मौजूदा दौर में युवा लडकियां

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आज वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों के तहत उपभोक्तावाद का बुरा प्रभाव युवाओं को पड़ा है । लड़कियां चाहे या ना चाहे उन्हें एक न एक दिन इस बाजार का हिस्सा होना पड़ेगा। एक तरफ वे अपनी जम्हूरियत नागरिक एक कर्ता के रूप में समाजयात पहचान बनाने की लड़ाई लड़ रही है वहीं दूसरी तरफ उनके खिलाफ हमले आए दिन तेज हो रहे हैं सुंदरता की प्रतियोगिताएं आए दिन आयोजित की जा रही है लड़कियों को सुंदर दिखने का दबाव बनाया जा रहा है वे जैसी है उन्हें उसी रूप में यह समाज स्वीकार नहीं करता। सुंदरता यह नहीं कि उसमें कितने मानवीय गुण हैं बल्कि उन्हें ऊपर से सुंदर दिखना है आधुनिक लड़की का कांसेप्ट आया है की वे तमाम सड़ी गली परंपराओं जो रूढ़िवादी थी उनको मानते हुए भी आधुनिक रहे ऐसा समाज सोच रहा है मॉडर्न बनने की राह में वह जिस दिमाग की और जिस्मानी वेदना से गुजरती है इसे देखने की कोई जगह नहीं है कोई स्थान नहीं बचा है हमें इस बात को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। आज पूरा माहौल खराब है पूरे समाज में एक तरह का संवेदनहीन रुख बना हुआ है आमतौर पर परंपरागत रूप से युवा लड़कियों को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया गया है। युवा लड़कियां ठीक कपड़े पहने तो दोषी, हंस ले तो दोषी। हर कदम पर सबकी भेड़िए और गिद्ध जैसी नजरें उन्हीं पर टिकी हुई होती है कुछ हो जाए तो लोग एकदम कह देंगे की एक हाथ से ताली नहीं बजती। मां बाप भी लड़कियों के बारे में पॉजिटिव रूप से नहीं सोचते। वह खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं और इस असहायता से बचने का आसान तरीका ढूंढ लिया है उन्होंने विवाह में। छोटी उम्र में लड़कियों की शादी की जा रही है ऐसा क्यों ? क्या लड़कियों की असुरक्षा और उनके प्रति बढ़ते अपराध केवल लड़कियों की समस्याएं हैं? ऐसा सोचना क्या लड़कियां इनके लिए स्वय दोषी हैं? ऐसा सोचना है इस समस्या को सिर के बल खड़ा करने के समान है। दरअसल युवा लड़कियों की सुरक्षा व सम्मान से जुड़ी तमाम समस्याएं पूरे समाज की समस्याएं हैं। यह लंबे समय से विभिन्न विकृतियों में बुराइयों के प्रति बहुत ही निष्क्रिय और उदासीन रवैया अपनाया गया है मैं इतना ही नहीं कहता की समाज के बड़े हिस्से में इन मुद्दों पर भारी सहमति भी है अपराधी राजनीति को और पुलिस को व प्रशासन के गठजोड़ के कारण अक्सर यह मामले दबा दिए जाते हैं। इनके खिलाफ कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि उन्हीं की पुलिस उन्हें की पॉलिटिक्स उन्हीं के प्रशासन और तमाम सुविधाएं उंही को मिली हुई है । जो राजनीति में हैं ‌।
दुर्भाग्य से हम इन्हें सामाजिक समस्या की तरह देखने की वजह खुद लड़की को ही उसके होने मात्र को ही समस्या मान लेते हैं हमारे समाज में शुरू से ही लड़कियों को कमजोर असहाय औरों पर निर्भर रहनेवाला समझा जाता है ।वह हर बात को खामोशी से निर्विरोध करने की शिक्षा दी जाती है न्याय के लिए लड़ती हुई लड़की को हर कदम रोका जाता है उसका उत्साह कम किया जाता है इससे अपराधियों का मनोबल और बढ़ता जाता है और उन्हें फलने फूलने का पूरा मौका मिलता है और अपनी पूरी चौड़ी छाती फैला लेते हैं और गलियों में घूमने लग जाते हैं आज जरूरत इस बात की है कि समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ परिवार ,विवाह संस्था ,प्रशासन, न्याय प्रणाली, मीडिया आदि सब विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक ढांचों और सरंचनाओ में जो विकृतियां हैं जो कमजोरियां हैं उन सब के खिलाफ सुधार करने का हमने एक पुरजोर कार्यक्रम बनाना चाहिए और हमने इनसे लड़ने की क्षमता होनी चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही साथ सामाजिक और राजनीतिक हर स्तर पर हिंसा वह अपराध के खिलाफ दबाव बनाना भी जरूरी है हम जहां जिस जगह भी रहते हैं काम करते हैं वहां अन्याय और अपराध की इन तमाम घटनाओं में सक्रिय हस्तक्षेप कर असली अपराधी को केंद्र में लाएं और अपराधों का एक केंद्र खोला जाए जिसमें केवल महिलाओं और युवा लड़कियां ,लड़कियां, युवतियां की समस्या ही सुलझाए जाए और उन को जड़ से मिटाने का भरसक प्रयास किया जाए मानते हैं की लड़कियां ही समस्या की जड़ लगने लगती है इस नजरिए को भी हमने उस केंन्दर में आकर बदलना होगा। क्योंकि इससे ही वही व्यक्ति जो उत्पीड़न भुगत रहा है दोषी बन जाता है और असली दोषी सुरक्षित बच निकलता है साथिया में यह भी देखना होगा कि इन तमाम घटनाओं की जांच के समय लड़की के चरित्र को आधार बनाकर अपराध करने वाले को ही मुख्य निशाना बनाया जाए आमतौर पर यह देखने में आता है कि अपराध के संगीन से संगीन मामलों मैं भी लड़की को ही चरित्र व बिगड़ी हुई बताकर अपराधी के हर दोष को छिपाने की कोशिश की जाती है। जहां लड़कियों लड़कियों पर जबरदस्त दबाव है वही उनमें प्रतिरोधक क्षमता भी बड़ी है उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है उन्हें जहां जहां जितने जितने मौके मिले हैं वहां-वहां उन्होंने अपनी रचनात्मक अक्षमता दिखाइए कोई क्षेत्र लड़कियों के कारनामों से अछूता नहीं है शिक्षा का क्षेत्र, खेलकूद का क्षेत्र, पुलिस का क्षेत्र, सेना का क्षेत्र ,वायु सेना का क्षेत्र ,है यहां तक की अंतरिक्ष का क्षेत्र ,कल्पना चावला को कौन नहीं जानता संतोष यादव को कौन नहीं जानता जो माउंट एवरेस्ट पर चढ़ी कल्पना चावला जो अंतरिक्ष में गई और उन्होंने अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया है जब लड़कों के मुकाबले इनका एक्सपोजर कम है हरियाणा में अनेक मौकों पर लड़कियों ने आंदोलन किए हैं मसलन उदाहरण के तौर पर
घरों और समाज के भारी प्रतिरोध के बावजूद नाटकों में लड़कियों को शामिल करना गोत्र पंचायतों की विवाहित जोड़ों को भाई-बहन बनाने के फतवों के खिलाफ औरतों ने आवाज उठाई इसके अलावा और भी आंदोलन हुए हैं ऐसे अनेक उदाहरण है पूरे देश में मौजूद होने के बावजूद लड़कियों के बोझ की तरह देखा जाता है और इसी के चलते लिंग अनुपात की खतरनाक स्थिति है ।एक लड़की जो बौद्धिक प्राणी है जो सबसे बेहतर है जो संवेदनशील है जो दूसरों के सुख दुख को समझती है जिसमें सेवा भाव है जो घर का सारा काम करती है वह भोज है लोगों से बात करें तो कहते हैं बुरा समय आ गया है दहेज देना पड़ता है आदि आदि बातें करते हैं हम उनसे पूछना चाहते हैं इन सबके लिए कौन जिम्मेदार है? नहीं लोग इसे बदलना नहीं चाहते अपनी असहायता को किस्मत मान बैठते हैं हजारों बहाने बनाते हैं अपने लड़कियों को ही पराया धन कहते हैं तमाम समस्याओं से लड़ने को तैयार नहीं है और खत्म लड़कियों को ही कर रहे हैं वह लड़कियां जो पढ़ाई पूरी करती हैं जिन्हें देश दुनिया में अपना मां बाप का ,इलाके का ,नाम रोशन किया है जो बिल्कुल निर्दोष है उन्हें समाज खत्म करने पर तुला हुआ है यह कैसा समाज बना रहे हैं हम एक मानवीय समाज बनाने की बजाय हिंसक समाज बनाने पर तुले हुए हैं महिलाएं घर में पीट रही है इस क्रूरता को नहीं समझा जा रहा ऐसे बहुत से उदाहरण है जो हरियाणा में हुए हैं कोई घरेलू हिंसा का शिकार हुई है तो कोई पीटी है तो कोई दहेज की कारण मौत हुई है यह तमाम सवाल असल में सिर्फ महिलाओं के सवाल ही नहीं है पूरे समाज के सवाल है अतः पूरे हौसलों के साथ इनके खिलाफ लड़ाई लड़ने का मन बनाना चाहिए महिलाओं और विशेषकर युवा लड़कियों के व्यक्तित्व को एक पूरे जिम्मेदारी इंसान की तरह दिखने की कोशिश करनी चाहिए हमने अजीब बाजिया लगती है गांव में लड़कियों के वोट के बनवाने की इजाजत कोई नहीं देता लड़कियां अपने कैरियर का चुनाव नहीं कर सकती यह सबसे बड़ी गांव की मानसिकता कमजोरी है कोई लड़की खेलना चाहती है तो उसको कहते हैं यह बनेगी पहलवान कोई संगीत में जाना चाहती है तो उसको कहते यह बनेगी सांगी या बाहर और कोई पॉलिटिक्स में जाना चाहती है तो उसको कहते यह बढ़ेगी और ब्यूटी पार्लर का काम सीखना चाहती है तो उसको कहते हैं यहनाई वाला काम चीखेगी। मतलब हर जगह उसको रोका जाता है आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है सब कुछ दूसरे ही तय करते हैं लड़कियां या अविवाहित युवतियों की इच्छा की कोई जगह नहीं है शादी के बाद युवतियों पर और भी भारी दबाव आ जाता है उन्हें उसके पति ससुर जेठ देवर सब की माननी पड़ती है और जो कुछ करने की इच्छा होती है वह दब जाती है मसलन घुंघट के सवाल पर दबाव महिलाओं ने घुंघट करना चाहिए ऐसी आशीष वाले करते हैं महिलाएं चांद पर जा चुकी है जहां उन्हें मूड के गुलाब की तरह सारे काम करने को मजबूर किया जाता है अगर कोई लड़की या परिवार पर्दा खोलने की हिम्मत जुटा मिले तो उस पर गांव के ठेकेदार थोड़े दार अनाप-शनाप गालियां देते हैं और फब्तियां कसते हैं और कहते हैं तुम्हें शर्म आनी चाहिए और कहते हैं यह बहु है गांव की जानबूझकर कहते हैं उनको और कहते हैं कौन सा है किसकी बहू है इस तर ह पूछते है यह गांव की छोरी है या बहू है जानबूझकर उनको चलाते रहते हैं और कहते हैं तुम्हें शर्म नहीं आती थोड़ी बहुत तूने शर्म करनी चाहिए यूट्यूब को भी समझना पड़ेगा कि कोई भी नया काम करते हुए मुश्किल का सामना करना पड़ता है तमाम महिला समाज सुधारकों को सामाजिक बुराइयों के खिलाफ काम करते हुए बहुत ज्यादा विरोध करना पड़ा और सामना करना पड़ा है जब हम समाज सुधार को की बात करते हैं तो उनमें ज्योतिबा फुले का जिक्र जरूर करते हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में अछूतों दलितों व लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था जिन्होंने सती प्रथा बाल विवाह और विधवाओं के मुंडन जैसी कुप्रथा का विरोध करते हुए विधवा विवाह का समर्थन किया था पत्नी सावित्रीबाई फुले जब स्त्री को पढ़ाने स्कूल जाती थी तो वहां से तत्कालीन ब्राह्मणों और धर्म शास्त्रियों ने भारी विरोध किया था वे उन पर गोबर और पत्थर फेंकते थे लेकिन सावित्रीबाई ने बिना विचलित हुए उनका मुकाबला किया और अपना काम करती रही हम भी हौसलों से इन बुराइयों के खिलाफ अपना संघर्ष तेज कर सकते हैं जानेमन बनाना पड़ेगा और तभी वे बदलेगी और बदली है इतिहास का इस बात का गवाह है कैसे कहे भी देखने को मिलता है गांव में जितनी कक्षा तक का स्कूल है उसी कक्षा तक लड़कियों को पढ़ाया जाता है उसे आगे शहर या पड़ोस के गांव में नहीं भेजा जाता और भेजते भी है तो कहते हैं कि वहां पर कोई छेड़खानी की घटना हो सकती है ऐसे नतीजे सामने लाते हैं लड़की की पढ़ाई और शादी करो लड़कियों को मुसीबत की तरह देखने की बजाय और मुझे बताओ क्या डटकर सामना करो लड़कियों की शिक्षा पर सवाल उनसे जुड़ी तमाम समस्याओं का समाचार के काम की तरह देखो सरकार को भी अपनी शिक्षा नीति का पुणे मूल्यांकन करना चाहिए और उन में लड़कियों की शिक्षा को अहम रोल देना चाहिए जहां तक स्कूल कॉलेजों में बस में सफर करते हुए छेड़खानी का मसला है लड़कियां आपसी भाईचारे में विश्वास बनाए रखें सत्ता में विश्वास से ही रास्ता निकलेगा मीडिया ने भी महिलाएं और लड़कियों की छवि को एक उपभोग की वस्तु की तरह पेश किया जिसने लड़कियों पर जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव डाला है तथा औरतों की परंपरागत छवि उनके मान मर्यादा और उनकी भूमिकाओं को सुधार किया है जिनसे समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे को कायम रखने में भी मदद मिली है उन्हें मनोरंजन की वस्तु के रूप में देखने का नजरिया है उनकी समाज को बदलने की सकारात्मक भूमिका को या देश के विकास में उत्पन्न कार्य भूमिका को कभी नहीं दर्शाया जाता तमाम राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय मल्टीनेशनल कंपनियां अपना माल बेचने और मुनाफा कमाने के लिए बड़े-बड़े लोग देते हैं लड़कियों को ही इसमें अपना रोल मॉडल मानते हैं फैशन शो मॉडलिंग आदि या विज्ञापन इन्हीं युवा लड़कियों से ही करवाते हैं जो युवा लड़कियों के सामने पैदा कर देती है और यह लड़कियों पर बिगड़ने के एग्जाम लगाए जाते हैं जो विज्ञापन मॉडलिंग आदि काम करते हैं उन्हें गांव के लोग बिगड़ी हुई लड़कियों का नाम देकर उनकी मान मर्यादा और इज्जत मिट्टी में मिला देते हैं हमने सबने मिलकर ठानना है कि कि हम अपनी बहू बेटियों की समाज में इज्जत करें घर में ईजज्त करें तभी हम आगे बढ़ेंगे।

खान मनजीत भावड़िया मजीद
सोनीपत( हरियाणा )

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।