कितनी हुई पराई बेटी

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sushil

होती सबको प्यारी बेटी,
सबकी राजदुलारी बेटी..
गुड़िया को बहलाती बेटी,
जीवन को महकाती बेटी।

सपनों को चहकाती बेटी,
रिश्तों को समझाती बेटी..
कलियों-सी खिल जाती बेटी,
मुझसे जब मिल जाती बेटी।

सपनों में मुस्काती बेटी,
माँ को नाच नचाती बेटी..
पापा काँधे चढ़ती बेटी,
उमर लांघकर बढ़ती बेटी।

यौवन की देहरी पर बेटी,
कुछ संभली सहरी-सी बेटी..
माँ का हाथ बटाती बेटी,
सपनों में खो जाती बेटी।

शादी की हाँ भरती बेटी,
मन में शंका करती बेटी..
बाज़ारों-सी सजती बेटी,
पापा के लिए चिंतित बेटी।

माँ के लिए आशंकित बेटी,
दुल्हन सजी सजाई बेटी..
पर्वत पीर पराई बेटी,
प्रीतम के घर जाती बेटी।

हम सबको बिलखाती बेटी,
बाबुल गले लगाई बेटी..
अपनी कोख से जाइ बेटी,
कितनी हुई पराई बेटी।

     #सुशील शर्मा

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।