‘घाटी का दर्द’

pavan kumar

क्रंदन मन आँ खों के आँसू ,
कैसे भला छिपाऊँ मैं।
रोती घाटी चीख रही है,
कैसे चुप हो जाऊँ मैं।।

अपने घर के गद्दारों ने,
इसको घायल कर डाला।
आतंकी हमलों ने इसका,
खूनी आँचल कर डाला।।

सत्ता की चाहत में नेता,
कैसे चुप हो जाते हैं।
राजनीति के चक्कर में,
क्यों सैनिक लातें खाते हैं।।

शर्मसार है पूरी घाटी,
आतंकी अफसानों से।
राजनीति क्यों खेल रही है,
सरहद खड़े जवानों से।।

ममता का मन्दिर घायल है,
कैसे इसे बचाऊँ मैं।
रोती घाटी चीख रही है,
कैसे चुप हो जाऊँ मैं।।

ऐसे छूट मिली गर इनको,
ये आगे बढ़ जाएंगें।
भारत माता की छाती पर,
ये आतंक मचाएंगें।।

पहले निपटो घर के अंदर,
छिपे हुए गद्दारों से।।
तब जाकर के निपट सकोगे,
आतंकी सरदारों से।।

सेना का अपमान करे जो,
उसको फाँसी लटका दो।
जो भी मारे उसको मारो,
खुली छूट सेना को दो।।

दहक रही है पावन धरती,
छाले किसे दिखाऊँ मैं।
रोती घाटी चीख रही है,
कैसे चुप हो जाऊँ मैं।।

                                                                              #पवन कुमार यादव

परिचय :  पवन कुमार का जन्म 1991 में हुआ है और आप पिता के साथ कृषि करते हैं। शिक्षा में स्नातक हैं तथा नौकरीपेशा हैं। लेखन आपका शौक है,समय मिलने पर रचनाकार बन जाते हैं। साहित्य में रुचि रखते हैं।

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