हम शब्दों की दीपशिखा हैं
हम भावों की जलती मशाल
हम वीणापाणी के वरद पुत्र
हम चेतनता की लपट ज्वाल
हमने अपने शब्दों से सदा
साहस को परिभाषा दी है
टूटे दिल को ढ़ाढस देकर
जीने की नव आशा दी है
धरती को माता मान सदा
हमने कीर्ति का गान लिखा
जौहर की ज्वाल लिखी हमने
सतियो का स्वाभिमान लिखा
पदमावति का सौंदर्य लिखा
राणा जी का अभिमान लिखा
खिलजी का कपट उकेरा ,
गोरा बादल का बलिदान लिखा
हमने जंगे आजादी में भी
राह दिखाई औरौं को
कलम की ताकत क्या होती
यह बात बताई गौरौं को
हम तो शब्दों को साध साध
हथियार बनाने वाले हैं
जो सुप्त पड़े दायित्व भूल
हम उन्हें जगाने वाले हैं
लफ्फाजी और चुटकुलों से
मान न खोते गीतों का
हम तो शोणित से सींच सींच
बस बिरवा बोते गीतों का
खोकर स्वाभिमान मंचों के
नौकर कभी न हो सकते
हम तो इस युग के चारण हैं
हम जोकर कभी न हो सकते
#अजीतसिंह चारण
परिचय: अजीतसिंह चारण का रिश्ता परम्पराओं के धनी राज्य राजस्थान से है। आपकी जन्मतिथि-४ अप्रैल १९८७ और शहर-रतनगढ़(राजस्थान)है। बीए,एमए के साथ `नेट` उत्तीर्ण होकर आपका कार्यक्षेत्र-व्याख्याता है। सामाजिक क्षेत्र में आप साहित्य लेखन एवं शिक्षा से जुड़े हुए हैं। हास्य व्यंग्य,गीत,कविता व अन्य विषयों पर आलेख भी लिखते हैं। आपकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं तो राजस्थानी गीत संग्रह में भी गीत प्रकाशित हुआ है। लेखन की वजह से आपको रामदत सांकृत्य साहित्य सम्मान सहित वाद-विवाद व निबंध प्रतियोगिताओं में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कार मिले हैं। लेखन का उद्देश्य-केवल आनंद की प्रप्ति है।
Wed Aug 8 , 2018
1. धरा सनातन बस रहे,प्राणी विविध प्रकार । पर्यावरण स्वच्छ रहे, पेड़ लगा विस्तार।। 2. धरती पर जल थल हवा,सभी सजे आबाद। पर्यावरण सनातनी ,रहे नहीं क्यों याद।। 3. ईश,प्रकृति,मर्त्य रची, ये सब ले पहचान। समझो भाव विवेक से ,पर्यावरण समान।। 4. नित निमित्त स्व विकास के,रचते हैं इतिहास। बहका […]