रश्मि-रथ की करके सवारी
तुम आईं हिय-द्वार सुकुमारी
श्वासों के आरोह-अवरोह से
आहट होती प्रतिध्वनित तुम्हारी
अथाह व्योम-से उर में जैसे
दिव्य नूपुर खनक रहे हैं
इस मादकता की धारा में
सारे सुर-नर भटक रहे हैं
प्रत्येक सुमन से तेरी ही
प्रतिबिंबित होती है छवि न्यारी
श्वासों के आरोह-अवरोह से
आहट होती प्रतिध्वनित तुम्हारी
तू अमित, स्निग्ध, निर्धूम शिखा सी
अंतर में आलोक भरे
निश्छल, निर्मल मुस्कान तेरी
ज्यों पुष्पों से मकरंद झरे
मेनका, उर्वशी, रंभा सी
तू सौंदर्य-प्रतिमा मनोहारी
श्वासों के आरोह-अवरोह से
आहट होती प्रतिध्वनित तुम्हारी
तेरी छवि को मेरे हृदय ने
किया कुछ ऐसे आत्मसात
सजल जलद आच्छादित कर दें
जैसे प्रकृति को अकस्मात
तुम स्वयं ही देखो पल भर में
हो गई प्रफुल्लित सृष्टि सारी
श्वासों के आरोह-अवरोह से
आहट होती प्रतिध्वनित तुम्हारी
भरत मल्होत्रा
परिचय :-
नाम- भरत मल्होत्रा
मुंबई(महाराष्ट्र)
शैक्षणिक योग्यता – स्नातक
वर्तमान व्यवसाय – व्यवसायी
साहित्यिक उपलब्धियां – देश व विदेश(कनाडा) के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों , व पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्मान – ग्वालियर साहित्य कला परिषद् द्वारा “दीपशिखा सम्मान”, “शब्द कलश सम्मान”, “काव्य साहित्य सरताज”, “संपादक शिरोमणि”
झांसी से प्रकाशित “जय विजय” पत्रिका द्वारा ” उत्कृष्ट साहितय सेवा रचनाकार” सम्मान एव
दिल्ली के भाषा सहोदरी द्वारा सम्मानित, दिल्ली के कवि हम-तुम टीम द्वारा ” शब्द अनुराग सम्मान” व ” शब्द गंगा सम्मान” द्वारा सम्मानित
प्रकाशित पुस्तकें- सहोदरी सोपान
दीपशिखा
शब्दकलश
शब्द अनुराग
शब्द गंगा