आना-जाना,कभी चले जाना,
कभी रुक-रुक के देखते जाना;
झाँकना और कभी चल देना,
करते हो क्या कमाल तुम कान्हा।
कान में कह के कभी चल देना,
‘तुम्हीं हो ब्रह्म समझ यह लेना’;
लेना-देना कभी न कुछ करना,
बिना माँगे ही कभी दे देना।
उर में जो चाहा वह समझ लेना,
सुर रहा भाया,वो बजा देना;
दूर झटके से कभी कर देना,
कभी अटका किसी से है देना।
जानते क्या सही है,ना क्या सही,
मन में रखते हो सभी जन की बही;
कड़ी हर जोड़ते रहे हो मही,
सुधी सर्वज्ञ समाहित सुद्रढ़ी।
नचा कब देना,नबा कब देना,
सभी जन सीखते रहे जीना;
‘मधु’ मानस को सुर दिए भीना,
नवीना चिर बनाए लवलीना॥
वारौ सौ मन मोहन,
वारौ सो मन मोहन,न्यारौ २ बचपन;
करतूतन सम्मोहन,आत्मन भरि अपनौ-पन।
प्रांगण में रस घोलत,प्राणन कूँ संचारत;
प्रस्फुर प्रष्फुट होवत,तन मन कूँ वो सोहत।
झँकृत संस्कृत करवत,करि २ नाटक अदभुत;
झाँकिन ते मन मोहत,झाँकत त्रिभुवन रहवत॥
ताड़त सब धावत द्रुत,द्युति द्रग कान्हा चितवत;
माँ कूँ ना छोड़ि सकत,रहि-रहि कें वो देखत।
नटखट लीला करवत,‘मधु’ हिय चाखन चाहत;
अखिल भुवन अँखियन रखि,लोरिन लै के थिरकन॥
(लंदन से नई दिल्ली विमान में रचित)
#गोपाल बघेल ‘मधु’
परिचय : ५००० से अधिक मौलिक रचनाएँ रच चुके गोपाल बघेल ‘मधु’ सिर्फ हिन्दी ही नहीं,ब्रज,बंगला,उर्दू और अंग्रेजी भाषा में भी लिखते हैं। आप अखिल विश्व हिन्दी समिति के अध्यक्ष होने के साथ ही हिन्दी साहित्य सभा से भी जुड़े हुए हैं। आप टोरोंटो (ओंटारियो,कनाडा)में बसे हुए हैं। जुलाई १९४७ में मथुरा(उ.प्र.)में जन्म लेने वाले श्री बघेल एनआईटी (दुर्गापुर,प.बंगाल) से १९७० में यान्त्रिक अभियान्त्रिकी व एआईएमए के साथ ही दिल्ली से १९७८ में प्रबन्ध शास्त्र आदि कर चुके हैं। भारतीय काग़ज़ उद्योग में २७ वर्ष तक अभियंत्रण,प्रबंधन,महाप्रबंधन व व्यापार करने के बाद टोरोंटो में १९९७ से रहते हुए आयात-निर्यात में सक्रिय हैं। लेखनी अधिकतर आध्यात्मिक प्रबन्ध आदि पर चलती है। प्रमुख रचनाओं में-आनन्द अनुभूति, मधुगीति,आनन्द गंगा व आनन्द सुधा आदि विशहै। नारायणी साहित्य अकादमी(नई दिल्ली)और चेतना साहित्य सभा (लखनऊ)के अतिरिक्त अनेक संस्थाओं से सम्मानित हो चुके हैं।