बारिश*

Read Time0Seconds
priyanka pankhi
*जैसे ही आसमान में घनघोर घटा छायी, बिजली कड़क ने लगी, बादल भी अपने बरसने के पूरे मूड़ में आ गया और श्वेत से श्याम रंग धारण किया वैसे ही प्रीतेश के मन रूपी बादल के रंग भी बदलने लगे।*
 वो कला रंग भी शायद अतित की काली यादों को ताज़ा कर रहा था साथ धड़कन को भी तेज़। यह इस साल के मौसम की प्रथम बारिश थी जो प्रीतेश को यादों रूपी बारिश से भीगो रही थी।
 बिजली के जैसे शीतल का दिदार उसकी आँखों में चमकने लगा। वो उस दौर की यादों में शायद भीगने से डर रहा था। शाम के सात ही बजे थे पर अंधेरा इतना फैला की जैसे रात ही हो गयी हो।
       अपने कमरे में लैपटॉप पर का काम  छोड़कर फ़टाफ़ट आरपार दिखने वाले खिड़कियोँ के ग्लास बंध करने के साथ पर्दे भी लगा दीये कहीं यह बारिश का दृश्य उसकी स्मृति में शीतल की छाया न ले आये। उसने कानों में रुई लगा ली ताकि बारिश  की आवाज उसको शीतल के आवाज की याद न दिला दे।
*आखिर मौसम का जीवन की घटनाओं पर इतना प्रभाव होता है यह उससे ज्यादा कौन समझ सकता था भला?* शीतल उसकी अर्धांगिनी थी जो आज से छह- सात महीने पहले ही यह दुनिया छोड़कर चल बसी थी। न चाहते हुए भी प्रीतेश की आँखों में वो दृश्य उमट पड़ा। शीतल को बारिश बहुत प्रिय थी। दोनो कई बार इस मौसम में लॉन्ग ड्राइव पर जाते।  अंतिम बार वो और शीतल कहीं बीच पर घूमने निकले थे फिर इस बरसात ने शीतल को लौटने न दिया।!
     *जिस मौसम में प्रणय के फ़ाग खेले वहीं आज आग लगा रहे थे।* आखिर जो सदा आग बुझाता है वह भी ऐसी यादों रूपी अग्नि में जला सकता है! पानी भी समय सम बेवफ़ा हो सकता है! कहीँ यह शीतल ही है जो ऊपर से मेरी यादों में रो रही है! ऐसा सब सोचते सोचते तो कहीं कुदरत को कोसते कोसते उसे कब नींद लग गयी पता ही नहीं पड़ा। सुबह छह बजे का सूरज शीतल सम शीतल और बादलों से ढंका हुआ महसूस किया जिसने धीरे धीरे दिन बढ़ते गरमाहट ऐसी दी की शीतल की यादों रूपी शीतलता भी दैनिक व्यस्तता के कार्यो में ओझल हो गयी पर पूर्णतः गायब तो इस जीवन में कभी नहीं होंगी।
नाम – प्रियंका शाह
 खारघर (नवी मुंबई)
0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

आँसू 

Tue Jul 17 , 2018
दिल की दीवारें जब दरकी रिस रिस जल की बूँदे सरकी। पीड़ा के बदरा मंडराये अश्रु नयन ये रोक न पाये। आँसू आखों का मौन तोड़ यह गिरा नयनो की बेजोड़ अवरुद्घ कंठ नहीं कह पाता यह सारी गाथा समझाता । यह नयनों का दुर्लभ मोती ओस बिन्दु निज आभा […]

You May Like

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।