*लूट भरी है झूठ भरी है*

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yogesh mani yogi

लूट भरी है झूठ भरी है,
रग-रग ,नस-नस लूट भरी है,
संस्कारों की बात न करना,
हर बाला में नजर गोश्त है,
हीरोइन अब न्यूड खड़ी है,
कोई काम नही मिलता है,
जब डिग्री के मारों को,
जब सत्ता में कुंडली मारे,
बहुत से नमक हरामों को,
जब नफरत की आग जलाकर,
रोटी सेंकी जाती है,
दंगें झगड़ा करवाने को,
बोटी फेंकी जाती है
जाति धर्म की आग लगाकर,
मजहब पाठ पढ़ाते हैं,
खुश होते हैं आग लगाकर,
अपना वतन जलाते हैं,
जब वोटों की खातिर सारे,
तिकड़म पाले जाते हैं,
जाने कितने बच्चे भूखे,
सड़कों पर सो जाते हैं,
बुनियादी बातों से जब जब,
ध्यान हटाया जाता है,
समझो राजनीति से उसका,
बेहद गहरा नाता है,
कर्ज तले जब ईश्वर रोता,
खेत और खलिहानों में,
माटी मोल है कीमत मिलती,
साँठ गाँठ बेईमानो में,
जब बेटी की बीच बजरिया,
अस्मत लूटी जाती है,
मेरे मन मे एक शंका तब,
यूँ ही घर कर जाती है,
क्या कानूनों की बेदी पर,
कोई हवन नही करता,
आग लगा दो जब तेरे,
कानूनों से कोई नही डरता,
राजनीति ने देश धर्म पर,
ऐसी कालिख पोती है,
देश तोड़ती इनकी चालें
हरकत इनकी ओछी है,
वतन जान है वतन मान है,
हम सबका अभिमान है,
इससे हम हैं हमसे ये है,
रग रग में हिंदुस्तान हैं
मिलकर रहना होगा सबको,
तभी देश बन पाएगा,
बिना वतन के बोलो कैसे,
कौन यँहा रह पायेगा,

#योगेश मणि योगी

*परिचय*

पशु, मनुज और प्रकृति ,मुनुवा, बड़का का प्यारा ।
सतना जिला नागौद तालुका ग्राम मेरा सेमरवारा।।

नाम- लोधी योगेश मणि योगी’किसान’
पेशा- कृषक
पिता-राजमणि लोधी एडवोकेट
माता-स्व.सुधा सिंह लोधी
लेखन क्षेत्र- व्यंग,कविता,गीत,लेख आदि
प्रकशित रचनाएँ-बेटी कँहा से लाओगे,लहलहाती फसल, किसान की पीड़ा,रोते भारत की तस्वीर, खेतों की महिमा,हम देश के अन्नदाता,लहरा दें जब चाहे तिरंगा,नादिया की महिमा,किसान की मौत, कहानी-किसान का कर्ज आदि

पता-सतना (मध्यप्रदेश)

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दहेज़ में माँगा एफिडेबिट

Tue Aug 14 , 2018
मित्रो आज में एक ऐसे विषय परअपनी लेखनी करने जा रहा हूँ  ! जिसकी चर्चा हर समाज, जाती, धर्मआदि में बहुत ही होती है ! वो हैदहेज़ का लेना देना ? लड़की वालाहै तो उसे चिंता है की मुझे अच्छारिश्ता अपनी बेटी के लिए चाहिए , तो कितना दहेज़ देना पड़ेगा ? जिनके लड़के है उन्हें अच्छी बहु केसाथ अच्छा संपन्न परिवार औरअच्छा दहेज़ मिले इसकी चिंतारहती है ? यदि कुल मिलाकर देखेतो दोनों परिवारों में इस दहेज़ कीचिंता है ?  दोनों परिवारों के दहेज़के विषय पर भिन्न भिन्न विचार भी है/ हमारा समाज कितना भी शिक्षितऔर संपन्न ही क्यों न हो परन्तु दहेज़के विषय पर सभी की राय एकजैसी ही है / मेरे एक परिचित है उनके दो बेटे हैजो कि अच्छे पढ़े लिखे है ! काफीसंपन्न और धार्मिक प्रवृति के होने केसाथ समाज में उनका अच्छा नाम है/ उनके छोटे बेटे की शादी का एकरिश्ता आया ! तो वो अपने बेटे केलिए बहू देखने के सुबह से तैयार होगए ! उन्होंने अपनी पत्नी कोआवाज़ लगाई, कविता जी सभीलोग तैयार हो गए तो चले ? चूकिकविता जी एक पारंपरिक घरेलूमहिला है। ज्यादा पढाई तो नहीं करपाईं, मगर हाँ उनकी बौद्धिक क्षमतासे परिवार वाले भली भांति परिचितथे। अनिल जी उनके तो क्या कहने, ज्ञान का भंडार थे। उच्च शिक्षितऔर उच्च विचारधाराओं के धनी ।इन विषमताओं के बावजूद दोनों नेएक आदर्श पति पत्नी की छविबनाई थी। कविता जी भीसामाजिक मापदंडों पर खरी उतरनेवाली एक आदर्श महिला थी। सब गाड़ी में बैठ कर चल दिए औरकविता जी अपने अतीत में खोगयी। अक्सर ये होता है कि यात्राकरते वक्त अतीत जरूर सामनेआता है ! कविता जी को भी यादआया जब वो ब्याह कर इस घर मेंआईं थी ,सास को बिलकुल नहींभांती थी । उनकी सास थोड़ी सख्तमिज़ाज थी !  बात बात पर तानेउलाहने देना उनकी आदत थी।उनकी नजरो में बहू मतलब घर कीनौकरानी,  जिसे मुँह खोलने कीआज़ादी ना थी । घर में सारीपाबंदियां थी ! जो आमतौर परबहुओं पर लगाई जाती थी, या यूँकहूँ कि उस समय बहुओं पर वो हरअत्याचार जो जायज था ! , हालांकिअनिल जी अपनी माँ को समझानेका यथासंभव प्रयास करते थे !  मगर सब व्यर्थ था ! वो किसी कीसुनने वाली महिला नहीं थी । उल्टाअनिल जी बीवी के पक्षधर है तू येकहती थी । कविता जी के लिएअनिल जी का साथ ही संजीवनी था! जिसके कारण ही वो बखूबीअपना हर पारिवारिक दायित्वनिभाती चली गई । वो इसी उधेड़बुनमें थीं और गाड़ी लड़की वालों के घरपहुँच गई। स्वागत सत्कार चायनाश्ते का दौर चला,और बेटी को भीदेखा ! जो सभी को पसंद आ गई ! बातचीत शुरू हुई और बात लेन देनकी आई पुन: कविता जी फिरअतीत में उलझ गई । उनके बड़े बेटेआशुतोष की शादी याद आ गई । अनिल जी कविता जी के हर फैसलेका सम्मान करते थे मगर कभी-कभी वो सारे फैसले स्वयं कर लेतेथे और एक आदर्श पत्नी की तरहवो मौन स्वीकृति दे देती थीं । उसकीशादी में अनिल जी ने लड़की वालोंसे साफ कह दिया हमें दहेज नहींचाहिए ! बस हमारे बारातियों काअच्छा स्वागत-सत्कार हो ,भेंटस्वरूप मिले सारे पैसे और ऊपर सेकुछ अपनी तरफ से मिलाकर बहूको गहने बनवाकर दे दीजिये । मगरकहते हैं की अच्छों के साथ हीज्यादातर बुरा होता है ? बहु आते हीबेटे के साथ चली गई अलग रहने ।फिर भी मन ना भरा तो दहेज कामुकदमा कर दिया ! ससुराल वालोंपर कुछ साल तक बड़ा बेटा कोर्टकचहरी के चक्करों में परेशान रहा,और फिर वही बीवी को लेकर अलगरहने लगा ! इस तरह की घटनाउनके साथ पहले घट चुकी थी ! इसकारण कुछ ज्यादा ही सावधानीवरत रही थी  ! सहसा अनिल जी की आवाज़ नेउन्हें चौंका दिया और वो अतीत सेवर्तमान में लौट आये जी । अनिलजी फिर वही पुराना जुमला कह रहेथे !  हमें दहेज नहीं चाहिए वगैरहवगैरह। मगर इस बार कविता जी नेहस्तक्षेप किया और सहसा बोलपड़ी ‘ हमें कुछ नहीं चाहिए अपितुशादी का एफिडेबिट चाहिए’। सबआश्चर्य से कविता जी को देखने लगेअनिल जी कुछ कहते इससे पहलेकविता बोली,,, ‘आप उसमें साफशब्दों में लिखवाए कि :- 1-हमने आपसे कोई दहेज नहींलिया । हमें अपने बेटे पर पूराभरोसा है वो यथासंभव अपना खर्चवहन कर सकता है। 2- आपकी बेटी को पूरी आज़ादीरहेगी जैसी आपने दी है, मगर बड़ोंका अपमान करने की आज़ादी हमउसे नहीं देंगे। 3- उसे पारिवारिक दायित्व कानिर्वहन पुरी इमानदारी से करनाहोगा ! हम सब उसकी यथासंभव मददकरते रहेंगे। 4- उसे फैसले लेने, अपना मत रखनेऔर घर की हर बात जानने का पूरा हक होगा ! अजनबी सा व्यवहारनही किया जाएगा । उसका हर फैसला मान्य होगा मगर वोफैसले परिवार हित में हो !  उसमेंसभी की सहमति अनिवार्य है। 5- मेरे बेटे का ये दायित्व है कि वोउसका पूरी तरीके से ख्याल रखे । जितना सम्मान अपने माँ-बाप कोदेता है, उतना ही उसके माँ बाप को देगा !  यही बात आपकी बेटी परभी लागू होगी  । यदि आप और आपकी बेटी इनशर्तो को मान्य करती है तो रिश्तापक्का ! और हाँ एक बात याद रखे ! हम बेटीनहीं बहू ही लेकर जाएँगे, क्यों कीहम सब जानते हैं कि बहु को प्यारदेने में हमेशा कमियाँ हुई है । हमयथासंभव उन कमियों को दूर करनेका प्रयास करेंगे। हमें कोई जल्दीनहीं आप सोच समझ कर निर्णय ले। हमें दहेज में ये एफिडेबिट हीचाहिए।’  इतना कहकर कविता जीने हाथ जोड़कर जाने की आज्ञामाँगी । दोनों बेटे आश्चर्य से अपनीमाँ को देख रहे थे ! अनिल जी अपनेकिताबी ज्ञान और अपनी पत्नी केजिंदगी के तजुर्बों के ज्ञान की तुलनाकर रहे थे ! जिसमें धर्मपत्नी कापलड़ा ही भारी पड़ रहा था । साथियो यदि हमारा समाज वास्तवमें इस क्रुति को अपने दिल सेसमाज से निकलना चाहता है तो हमेंआने वाले समय में ये सब करनापड़ेगा ! क्योकि वैसे तो आज कलबेटियां ज्यादा पढ़ लिख रही है औरजिसके कारण लड़को को भीरिजेक्ट कर देती है / परन्तु वर्तमानसमय को देखते हुए ! शादी_का_एफिडेबिट लेना दो पक्षके लिए उचित कदम है /  जिसकेकारण बिना बजह के परिवार औरसमाज बदनामी से बच सकती है / साथी दोनों पति पत्नी के सम्बन्ध केसाथ परिवार वालो में भी अच्छेरिश्ते कायम रहेंगे / #संजय जैन परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी […]

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Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।