दुर्गा नगर, फिरोजाबाद

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।