- किताबों से प्यार हो जाए
दुख भी सुख के आगे लाचार हो जाए,
तुमको किताबों से अगर जो प्यार हो जाए।
रोशनी का एक नया आफ़ताब मिलेगा,
तुमको पढ़ने से केवल लाभ मिलेगा।
किताबें जो रहीं सिरहाने तुम्हारे,
ज़िंदगी में उड़ने का ख़्वाब मिलेगा।
जीवन में ख़ुशियों का अंबार हो जाए,
तुमको किताबों से गर जो प्यार हो जाए।।
शिक्षा के कौशलों का आधार हैं किताबें,
हमारा आने वाला प्यारा संसार हैं किताबें।
जीवन है अगर हमारा संघर्षों से भरा,
तो उन संघर्षों का पूरा सार हैं किताबें।
तो ये उजाले भी हम पर निसार हो जाएँ,
तुमको किताबों से गर जो प्यार हो जाए।।
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- उपवास करती है
करके शृंगार यूँ उल्लास करती है,
मुझे पाने के लिए वो उपवास करती है।
सुहागन बनकर सिंदूर लगा रही है,
ये कुदरत तुम्हारा सौंदर्य बड़ा रही है।
मैं मिल जाऊँ उसे हर जन्म में,
वो निर्जल रहकर तीज मना रही है।
मेरे अंधकार में वो उजास करती है,
मुझे पाने के लिए वो उपवास करती है।।
सजकर यूँ ख़ुद को शोभित करती है,
पार्वती बन अपने शिव को मोहित करती है।
ख़ुद की उम्र मुझ पर लगाकर पगली,
सौ-सौ साल तक मुझको जीवित करती है।
अपने से ज़्यादा मुझ पर विश्वास करती है,
मुझे पाने के लिए वो उपवास करती है।।
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- दिल मेरा भारत गाया करता है
धरा से हो के अकाश तक झंडा लहराया करता है,
दिल मेरा भारत, भारत, भारत गाया करता है।
कितनी माँओं ने नहीं की चिंता मणिक की,
इस धरा पर सबसे महँगी वीरगति सैनिक की।
दिव्य कफ़न पर सैनिक लिपट कर आया करता है,
दिल मेरा भारत, भारत, भारत गाया करता है।।
लौट के आने के वादे कोख में रह जाते हैं,
कितने बच्चे हैं, जो पिता को देख नहीं पाते हैं।
आँगन ये सूना घर का हर पल बुलाया करता है,
दिल मेरा भारत, भारत, भारत गाया करता है।।
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- मैं राखी लाई हूँ
बाँधने कलाई रेशम की डोरी लाई हूँ,
अब आ जाओ ना भैया, मैं राखी लाई हूँ।
बिटिया मेरी पूछ रही मामा कब घर आएँगे?
मुझ को बोला था, प्यारी-सी गुड़िया लेकर आएँगे।
सम्बंधों की सारी मीठी रस्में सजाई हूँ,
अब आ जाओ ना भैया, मैं राखी लाई हूँ।।
आँगन की देहरी पर कब से आस लगाए बैठी हूँ,
कुछ नहीं खाया भैया, उपवास लगाए बैठी हूँ।
खिलाने तुम्हें, मैं मिठाई लाई हूँ,
अब आ जाओ ना भैया, मैं राखी लाई हूँ।।
सरहदों से कह दो कि बहन मेरी बुलाती है,
लेलो इक रोज़ की छुट्टी, याद बड़ी सताती है।
उपहार में तेरी शान, वो वर्दी ख़ाकी लाई हूँ,
अब आ जाओ ना भैया, मैं राखी लाई हूँ।।
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- अरे ओ पगली!
अरे ओ पगली! ऐसे न कभी रोना है,
तुम बिन जादू न तुम बिन टोना है।
तुम मिल जाओ हमको तो ऐसा होगा,
रेगिस्तानों में पानी मिल जाए।
साथ हमें देखेगी जब ये दुनिया,
आश्चर्यों से आँखे हिल जाएँ।
प्रेम बीज दिल की मिट्टी में बोना है,
तुम बिन जादू न तुम बिन टोना है।।
अरे ओ पगली! ऐसे न कभी रोना है,
तुम बिन जादू न तुम बिन टोना है।
आप नदी-सी तो यूँ बह जाती हो,
हमको तो पुलों से गुज़रना है।
आप लीजिए फ़ैसला क्या करना है!
हमको वो करना है जो करना है।
कर लो अपने बस में हमको होना है,
तुम बिन जादू न तुम बिन टोना है।।
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- किसान
न दिन न रात देखी, मेहनत से खेत सींचा है,
फिर भी न कुछ मिलता, खाली मेरा खींचा है।
मेरा देश सो सके इसलिए कई रात जगा हूँ,
फिर भी देखो मैं सीना तान के खड़ा हूँ।
धूप में नंगे पैरों में मुझको छाले पड़ जाते हैं,
और अतिवृष्टि से मेरे नन्हे पौधे सड़ जाते है।
तपती दुपहरियों में छालों से लड़ा हूँ,
फिर भी देखो मैं सीना तान के खड़ा हूँ।।
सरकारें मुझसे बनती हैं, मुनाफ़ नहीं देतीं,
और कुदरत भी अब मेरा साथ नहीं देती।
मेरा देश जीवित रहे इसलिए हर रोज़ मरा हूँ,
फिर भी देखो मैं सीना तान के खड़ा हूँ।।
मेरी मेहनत का मुझे सही दाम नहीं मिलता,
मुझे लूटने से लोगों को आराम नहीं मिलता।
बेवक़्त भूखा रहूँ, तुम्हारा पेट भरने में लगा हूँ,
फिर भी देखो मैं सीना तान के खड़ा हूँ।।
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- बाबा सियाराम
नर्मदा के तट पे जिनका धाम,
मेरे संत बाबा सियाराम।
भक्तों के दिल में मुनिवर तेरा बसेरा है,
अंधियारे में तू बाबा मेरा सवेरा है,
तेरी भक्ति से ही मेरा नाम,
मेरे संत बाबा सियाराम।।
तेरे दर्शन मेरे दिल की राहत है,
हो जाए तेरी कृपा यही चाहत है,
तेरे दर पे ही मिले चारों धाम,
मेरे संत बाबा सियाराम।।
तुझ-सा बड़ा न कोई यहाँ दानी है,
तूने हर भक्त की विनती मानी है,
जपें तेरा नाम सुबह-शाम,
मेरे संत बाबा सियाराम।।
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- माँ
माँ गंगा-सी पवित्र,
माँ ख़ुशियों का साया है।
माँ गीता की वाणी-सी,
माँ हर घर की माया है।।
माँ सागर की लहरों-सी,
माँ काव्य की काया है।
माँ बिजली की गर्जन,
माँ रंग, हर दिल को भाया है।।
कांधे पर बिठाकर पिता ने,
सारा जहाँ दिखाया है।
पकड़कर उंगली माँ ने,
हमें चलना सिखाया है।।
माँ भावों से भरी हुई,
अपूर्व कविता है।
माँ तृषितों की बहती हुई,
एक सरिता है।।
माँ पूज्यनीय पर्णिका है,
माँ ही परवरदिगार है।
माँ मोहब्ब्त की वो डोरी,
जिसका न कोई आकार है।।
माँ ग्रीष्म है, माँ सर्द है,
माँ से ही सब सावन।
माँ चूल्हे की फूँकनी है,
माँ ही है चौका बासन।।
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- प्रेम था, मगर भरोसा नहीं
मुक्त कर दिया हमने, कोसा नहीं,
प्रेम तो था, मगर भरोसा नहीं।
बीज प्रेम के बोए गए थे मगर,
अपने हिस्से फसलें आईं नहीं।
ख़र्च ख़ुद को किया सिर्फ़ उसके लिए,
मरे हिस्से कोई कमाई नहीं।
क्यों किसी को हाँ कहते! सोचा नहीं,
प्रेम तो था, मगर भरोसा नहीं।
क़र्ज़ मैं इस हृदय का देता रहा,
दाम कोई और लुटाता रहा।
तुम मेरे गीत की रही नायिका,
दोस्तों को हमेशा बताता रहा।
जा रहा हूँ ये कहते रोका नहीं,
प्रेम तो था, मगर भरोसा नहीं।
तुम तो कहती थी, मैं बस तुम्हारी, तुम्हारी,
फिर बदल कैसे गई ओ प्यारी..ओ प्यारी?
क्या कमी प्रेम में जो परोसा नहीं?
प्रेम तो था मगर भरोसा नहीं।
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- मुसाफ़िर
उधर के मुसाफ़िर इधर नहीं आते,
भूल के अब वो हमारे घर नहीं आते।
हम उनकी गली के हैं मुन्तज़िर बने बैठे,
मगर वो ख़ुद अपने ही शहर नहीं आते।
जबसे मैंने निगाहें टाँग दीं उनके अर्श पर,
वो पैरहन सुखाने अब छत पर नहीं आते।
अंधेरों से जबसे दोस्ती कर ली हमने,
जुगनू भी लेने हमारी ख़बर नहीं आते।
हर बार हमीं क्यों आते हैं तुमसे मिलने?
क्यों दरिया से मिलने कभी समुंदर नहीं आते?
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#पारस बिरला
बड़ूद, सनावद (मध्य प्रदेश)
परिचय-
नाम- पारस बिरला गुर्जर
पिता- श्री गुलाबचंद बिरला
ग्राम- बडूद ज़िला खरगोन( म.प्र )
कार्य- कवि व गीतकार (निमाड़ी व हिन्दी)
जन्म- 20 जून 2002
शिक्षा- स्नातकोत्तर हिन्दी साहित्य
बी.एड (B.Ed.) अंतिम वर्ष
● दस से ज़्यादा सम्मान कविता के क्षेत्र में।
● वर्ष 2024 में मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा ‘काव्य दीप सम्मान’ से सम्मानित।
● निमाड़ी में कई गीत वायरल हुए सोशल मीडिया पर, 15 लाख से ज़्यादा लोगो ने पसंद किए।
● नेशनल टीवी पर भी अपनी कविताएँ पढ़ चुके हैं।
● निरंतर निमाड़ी व हिन्दी की सेवा अपने गीतों के माध्यम से
कर रहे हैं।
● गीत निमाड़ के टीवी चैनलों पर चलते हैं।
● किताब निमाड़ी गीतों की प्रकाशनाधीन है।
● आधे दशक से कवि सम्मेलन में सक्रिय।

