तपती धरती पर नङ्गे पाँव
अधजले शरीर पर अर्धनग्नता लिये
हाँफती साँसों के साथ हाड़ो कि लड़ाई करता हूँ
हर रोज जिंदगी जीने की हिम्मत करता हूँ
तुम बैठे हो ए सी में कूलर में
मैं धरती की गोद मे पसीना पोंछ रहा हूँ
मैं रिक्शा चालक हूँ तुमसे पूछ रहा हूँ
कहते हैं मेहनत से बदलती है तकदीर
मैं भी अपनी लकीरो से उलझ रहा हूँ
अपनी मेहनत पर तुम्हारी बर्गनिग से टूट रहा हु
पूरे दिन जी तोड़ करता हु काम
दो बच्चो की भूख नही मिटा पाता हूँ
तुम देते हो अधिकार शिक्षा का
मैं विवश उन्हें काम पर ले जाता हूँ
जानते हो क्यों?
भूख बड़ी है हर दौलत से
बड़ी मुश्किल से उन्हें जिंदा रख पाता हूँ
पहले हमारे पेट की आग तो शांत करो
ओ महलो में रहने वालों !फिर कानून की बात करो
गरीबी में बीमारी भी बेख़ौफ़ चली आती है
तड़प तड़प के बीवी ने फुटपाथ पर रात गुजारी है
भामाशाह नही था सो दवा न हो सकी
बिटिया तो जन्मी मगर माँ जिंदा न रह सकी
अब उसकी सुरक्षा का जिम्मा किस पर डालु?
बाप हु कैसे उस बच्ची और घर संभालू
घर ,घर के नाम पर है ही क्या
फुटपाथ पर रेंगती है जिंदगी
किसी अय्याश के रहम के हवाले
न जाने सोते हुए हम पर
कब अपनी महँगी कार चला ले
एक दिन अचानक सड़क पर मृत पाया जाऊंगा
जानता हूँ न ही आखिरी आग मिलेगी
न ही कब्र में दफनाया जाऊंगा
आधार नही है न सो नाम भी नही होगा
किसी अखबार में गुमनाम छपा होगा
मैं रिक्शा चालक हूँ
तुम्हे अपनी मंजिल तक पहुंचता हूँ
फिर भी मेहनताना पूरा नही पाता हूँ।
तुम बुद्धिजीवी हो
बड़ी बड़ी बातें करते हो देश के विकास की
मैं हर रोज यू ही मरता हूँ
कभी बात करो मेरी परवाह की।
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।