८ साल का भव्य और ५ साल की अनन्या भाई-बहन है। दोनों ही खूब झगड़ा करते थे। भव्य सीधा-सादा था जबकि अनन्या शैतान थी। वो भव्य को नोंचती-मारती, और कभी-कभी तो काट खाती। भव्य बड़ा होने के कारण सब सहन कर लेता था,पर कभी तो वो बदला ले ही लेता था। उन सबके वावजूद दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। अनन्या,भव्य को रोता हुआ नहीं देख सकती थी,तो भव्य अनन्या का पूरा ख्याल रखता था। एक बार उन दोनों की जबरदस्त लड़ाई हो गई। खूब मारा-कूटी,काटना,नोंचना,हाथ-लात सब चल गए। दोनों खूब रोए और और कट्टी हो गए।
अब एक-दूसरे से बात नहीं करे,एक-दूसरे को देखे भी नहीं। दोनों का झगड़ा और रुठना बड़ा ही दिल छूने वाला था। २-४
दिन यूं ही निकल गए। राखी का दिन पास आ रहा था। जब भव्य को ये ध्यान आया,तो अब उसको लगा कि,मेरे को राखी कौन बांधेगा? अनन्या तो नाराज है। अब तो बड़ी मुश्किल हो गई,क्योंकि उसको राखी और टीके का बहुत शौक था। उसने सोचा-मान लो,उस दिन अनन्या ने मेरे को राखी बांध दी,तो मैं उसको क्या दूंगा! सोचने के बाद राखी के एक दिन पहले उसने इसका भी हल निकाल लिया। अपनी गुल्लक निकाली, जिसमे वो अपने खर्चे के पैसे हमेशा बचाकर रखता था। उसके पास १५० रुपए की जमा पूंजी मिली। वो सबसे छिपकर दुकान पर गया और अनन्या की पसंद का खिलौना उपहार में ले आया। इसे छिपाकर रख दिया और इंतजार करने लगा राखी का,कि अनन्या मेरे को राखी बांधेगी या नहीं। इधर अनन्या को भी जब पता लगा कि,कल राखी है और भैया को राखी बांधनी है तो वो सोच में पड़ गई। भैया तो नाराज है,मुझसे राखी बंधवाएगा कि नहीं! अब वो क्या करे ? छोटी थी तो मम्मी के पास गई,पर बात नहीं बनी। तब उसने भी अपनी गुल्लक संभाली तो 100 रुपए की राशि मिली। वो पास की दुकान पर गई,बोली-अंकल मुझे सुंदर-सी राखी दे दो,भैया को बांधनी है। दुकानदार उस मासूम की बात पर इतना मोहित हो गया। उसे गोदी में उठा लिया और पूछा-कौन-सी राखी चाहिए? उसको जो सबसे सुंदर लगी,वो बता दी। दुकानदार राखी देकर बोला-और कुछ चाहिए ? बोली-हां। क्या चाहिए ? बोली-बड़ी वाली टॉफी। ओह। राखी और टॉफी लेकर अनन्या घर आई ,तथा बैग में छिपाकर रख दी।
दूसरे दिन राखी थी,इसलिए घर में चहल- पहल थी। बुआ आदि आई हुई थी,पर दोनों भाई-बहन सुस्त थे। शंका थी कि, अनन्या राखी बांधेगी या नहीं..भाई राखी बंधवाएगा कि नहीं! फिर राखी बांधने का समय भी आ गया। बुआ राखी बांधने लगी थी। भव्य इधर आओ,राखी बँधवाओ-बुआ ने कहा। ये सुनकर भव्य तो छिप गया। उसको पहली राखी बहन से बंधवानी थी,इधर अनन्या भी बुआ से राखी नही बंधवा रही थी। बुआ ने जब दुबारा पुकारा तो भव्य को लगा कि,अब बुआ नहीं मानेगी। जब बहुत देर हो गई तो भव्य से रहा नहीं गया। वो अनन्या के
सामने जाकर शर्ट की बांह ऊँची कर हाथ आगे बढ़ाकर खड़ा हो गया,और अनन्या से कलाई की तरफ इशारा करने लगा कि,मुझे राखी बांध। पहले तो अनन्या समझी नहीं,पर जब अनन्या को समझ आया तो वो ख़ुशी से भागी और बैग से राखी और टॉफी निकालकर ले आई। बड़े ही प्यार से खुद की लाई राखी बांधने लगी। पहले रोली का टीका लगाया,फिर चावल लगाए,फिर टॉफी खिलाई और राखी बाँधी। अब उससे रहा नहीं गया,और वो भाई के गले लग के रो पड़ी। दोनों भाई-बहन गले मिल रहे थे,रो रहे थे। ‘सॉरी भैया,अब नहीं मारुँगी, माफ़ कर दो।’ ‘मैं भी नहीं मारुंगा,हम कभी नहीं लड़ेंगे।’ ऐसा मार्मिक दृश्य देख सभी की आँखों मे आंसू आ गए थे। तभी भव्य को याद आया और वो छिपाकर रखा गिफ्ट लेकर आया और अनन्या को दिया। उसे लेकर तो वो बहुत खुश हो गई। ये देखकर घरवाले सोच रहे थे कि, दोनों ने ये सब कैसे और कब किया ?
एेसा होता है भाई-बहन का प्यार….।
#श्रीमती राजेश्वरी जोशी
परिचय : श्रीमती राजेश्वरी जोशी का निवास अजमेर (राजस्थान) में है। आप लेखन में मन के भावों को अधिक उकेरती हैं,और तनुश्री नाम से लिखती हैं।