मै परीकथाएं लिखती हूँ,क्योंकि जीवन का १५ प्रतिशत यथार्थ,८५ फीसदी कल्पनाओं की परीकथा से ही संवरता है,और मुझे अपना यथार्थ भी परी कथाओं-सा स्वप्निल चाहिएl कहीं किसी ने मेरी रचनाओं को पढ़कर कहा-`खूब परी-कथाएं लिखिएl` तब से सोचती हूँ हर रोज़.. `क्या गलत करती हूँ जो, हर तरफ लगी साम्प्रदायिकता की […]
