हाथों की लकीरें

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namita

हाथ से छूकर,
महसूस किया..
कितना खुरदुरापन है,
इन हाथों में।

वो नजाकतें वो कोमलता,
ना जाने कहां खो गई..
मां सिर्फ
फौलाद बन कर रह गई।

याद है मुझे,
वो नाजों-सी कंचन काया..
जो छूते ही मैली होती थी
मां कह लिपट जाता था..
पर वो प्रफुल्लित रहती थी।

नाजुक-सी मां,
पिता के जाने के बाद..
पत्थर-सी कठोर हो गई,
अब वो केवल मां है
सिर्फ मां बन कर रह गई।

बेरहम जमाने में,
हमारा छाता बनी मां..
सब सह लेती थी,
पर हमें कुछ न होने देती थी।

राहें जब कुछ अनुकूल हुई,
मां को नजदीक से देखा..
तब एक कौंध अन्तरमन को,
चीरती चली गई..
मां,उस मां से कितनी अलग थी,
जो पिता की छत्र छाया में
अमरबेल-सी झूमती थी,
सुसंस्कृत पत्नी के गर्व में
हिंडोले पर झूलती थी।

हाथों की लकीरें धोखा दे गई,
और वो नाजुक नारी..
ज्वालाओं में जल-जलकर,
पाषाणधारी हो गई।।

             #नमिता दुबे

परिचय : लेखन के क्षेत्र में नमिता दुबे अब नया नाम नहीं है। समाजशास्त्र में एमए करने वाली नमिता दुबे हाउस वाईफ के साथ ही सौन्दर्य विशेषज्ञ भी हैं। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान लिखना शुरु किया था,जो निरंतर जारी है। दैनिक समाचार पत्रों में रचनाएं नियमित रुप से छपती रही हैं। पति के हैदराबाद में शिफ्ट होने के बाद पुनः लिखना शुरु किया है। हैदराबाद के कुछ समूहों और साहित्य समिति में कविता पाठ भी करती हैं। काव्य के साथ लेख और कहानी भी लिखती हैं। फिलहाल आप हैदराबाद में रहती हैं।

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