संदूक

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“मुखिया जी को बुलाओ पहले…”
एक सेवादार चिल्लाया
“इसमें मुखिया जी का क्या काम है?”
दूसरे ने तरमीम किया।
“वसीयत से लेकर संदूक की चाभी तक सब तो उनके पास ही है उनके बिना आखिर करोगे क्या?” पहले ने अपने छठवीं ज्ञानेन्द्री पर जोर डालते हुए दूसरे को बिस्वास में लेने की कोशिश की….
बाबा जी के निधन की खबर आग की तरह पूरे गांव में फैल रही थी। और जो सुनता वो दौड़ता हुआ मंदिर की ओर चला आता।
“संदूक कहाँ है संदूक???” एक ग्रामीण ने सेवादार से सवाल किया।
“रखी है… कोई खाये नहीं ले रहा है। वसीयत मुखिया जी के पास सुरक्षित है। माल उसी के मुताबिक बांटा जाएगा।”
सेवादार भकुराया…।
धीरे-धीरे करके पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुखिया जी भी आ गये। सेवादार भी अंतिम संस्कार की तैयारियों में ब्यस्त हो गये।
“वर्षों बाबा जी की सेवा की है। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी … खाने से लेकर नहाने तक … हर दिन के हिसाब से दो-दो सेवादार बारी -बारी से घर -घर से आते थे। उसी धन के लालच में…. पर बाबा जी की शर्त थी कि संदूक उनके मरने के बाद ही खोली जाएगी। अब तो वो मर गए न अब किस चीज की देरी है। पूरा गांव भी इकट्ठा है। मुखिया जी भी हैं। तो क्यों न उसे अभी खोलकर उसका हिस्सा बांट दिया जाय। उसके बाद बाकी का क्रिया कर्म हो?” एक नेता टाइप ग्रामीण ने अपने ज्ञान का मुजाहिरा किया।
“भाई अंतिम संस्कार तो हो जाने दो उसके बाद धन तो आप लोगों का ही है। आप लोगों को ही बांटा जाएगा। कोई उठाके थोड़ी न ले जा रहा है।” मुखिया जी संदूक को अभी खोलने के पक्ष में नहीं थे।
“आज के समय में किसका भरोसा किसी ने माल इधर उधर कर दिया तो….?” एक और ग्रामीण ने अपनी चिंता जताई।
“सबकी मर्ज़ी यही हो तो अभी खोल देते हैं। पर ये ठीक नहीं होगा… बेचारे बाबा जी जो अब इस दुनिया में भी नहीं रहे, अपना पेट काट-काट कर ये धन बटोरा होगा। तो कम से कम उनका अंतिम संस्कार हो जाता उसके बाद खोल देते …” एक बुद्धिजीवी किस्म के पूर्व मुखिया ने अपना मुखमंडल चौकोर करते हुए फिर लंबा कर लिया।
“तो फिर अंतिम संस्कार हो ही जाने देते हैं?” इसी बात पर वर्तमान मुखिया ने भी अपनी सहमति दर्ज करा दी।
जैसे तैसे अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ । पूरा गांव पुनः मंदिर में इकट्ठा हो गया। एक एक कर ग्रामीण अंदर घुसे और तकरीबन मन भर वजनी संदूक बाहर निकाली गई।
मुखिया जी ने जेब से चाभी निकाली और  उसके ताले को खोल दिया। संदूक का ढक्कन ऊपर होते ही जैसे पूरे गांव का कलेजा एक साथ हलक में आ गया।
“क्या है ईंटे…?” मुखिया ने मुंह बनाया।
“हटाओ -हटाओ इसके नीचे कुछ होगा” पूरा गांव एक साथ बोल पड़ा।
एक-एक कर सारी ईंटे हटा दी गईं। पर वहाँ कीमती जैसा कुछ न मिला। सबसे नीचे एक कागज का टुकड़ा रखा हुआ था। जिसमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था।
“मेरा बुढापा तो इस ईंटों से भरे संदूक के सहारे ऐश्वर्यपूर्ण ही रहा अब तुम सब अपने बुढापे की चिंता करो…”
#चित्रगुप्त 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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