कलम कनक की भले नहीं है,
अक्षर असर तो फिर भी करेंगे।
कागज करार भले ही करे न,
मसि कसी तो सब सार सरेंगे।
पटल रजत जो कभी मिला तो,
पीड़ा तृण कण्टकों की हरेंगें।
उम्मीदों के पंख भले कोमल हो ,
लेखन से नभ परवाज उड़ेंगे।
एक से मिल एक ग्यारह बने तो,
कदम चल के मंजिल पे जमेंगे।
स्याह स्याही जो कागज ढली तो,
ज्ञान के अगणित दीप जलेंगे।
न मिले भले सम्मान सिक्कों के,
लिख-लिख तब कागज भी चलेंगें।
शान हमारी जो न कभी बनी तो,
कलम की धार और तीक्ष्ण करेंगें।
दिलकश भावों को सहेज सके हो,
कलमकार बन कागज भरेंगे।
अक्स समाज का लफ़्ज बने जो,
जन के मन फिर न कभी डरेंगें।
अन्याय अनीति अपमान अवक्षय,
राम शर की जन-ज्वाला जलेंगे।
वाणी वीर विपुल-सी न सही वो,
स्वर समय का सजा-साज सुनेंगें।
कमजोर कमसिन कमतर कर भी,
देकर जोश जोर पुरजोर भरेंगें।
तीक्ष्ण तीर तरकश तेजस तो,
तेज थार तट-तिनपार तरेंगें।
प्रेम पीर,प्रकृति पुर पूरण का,
प्राण प्रणय प्रण पर पुरेंगे।
जलद जो जम-जमकर झमके ,
मन मयूर मदमस्त उड़ेंगें।
लेखन लक्ष्य लेकर लोह लहके ,
लिखकर लेख उल्लेख लिखेंगें।
रंग-रंग से रंग रहे संस्कृति संग,
पावन-होली के रंगों से रंगेंगें।
काया-खाक कर्म-तत्व बनाकर,
आत्मा से कण-कण में रमेंगें।
आरती माँ भारत-भू की गाकर,
भारत-भाग्य विधाता भजेंगें॥
#दुर्गेश कुमार
परिचय: दुर्गेश कुमार मेघवाल का निवास राजस्थान के बूंदी शहर में है।आपकी जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी है। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ली है और कार्यक्षेत्र भी शिक्षा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। विधा-काव्य है और इसके ज़रिए सोशल मीडिया पर बने हुए हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी की सेवा ,मन की सन्तुष्टि ,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है।