
अरमान दिलों में पाला नहीं जाता
अब तो खुद को सम्हाला नहीं जाता
चारों ही तरफ दहशत का मंजर है
हादसा हो कोई तो टाला नहीं जाता
जीत और हार की किसे परवाह यारों
अब तो सिक्का भी उछाला नहीं जाता
थकने लगे है पांव लंबा है सफ़र बहुत
पथरीली है ये राहें छाला नहीं जाता
सोचते रहता हूँ नींद आती नहीं रातों में
अब तो मुह में भी निवाला नहीं जाता
किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

