हिन्दी तीर्थ साबरमती आश्रम की यात्रा

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बापू! अब भी अपने चरखे के साथ मिले

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

सैंकड़ो शहरों की यात्राओं के अनुभव, हज़ारों साहित्यिक आयोजनों में उपस्थिति, लाखों लोगों से मिलने के अवसर के साथ यायावर को जीवन में सबकुछ तो मिल रहा है पर कुछ यादें दस्तावेज़ बनकर जीवन के अभिप्राय को अलंकृत कर जाती हैं।
गुजरात राज्य की आर्थिक राजधानी और एक ऐसा शहर अहमदाबाद, जो सरपट भागता-दौड़ता रहता है, कभी न सोने और थकने वाला शहर अपनी गुजराती भाषा पर घमण्ड करता हुआ राजसी ठाठ पर इतराता है। ऐसे ही शहर में जहाँ भोजन में चीनी(शक्कर) की बहुलता उसी तरह रिश्तों में मिठास की तरह घुल-सी जाती है, जैसे मानो गुजराती भाई ने अनायास ही कह दिया हो, ‘कैम छो भाई! कयां जावाणु छे!’
ईश्वर ने अद्भुत शिल्प से तराशा गुजरात और उस गुजरात का नगर श्रेष्ठ अहमदाबाद, इस गरवी गुजरात की यात्रा का पहला पड़ाव रहा, जहाँ सबसे पहले हिन्दी तीर्थ साबरमती आश्रम जाने का निर्णय हुआ। हाँ! वही साबरमती आश्रम, जो देश के उस संत का निवास और कर्मभूमि है, जिसने भारत की आज़ादी को सरल, सहज और सुगम्य बनाने में महती भूमिका निभाई। एक ऐसे लेखक और क्रांतिकारी, जिन्होंने ख़ुद गुजराती भाषी होने के बावजूद हिन्दी भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प भी लिया और उसके लिए देशव्यापी जनजागरुकता का बीड़ा भी उठाया। एक अप्रतिम आंदोलनकर्ता, कुशल नेतृत्वकर्ता, जिसने भारत की आज़ादी के लिए प्राणों से भैरव भी गाया और दृढ़ विश्वास के साथ भारत की आज़ादी की लड़ाई भी लड़ी। हाँ! यहाँ उसी संत की बात हो रही है, जो गोपाल कृष्ण गोखले के अनुरोध पर 1915 में पुनः भारत लौट आए और जिन्होंने 1917 में चंपारण बिहार से चंपारण आंदोलन का आगाज़ किया, आंदोलन जो कि भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन था। इस आंदोलन के माध्यम से लोगों में जन्मे विरोध को सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ आम जनता के अहिंसक प्रतिरोध को लागू करने का पहला प्रयास किया। उसी संत ने नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो जैसे कई आंदोलन चलाए। उस साबरमती के संत की कर्मभूमि ही अहमदाबाद के साबरमती नदी के किनारे पर बसा साबरमती आश्रम  है, जो हिन्दी योद्धा महात्मा गाँधी की तपस्थली है। इतिहासकारों का मत तो यह भी है कि दधीचि ऋषि का आश्रम भी यहीं पर था। संत की भूमि पर संत का निवास ही होता है, यह सनातन सत्य है।
यह आश्रम नीम, आम आदि वृक्षों की शीतल छाया में स्थित है और यहाँ की सादगी एवं शांति देखकर आश्चर्यचकित रह जाना ही यायावर का नैसर्गिक भाव है। आश्रम की एक ओर तो सेंट्रल जेल बनी हुई है और दूसरी ओर दुधेश्वर श्मशान है।

मुख्य द्वार से अंदर घुसते ही हिन्दी तीर्थ की रज का स्पर्श होना स्वाभाविक है, बाएँ की तरफ़ स्मारक बना हुआ है, जिसमें बापू से जुड़ी तमाम वस्तुएँ, यादें, वस्त्र, किताबें इत्यादि संग्रहालय में संरक्षित हैं। गाँधी जी की मृत्यु के पश्चात उनकी स्मृति को निरंतर सुरक्षित रखने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय स्मारक की स्थापना की गई। साबरमती आश्रम गाँधी जी के नेतृत्व के आरंभ काल से ही संबंधित है, अत: गाँधी-स्मारक-निधि नामक संगठन ने यह निर्णय किया कि आश्रम के उन भवनों को, जो गाँधी जी से संबंधित थे, सुरक्षित रखा जाए। इसलिए 1951 ई. में साबरमती आश्रम सुरक्षा एवं स्मृति न्यास के अस्तित्व में आया। उसी समय से यह न्यास महात्मा गाँधी के निवास, हृदयकुंज, उपासनाभूमि नामक प्रार्थनास्थल और मगन निवास की सुरक्षा के लिए कार्य कर रहा है।

इस स्मारक के अंदर घूमते हुए बापू की उपस्थिति की अनुभूतियों को जीया जा सकता है, क्योंकि जहाँ का हर कण गाँधी और हर पत्ता राम का है। स्मारक के ठीक पीछे बापू की प्रार्थना करती हुई प्रतिमा यायावर को ऐसी प्रतीत होती है मानो अभी बापू कह देंगे ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जै पीर पराई जाणे रै.!’

फलदार और छायादार पेड़ों से लदे इस आश्रम की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है। आश्रम के मध्यभाग में वो कर्मस्थल आ जाता है ‘हृदयकुंज’ जहाँ गाँधी जी एवं कस्तूरबा ने लगभग 12 वर्षों तक निवास किया था। हॄदयकुंज में आज भी गाँधी जी का डेस्क, खादी का कुर्ता, उनके पत्र आदि मौजूद हैं।
उसी निवास में इसके अलावा कस्तूरबा की रसोई इस आश्रम के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। यहाँ उनकी रसोई में इस्तेमाल किए जाने वाले चूल्हे, बर्तनों और अलमारी को भी देखा जा सकता है। इसी के पास कस्तूरबा का कमरा भी है, जहाँ आज भी कस्तूरबा की तस्वीर लगी हुई है।
“हॄदय-कुंज” के दाईं ओर “नन्दिनी” है। यह इस समय “अतिथि-कक्ष” है, जहाँ देश और विदेश से आए हुए अतिथि ठहराए जाते थे। वहीं “विनोबा कुटीर” है, जहाँ आचार्य विनोबा भावे ठहरे थे।
जैसे ही हॄदय कुंज में प्रवेश करते हैं, एक ऊर्जा का प्रवाह चेतनाशील बना देता है, उस ऊर्जा को प्रार्थना में तब्दील करने के लिए बापू की प्रार्थना भूमि जाते है।
उस दौर में आश्रम में रहने वाले सभी सदस्य प्रतिदिन सुबह-शाम प्रार्थना भूमि में एकत्र होकर प्रार्थना करते थे। यह प्रार्थना भूमि गाँधी जी द्वारा लिए गए कई ऐतिहासिक निर्णयों की साक्षी रह चुकी है।
हॄदय कुंज से थोड़ी दूरी पर स्थित है-यात्री निवास नंदिनी। यहाँ देश के कई जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी जैसे- पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी.राजगोपालाचारी, दीनबंधु एंड्रयूज और रवींद्रनाथ टैगोर आदि जब भी अहमदाबाद आते थे तो यहीं ठहरते थे।

हिन्दी तीर्थ साबरमती आश्रम का सौंदर्य इस बात से भी अनुभूत होता है कि यहाँ बापू से जुड़ी प्रत्येक चीज़ें आपसे संवाद करती प्रतीत होती हैं। बापू का चरखा बोलता है, गाँधी की मितव्ययिता और सादगी का परिचय देता है।
इसी तीर्थ में महात्मा गाँधी जी द्वारा स्थापित उद्योग मन्दिर है। सभी जानते हैं कि गाँधी जी ने हस्तनिर्मित खादी के माध्यम से देश को आज़ादी दिलाने का संकल्प लिया था। उन्होंने मानवीय श्रम को आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक बनाया। यही वह जगह थी, जहाँ गाँधी जी ने अपने आर्थिक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप दिया। यहीं से चरखे द्वारा सूत कातकर खादी के वस्त्र बनाने की शुरुआत की गई। देश के कोने-कोने से आने वाले गाँधी जी के अनुयायी इसी आश्रम में रहते थे और यहाँ उन्हें चरखा चलाने और खादी के वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था।
साबरमती आश्रम संसार की एक ऐसी जगह है, जहाँ से गाँधी जी ने अंग्रेज़ों और अंग्रेज़ियत को लताड़ने का कार्य किया, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए शुरू आंदोलन का केन्द्र बनाया और भारत की आज़ादी की नींव रखी।
इसी आश्रम के बाहर स्वल्पाहार इत्यादि की कई दुकाने हैं, जो गुजराती पकवानों की तरह यात्रियों को अनायास आकर्षित कर लेती हैं। थेपला, ढोकला ही नहीं बल्कि इसी के साथ पावभाजी इत्यादि की भी छोटी रेहड़ियाँ हैं।
अहमदाबाद में रुकने के लिए अच्छी जगह गीता मंदिर के क्षेत्र में भी है और वस्त्रापुर झील के आस-पास भी कई होटल्स हैं।
आश्रम के अलावा भी अहमदाबाद में कई जगह हैं, जहाँ घूमने के लिए जाया जा सकता है।
कुल मिला कर यह लगा कि आश्रम में आने पर आज भी शान्ति मिलती है।
फ़िलहाल गाँधी दर्शन की यादों को अपने मन पर अंकित करके यही लगता है कि आज तो बापू, अब भी अपने चरखे के साथ मिले। क्योंकि साबरमती आश्रम में आज भी मोहनदास करमचन्द गाँधी यानी महात्मा गाँधी की आत्मा बसती है। यही वह कर्मभूमि है, जहाँ से मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा गाँधी के रूप में पुकारा गया।

#डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान,
पत्रकार, स्तंभकार एवं राजनैतिक विश्लेषक
इंदौर (म.प्र.)
[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं]

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।