सब सुतिया के कमान के तीर

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mrunalika ojha

आज सुतिया घर में नहीं समा रही है। आँचल में कारड छिपाती सुतिया कभी यहाँ,तो कभी वहाँ होती। समूचा गांव ही तो उसका घर है। वह हर घर के भीतर-बाहर हो लेना चाहती हैं। देखते-देखते जैसे सुतिया का चेहरा ही कारड हो गया। लाल किनारों वाला सुनहरा सुन्दर कारड। लाल साहब के न्यौता का कारड,जिसे देखते ही दूर से पढ़ा जा सकता है। कहते हैं,लालपुर खूब सजा है। खूब भीड़ है,खूब धूम मची है। दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। जानों मेला लगा है। गाँव भर को खबर थी कि,सुतिया का बेटा तीर साधने में अव्वल आया है और अब वह कई देशों के बीच अपनी कलाकारी दिखाएगा। लालपुर में दूर-दूर से तीर साधने वाले आएंगे। उनसे अगर बेटा जीत गया तो,वहाँ उसे बड़ा ईनाम मिलेगा। सुतिया आज जिससे भी मिलती,हर बार चहक कर हँस लेती और कहती-मौसी,लाल साहब बड़े भले आदमी हैं। उनके ही राज में इतना नियाव हो रहा है,नई तो गाँव के गंवारों को कौन पूछता है भला ? मौसी आश्चर्य से पूछती-क्यूँ सुतिया, बेटा तो लालपुर चला गया न ? सुतिया गर्व से तनते हुए चेहरे को सामान्य करके बोलती-हाँ मौसी,बेटा तो चला गया,पर उसके जाने के पीछे ये कारड आया है। सरपंच भइया ने कहा है-बेटे के माँ-बाप को भी लाल साहब ने बुलाया है,तो जरुर जाना चाहिए। इसी से आज हम लोगों को भी वहाँ जाना है। लगातार बोलने से सूख गए गले को तर करती हुई सुतिया कारड दिखाती है, तो कोई कारड पढ़ता ही नहीं। बस देखते ही रह जाते हैं और सुतिया का भाग सराहते हैं। गाँव में खुशियों की आतिशबाजी छूट रही है।
‘दुल्लुराम’ सुतिया का भांजा,खबर सुनते ही मिलने आ गया। मामी का पैर छूकर हालचाल पूछता है। सुतिया की आँखें भर आती हैं,-क्या करें ? सरपंच भइया कहते हैं कि बेटे की कलाकारी लाल साहब को पसंद आ गई। उसको और आगे बढ़ाने के लिए वहीं ट्रेनिंग देंगे,पढ़ाएंगे,लालपुर में ही रखेंगे। हमको भी वहीं रहने बुलाया है। अब देखों भांचा,वापस आ गए तो आ गए,नहीं तो वहीं रह-बस जाएंगे, बेटे की खातिर। दुल्लुराम को एक अपरिचित प्यास सताती है। बोला-मामी,लाल साहब को मेरे बारे में भी बता देना। मैंने भी तो उनकी खूब सेवा की थी,जब वो हमारे गाँव आए थे तब। याद हैं न मामी,खुश होकर लाल साहब ने मेरी पीठ थपथपाई थी।
‘हाँ-हाँ सब याद हैं भांचा,’ सुतिया ने धीरज बंधाया। सामने खड़ा भांचा भरी आँखों से लगभग गिड़गिड़ा रहा था। उसके चेहरे पर धूप-छांव लगभग साथ-साथ उभर आए थे। सुतिया बोली-‘क्या करूँ बेटा,मैं तो गांव छोड़कर जाने वाली नहीं थी,पर लाल साहब का आडर है तो जाना पड़ेगा। अब बुलाए हैं,तो वापस कहाँ आने देंगे भला,बोलो ? वहीं कोई काम दिला देंगे। उन्हें क्या कमी है?’
सुतिया ने दाहिने हाथ से सिर का आंचल सम्हाल लिया और बाएँ हाथ से दूसरा छोर कमर में खोंसने लगी।
सामने से राधे काका आ रहे हैं। सुतिया लपक कर काका के पाँव छू लेती है। उसकी डबडब आँखों में लालिमा तैरने लगती है। काका सुतिया के सिर पर हाथ रखते हैं। वह मुस्कुरा उठती है। अपना क्या है काका ? ये तो सब आप लोगों का ही आसीस है, कि बेटे का भाग्य जागा है, बेटा तो पूरे गांव का है न ?
लालपुर की बस चल पड़ी थी। बेटे के बाबू के साथ बैठी हुई सुतिया लालपुर और गांव के बीच डोल रही है। वह बार-बार उन घरों में जा रुकती है,जहाँ वह अपने लालपुर जाने की खबर खुद नहीं पहुंचा पाईं। इधर कई बार वह लालपुर भी पहुंचती है, और लाल साहब को ’’पालागी'(प्रणाम) भी कर लेती है,पर वे ? ‘बस’ है,कि लालपुर पहुंचने का नाम ही नहीं लेती। वह सड़क के किनारे लगे खंभों की ‘लेन’ देखती है। बिजली के तार उसकी आँखों तक आकर कौंध उठते,तो एक लंबी-सी खुशी,रोम-रोम में छलक उठती। बिजली के ये तार सीधे लाल साहब के महल जा पहुँचते। लाल महल जो लाल मैदान के ठीक सामने है, आज इसी लाल मैदान में उसके अपने लाल को भी ईनाम मिलने वाला है। सब तरफ उजाला। लाल महल और लाल मैंदान ही क्या,सारे लालपुर को देखो, चारों ओर चकाचक,जगर-मगर। इतनी जगर-मगर कि जोत की महानदी उमड़ गई हो। लाल साहब सिंहासन समेत जैसे इसमें नहा-धोकर निकले हों और सुतिया की ओर निहार रहे हों। तेरा बेटा है ? बड़ा अच्छा तीरंदाज है,-बहुत अच्छा,बहुत अच्छा। लाल साहब की प्रशंसा भरी निगाह मुस्कुराती हुई सुतिया पर टिक गई। धत् ! सुतिया बहुत ऊपर उड़ान से कूद पड़ती है-छप्। सीधे अपने अंदर छलांग लगाती है। पानी से भीगी-भीगी लजाई हुई सुतिया अपने भीतर से बाहर आती है,तो बस भागती ही होती है। बस लालपुर की ओर दौड़ रही है,बेसुध। सुध होती तो अभी तक पहुंच न जाती ? कहीं लाल साहब के न्योते में पहुंचने में देर न हो जाए। सुतिया को जरा दुःख हुआ।
टिप-टिप, टिप-टिप..अचानक आई पानी की बूँदों ने उसे झकझोर दिया। घबराकर उसने अपना चेहरा पोंछा। हवा कब इतनी सर्द हो गई,उसे पता नहीं चला। उसने माथे का आँचल नीचे खींचा और अपने दोनों हाथों को आँचल के अंदर इस तरह लपेट लिया कि जैसे छोटी गठरी हो। हड्डी तोड़ देने वाली इस जाड़ में यह पानी कहाँ से आ मरा ? अब मैं भीगती हुई जाऊँगी लाल मैदान में,तो क्या भला अच्छा लगेगा ? सुतिया ने बेटे के बाबू की ओर देखा, जो अब तब बीड़ी सुलगा चुका था और कंडक्टर की घूरती आँखों से बचना भी चाह रहा था। ठिठुरती हुई सुतिया को देखकर धीरे से बोला-‘फिकर मत कर,अगले टेसन में चा पी लेना,बड़े भी खा लेना। हाँ लाल साहब के मेहमान बन कर जा रहे हैं तो ठीक ठाक खाना-पीना आना चाहिए। हाँ,वहाँ जा़दा भात मत खाना।’ सुतिया ने शर्म से आधा चेहरा ढांप लिया। उसका आधा चेहरा मुस्कुराता रहा।
कुछ ही देर में बस रूक गई। चाय-चाय,गरम चाय, गरमा-गरम-भजिए…गरम पोहा, जैसे शब्दों में बस घिर गई। अनेक हाथ बस की खिड़कियों से बाहर-भीतर होने लगे। ‘बड़े खतम हो गए,ले पोहा खा और चा पी।’ सुतिया के हाथों को पोहा और चाय एक साथ गरमा रहे थे। क्या करूँ ? पहले चा पी लूं या पोहा खा लूं ? किसे-कहाँ रखूं ? ढंग से खाना है,कोई देखकर हंसे नहीं। बेटे को बुरा लग सकता है। सुतिया लाल मैदान की चिंताओं में थरथराने लगी। खिड़की पर रखी प्लेट चम्मच के साथ मिलकर ‘खुलखुल’ हंसने लगी और चाय ने अपने गर्म तेवर दिखाए। प्लेट पलटी तो पति से जोरों की फटकार उसके कानों में सोंटे की तरह पड़ी-पहले ही समझाया था,तो भी नहीं समझती। ऐसा ही करेगी क्या,लाल साहब के यहाँ भी ?
सुतिया वापस बस में थी। उसकी ठंड दूर तो हो चुकी थी-क्या करूंगी। ऐसा समय आएगा तो ? कह दूंगी – उपवास है,या सिर्फ चा पीकर रह जाऊँगी। सुतिया ने मन-ही-मन संकल्प लिया।
सामने की सीट के ठीक सामने छत से लगा हुआ आइना है। सुतिया ने देखा,सुतिया जैसे ही एक और सुतिया उसे घूर रही है। सहसा सुतिया ने अपने बालों में हाथ फेरा। लंबे काले बालों में लटें बन गई और भूरी हो गई हैं। दीपदीपाता रंग सांवला हो गया। बड़ी बेर की तरह चमकदार नुकीली आँखों में दोपहरी का पीलापन घुल गया है। हाँ,बालों के बीच से बहती आई सिंदूर की धार और भौंहों के बीच का सिंदूर टीका अब भी दमक रहा है। सुगढ़ नाक के नीचे उभरे गुलाबी होंठ अब भी वैसे ही हैं। सुतिया के होंठ गुलाब की कली की तरह धीरे से खुले तो सामने की सुतिया छू हो गई,और सत्रह बरस पुराने समय ने सुतिया को जकड़ लिया। शादी के बाद के चार-छह दिनों को छोड़कर उसे याद नहीं कि,उसने फिर कभी खुद को इतने गौर से देखा हो। मुँह अंधेरे उठकर गाय-कोठा साफ करना,आंगन लीपना,बछड़े को खींच कर गाय से अलग करना (जो सुतिया बड़े बेमन से करती) नहा-धोकर तुलसी में जल डालना,चिड़ियों के लिए चुग्गा डालना और फिर दोनों घुटनों पर आइना टिका कर बाल संवारना। इसके बाद रेल की पुरानी टिकट से मांग में सिंदूर की धार डालना। ठीक इसी समय वह मिलती थी खुद से,वह भी आइने के माध्यम से। इसके बाद तो दिनभर कुआँ-पानी,आँगन-बारी,घर-द्वार, खेत-खार में भटकती सुतिया खुद को कभी ढूँढ ही नहीं पाती थी। हाँ, सुकुवा (शुक्र तारा जो पौ फटने के पूर्व दिखता है) के साथ जगी सुतिया की खटर-पटर से सूरज जरुर जाग जाता था। दिनभर सुतिया का पीछा करता और सांझ को जब वह तुलसी चैरे में दीया जला देती,तब सूरज अपनी बची-खुची आभा समेट कहीं और जा टिकता। तुलसी-चैंरा की याद आते ही उसका दिल धक् से बैठ गया। आज तुलसी का दीया कौन जलाएगा ? अंधेरी ही पड़ी होगी देहरी। सुतिया ने तुरंत आंचल पसार हाथ जोड़कर तुलसी माता से क्षमा मांगी। गाँव,घर, पति और बेटे के लिए आशीष मांगती हुई आँखें पल भर के लिए बंद हो गई।
आँखें खुली तो सामने आइने में बैठी सुतिया फिर उसे घूर रही थी। उसे अच्छा नहीं लगा। जी चाहा,एक कपड़े से आइने को ढंक दे,जिस तरह घर में आइने के सामने बैठी गौरय्या को लहूलुहान होने से बचाने के लिए वह करती आई है। सामने आइने में उसने अपना चेहरा देखा,पर उसमें जैसे पति और पुत्र का चेहरा समा गया था। यदि उनके चेहरों पर खुशी है तो सुतिया का चेहरा भी चमचमा उठता था। इन्हीं चेहरों पर सुतिया का चेहरा टटोला जा सकता था।
सुतिया कसमसाकर अपना सामान इधर-उधर करने लगी,जो अभी-अभी उसे अव्यवस्थित से लगने लगे थे। सिर का खोपा कसा और चांदी के पिन को और अधिक गड़ाकर खोंसा। अंचरा का बायां कोना खोलकर एक कटका सुपारी मुँह में डाल दिया। उसका मुँह सुगंध से लबालब हो गया। एक विचित्र-सी सुगंध उसके भीतर समाई थी। यह सुगंध उसे मिली थी, जब देवर जी ‘देरानी’ को लेकर शहर से गाँव आए थे। देरानी के कपड़ों में थी,या देरानी की देंह में ही थी यह सुगंध ? इस सुगंध ने देरानी को गाँव में नहीं टिकने दिया। नाक-भौंह सिकोड़ती हुई वह दो दिन बाद ही वापस चली गई। सुतिया के भीतर वह विचित्र सुगंध रम-सी गई थी। न जाने कब वह घर से खेतों को जाते हुए उससे बिछुड़ गई। फिर ढेरों चिर-परिचित गंधों ने उसे घेर लिया। तालाब के पानी की गंध,नीम की गंध, कुकुरमुत्तों से घिरी पगडंडी की गंध, जलते कंडों,सूखे पत्तों की गंध और भी अनेक किसिम-किसिम की गंध, जो दिनभर आ-आकर उससे लिपटती। देरानी की याद आते ही उसकी आँखों में बदली घिर आई। सुतिया ने उसे अपने आँचल में सहेज लिया।
बदली छंटते ही दृश्य बदल गए। सड़क के दोनों ओर से शहर झांकने लगा था। सुतिया बस में मुस्कुरा रही है। उसकी मुस्कुराहट में लालपुर की गर्माहट घुल गई। उसने फिर आँखें बंद की तो,अंग-प्रत्यंग में तालियों की गड़गड़ाहट ? ऐसा अनुभव तो पहले कभी नहीं हुआ। उसने आँखे खोल दी। कंडक्टर चिल्ला रहा था-‘चलो-चलो लाल चैक-लाल चैक।’ खुशी और भय की दो रंगी लहर उसके भीतर समाई तो उसके पैर कांपने लगे। ‘आ जा,इधर आ,चल उतर।’ बेटे के बाबू ने हाथ बढ़ाया तो सुतिया लजाकर सिकुड़ गई। सिर का आँचल ठीक करने के लिए उसने हाथ छुड़ा लिया। ‘अरे बस,बहुत हो गया,यहाँ ऐसा करेगी,तो सब हँसेंगे। बेटे की हँसी उड़वाएगी क्या ?’ सुतिया चुपचाप पति का हाथ थामे सिर पर थैली लिए आगे बढ़ गई। पति के हाथ में एक छोटा नया बैग था,जिसे उसने खास आज ही के दिन के लिए खरीदा था। तेज रफ्तार के साथ दोनों लाल मैदान की ओर बढ़ गए।
देख इसी को कहते हैं लाल मैदान। खचाखच भीड़। रास्ता खोजना सरल नई है,पर तू चिंता मत कर। कारड लाई है ? पति ने पूछा। सुतिया उसके हाथों में कारड निकालकर दे,इसके पूर्व ही जोरदार धक्के के साथ वह दूर फेंका गया। अबे, येऽऽ-कौन है बे तू ? स्साले इधर कैसे आया ? एक गठीली रौबदार आवाज दोनों के बीच मोटी दीवार बन कर उठती गई और फिर दीवार के उस पार के सारे दृश्य, अदृश्य हो गए। केवल पति की कुछ चिल्लाहट सुतिया के कानों तक पहुंचने का प्रयास करती-करती असफल हो गई। अचानक सुतिया को बिजली का झटका लगा,और फिर सुतिया को कुछ नहीं मालूम। अंधेरा घुप्प..अंधेरे में फिर एक विचित्र सुगंध ने सुतिया का स्वागत किया। वह सुगंध उसके सीने पर चढ़ बैठी और तेज दुर्गंध से भरी हुई दिशाओं ने उसे दबोच लिया। भयभीत सुतिया ने बेटे के बापू को आवाज दी,बेटे को आवाज दी,लाल साहब को आवाज दी, पर सब व्यर्थ। किसी ने मुँह दबा दिया।
पौ फट रही थी, उसकी साड़ी कीचड़ से लथपथ थी। उसने आँचल को दोनों हाथों से पकड़ा और चीख-चीख कर रोना चाहा,पर आज न तो उसके गले ने उसका साथ दिया,न ही आंखों ने। उन्हें रोशनी का डर था। खुद को घसीटती हुई सुतिया सड़क पार कर रही थी।
‘कहाँ जाना है ?’ करतार सिंह ने खिड़की से झांककर पूछा। दरवाजा खुला और अचेत-सी सुतिया ट्रक के अंदर थी। एक शून्य-सा निर्मित हो गया,जो बढ़ता जा रहा था। हक्का-बक्का करतार सिंह गाड़ी चलाता रहा।
आखिर पूछ ही बैठा-‘कहाँ जाएगी ? कहाँ है तेरा घर ?,
कहाँ छोड़ दूँ तुझे ? कौन था तेरे साथ ?’
बहरी-गूंगी-सी सुतिया मूर्तिवत् बैठी रही। भागती हुई गाड़ी अब जंगलों के बीच से गुजर रही थी। कहीं पेड़ पर लटके शेर के मुखौटे ने चेताया-‘हिंसक जीवों से सावधान।’ कहीं किसी मुखौटे ने झांकते हुए अपना बचाव किया-‘वन्य पशुओं को क्षति न पहुचाएँ’। गाड़ी भागती रही और जब रुकी तो सुतिया को लेकर करतार सिंह ढाबे में पहुंचा।
पिछले कई बरसों से सुतिया इसी ढाबे में है। उसकी आँखों ने हर प्रहर को सहेजा और पथराती चली गई। सुतिया के हाथ चाय पिलाने में व्यस्त रहे और आँखें सुदूर भविष्य की भाग-दौड़ में।
आज गाँव को क्या हुआ ? उसके चारों ओर आज अचानक फिर अनेक प्रकार की गंधों का साम्राज्य था। इन सबके बीच एक तीखी-सी गंध थी। एक विचित्र-सी गंध। सुतिया घबरा उठी। यह गंध दर्द का सैलाब लेकर आती है। उसकी शांति और सपनों को बहा कर ले जाती है। आज क्या ले जाएगी यह गंध ? उसका जी घबराने लगा। कल शाम से ही चैक में खूब चहल-पहल थी,चाय खूब पी लोगों ने। गर्मजोशी हवा में घुल रही थी। सुबह लोगों की आँखों में एक चमक थी। आज माहौल कुछ अधिक गर्म और ताजा था। लोगों के चेहरे किसी नई खुशी से सजे हुए लग रहे थे। धीरे-धीरे यह सजावट सड़कों पर उतरने लगी। सड़कें सज गई,दुकानें सज गई। लोगों के घर-आंगन भी सजने लगे। सजावट ने धीरे-धीरे चेहरों को भी छू लिया। एक-एक कर सारे चेहरे सजने लगे। फिर वही परिचित-सी सुगंध बाहर से फैलती हुई ढाबे में आ बैठती है। सुतिया का कलेजा बैठा जा रहा हैं। अब किसे छीन कर ले जाएगी ये गंध ? आज उसके पास है ही क्या, छीन जाने के लिए केवल कुछ सपने.. पति बेटे के मिलने के। सुतिया ने पैर अंगीठी से सटा दिए और वहीं बैठ गई। भयग्रस्त घुटने उसके सीने से जा लगे। इन दस बरसों में अंगीठी के अंगारों के साथ-साथ उसका अंतस भी राख में तब्दील होता जा रहा था। फिर भी दो सपने बचें थे। सुतिया के सिर पर रेगिस्तान उतर आया था। चेहरा एक सूखे मैदान की तरह हो गया था,जिसमें से धीरे-धीरे गढ्ढे झांकने लगे थे। मृग-मरिचिका में दम तोड़ते दो-हिरण अब स्थिर हो जाना चाहते थे। चमड़ी पर समय की भद्दी पर्त चढ़ आई थी। एड़ियों पर बिच्छू चढ़ चुके थे। बार-बार सुलगती-बुझती हुई अंगीठी के साथ एक चुकती हुई कहानी का मौन,मुखर हो गया था।
ढाबे के बाहर खूब शोर,फौज-फटाके,नारे,जयकारे तथा तालियों के साथ-साथ रौनक बढ़ती जा रही थी।
‘सुतिया जल्दी चल,साहब तेरी चाय से हमेशा खुश होते हैं न ? आज तुझे बख्शीश देना चाहते हैं’-करतार सिंह ने सुतिया से कहा। सुतिया कोई निर्णय ले पाए,इससे पहले वह उसे लगभग घसीटता-सा ले जा रहा था। बड़े साहब कुर्सी से उठ चुके थे। सुतिया को देखते ही बोले-‘लो माता जी,आपकी बढ़िया चाय के लिए बख्शीश।’ साहब की ओर लपकती हुई सुतिया अचानक दहाड़ मारकर रो पड़ी-‘बेटा,बेटा तू कहाँ था अब तक ? आगे बढ़ती हुई सुतिया को देखकर एक आकृति स्तब्ध हो गई। चारों ओर से फटाफट पचासों तस्वीरें खींची गई और प्रश्नों की बौछार होने लगी……………..
‘सर,क्या ये आपकी माता जी है ?’ सर, ………………………………………….? सर, …………………………………………..?’
कुछ हाथों ने सामने की भीड़ को धकेल दिया और कुछ होंठों ने जवाब दे दिया.. ‘अरे,क्या बात कर रहे हैं आप ? हमारे सर महान् हैं। वे हर औरत को अपनी माँ के बराबर सम्मान देते हैं।’
इधर बड़े साहब की आँखों में एक समूचा जंगल उग आया था,जहाँ खड़े वे जमीन के उस टुकड़े को देख रहे थे, जहाँ से उनकी जड़ें जुड़ी थी। जहाँ उन्होंने खुद को खड़ा किया था। आज इस जमीन और जड़ को अपना समझने का साहस इस वक्त उनमें नहीं था। दूसरे दिन बड़े साहब के नाम पर अखबार भी सज गया था। आज फिर एक नई सुगंध से तर-बतर हो रही थी हवा,मोहल्ला और समूचा शहर। इस सुगंध में छुपी दुर्गंध को करतारसिंह ने अनुभव किया। न सिर्फ अनुभव किया,बल्कि बरसों पीछे पलट कर उसने उसे साफ-साफ देख भी लिया। इस बोझिल समय में उसे यह दुर्गंध फैलती हुई नजर आई। वह चिंतित-सा था,अपनी जमीन और जड़ को न पहचानने वाली इस दुर्गंध से,लेकिन उसके भीतर लगा था एक संकल्प। वह धीरे-धीरे ढाबे की ओर बढ़ गया।
भीड़ के धक्के ने पल भर के लिए सुतिया के होश उड़ा दिए। एक बार इस भीड़ ने उसका सब कुछ लूट लिया था,परन्तु अब क्या लूटेगी ये भीड़ ………? कुछ शेष नहीं रहा। नहीं! आज भी शेष है,उम्मीद। पति से मिलने की उम्मीद,बेटे को पाने की उम्मीद।’ कुछ याद नहीं आता। बेटा सोला बरस का तो था,जब सहर आ गया था। आज भी भीड़ में वहीं अजीब-सी गंध थी। इस गंध से वह घबराती है। उसने खुद को सचेत किया। भीड़ में डटी रही। उचक-उचक कर साहब को देखती रही। ये साहब तो…..कहीं देखा है क्या ? पर कहाँ …….? अचानक वह चीख पड़ी …..बीजेऽऽऽऽ मेरा बीजेऽऽऽऽऽ….। कुछ महिलाओं ने खींचकर सुतिया को बाहर किया। कुछ लोगों ने अनुमान जताया कि,उसे देवता तो नही चढ़ा……..।
सुतिया को उसके छोटे-से कमरे में बंद कर दिया गया। वह वहीं चीखती रही। धीरे-धीरे बाहर कोलाहल कम हो गया,उसके भीतर कोलाहल बढ़ता गया। उसे याद आया-कितने निर्जला उपवास किए। कितनी मान-मनौती की देवी-देवताओं की। तब जाके पैदा हुआ था बीजे। पति ने दूसरी शादी की धमकी तक दे दी थी सुतिया को। छठी पूजा के दिन पंडित जी ने नाम रखा-‘विजय’। सबने उसे ‘बीजे’ कहा। बीजे को हँसते-खेलते देखने के लिए उसने पैरपट्टी बेच दी…….पैर नहीं कांपे। उसे पढ़ाने के लिए करधन बेच दी….कमर नहीं थकी। उसे शहर में पढ़ाने के लिए हाथ की कंकनी बिक गई………पर हाथ नहीं रूके। वह एक टाईम भूखी रहकर सोने लगी…..कमजोर नहीं हुई और अंत में बंधुआ मजूरी भी करने लगी……पर हारी नहीं। और आज……….? उसे उम्मीद थी कि कोई आएगा……. दरवाजा खोलेगा,उसे उसका बेटा मिल जाएगा। जिंदगी भर का दर्द मिट जाएगा। उसे सीने से लगा कर वह सारी जिंदगी का दर्द भूल जाएगी….
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसकी आँखों से गरम पानी के सोते फूट पड़े।
पता नहीं कब,किसने कमरे की कुंडी खोल दी थी। बाहर तूफान गुजर जाने जैसी शांति थी। सुतिया ने जैसे कोई दुःस्वप्न देखा हो। बेहद ठंडी और मृतप्राय हो चुकी सुतिया अचानक उठ बैठी। बाहर आई। सब ओर निराश नज़रें फेरती रही,पर दूसरे ही क्षण उसने खुद को झकझोरा। उसने सोचा दुनिया कभी खत्म नहीं होती और कल की टूटन और वितृष्णा को निकाल फेंकने के लिए उसने कसम ली। उसकी आँखों में फिर आँसू आ गए,किंतु आज उसके भीतर एक तृष्णा थी…….प्यार की,अपनेपन की, लोगों का दुःख सुख बांटने की,समाज के बने रिश्तों को भूलकर आत्मीयता व सम्मान से बने रिश्तों को जोड़ने की।
निराशा के लंबे घने कोहरे और ठंड से जम चुकी सुतिया धीरे-धीरे पिघल रही थी।

  #डाॅ. मृणालिका ओझा

परिचय : डाॅ. मृणालिका ओझा रायपुर (छत्तीसगढ़) के कुशलपुर में रहती हैं। करीब ६१ वर्षीय डॉ.ओझा ने एमए सहित पीएचडी (लोक कथाओं का अनुशीलन) की है। सभी प्रमुख पत्रपत्रिकाओं (सरिता, नवनीत, जनधर्म, देवपुत्र आदि) में कहानियां, लेख,कविता आदि प्रकाशित हुए हैं।इसके अतिरिक्त अनेक नाटकों, टेलीफिलम्स एवं फिल्मों की पटकथा का भी लेखन आपने किया है। छत्तीसगढ़ी लोक कथाएं, काव्य संग्रह मानवाधिकार पर ३ पुस्तकें,लोक कथा में लोक और लालित्य,जंगल मितान आदि प्रकाशन आपके नाम है।
रेडियो मास्को (ताशकंद) से प्रसारण, डाईट शेवेले पं. जर्मनी से कविताओं का प्रसारण और आकाशवाणी-(भोपाल एवं रायपुर) से कहानी,वार्ता, परिचर्चा, कविता एवं नाटक का प्रसारण भी हुआ है। आप रेडियो में नाटक की अधिमान्य कलाकार और उद्घोषक भी हैं। कई संस्थाओं से जुड़कर समाज सेवा में सक्रिय हैं तो,३० से अधिक सम्मान के साथ ही ३ अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी पाए हैं। इसमें राज्यपाल सम्मान,ताजमुगलिनी आदि विशेष हैं।

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।